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भ्रष्टïचार की मिसाल

यादव सिंह ने भ्रष्टïचार के जो कीर्तिमान बनाए वह बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो सकता है। यह बात जाहिर है…

इन दिनों नोएडा के चीफ प्रॉजेक्ट इंजीनियर के घर छापे में कई सौ करोड़ की संपत्ति मिलने की चर्चा जोरों पर है। लेकिन इसे सिर्फ एक अफसर के भ्रष्टाचार की तरह देखने का कोई मतलब नहीं है। यादव सिंह नाम के इस शख्स का करियर ग्राफ देश की राजनीतिक धुरी कहलाने वाले इस राज्य के लोगों को न सिर्फ अपनी सरकार से, बल्कि विपक्ष से भी पूरी तरह नाउम्मीद कर देने के लिए काफी है। एक जूनियर इंजीनियर के रूप में अपना काम शुरू करने वाला यह शख्स पिछली मुख्यमंत्री मायावती की कृपादृष्टि के चलते देखते-देखते चीफ मेंटेनेंस इंजिनियर बन गया और प्रदेश के कई अहम प्रॉजेक्टों की जिम्मेदारी संभालने लगा। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू यह है कि 2012 में राज्य की सरकार बदलने के बाद उसका 954 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया, उसे सस्पेंड किया गया, उसके खिलाफ एफआईआर की गई, यहां तक कि उसे देश छोड़ कर भाग जाना पड़ा। दुनिया के किसी भी कोने से उसे गिरफ्तार कर लेने के लिए यूपी पुलिस ने उसके खिलाफ इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी करवाई। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भीतर-भीतर पता नहीं कौन सी खिचड़ी पकी कि इसी सरकार ने एक साल के अंदर एक-एक करके अपने सारे कदम वापस खींच लिए। पहले रेड कॉर्नर नोटिस वापस लिया गया, फिर सीबी-सीआईडी की जांच को सुस्त कर दिया गया, और पिछले साल एक सुहाने दिन यादव सिंह का सस्पेंशन भी खत्म करके उसे वापस उसी पद पर ला बिठाया गया, जहां सरकारी खजाने की कामधेनु दुहने में उसने ऐसी महारत हासिल कर रखी थी। यही नहीं, उसकी वापसी का विजय रथ इससे भी आगे गया। अभी कुछ ही दिन पहले उसका ओहदा और बढ़ाकर उसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे अथॉरिटी के सभी विकास कार्यों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। छापा पडऩे से पहले यादव सिंह की हैसियत इतनी बढ़ गई थी कि उसका जिक्र सिर्फ परीकथाओं में आने की कसर बाकी थी। अभी प्रदेश सरकार की ओर से बताया जा रहा है कि इस भ्रष्ट अफसर के खिलाफ जारी जांच को देखते हुए उसकी सभी जिम्मेदारियों से उसे अलग कर दिया गया है। लेकिन सवाल तो यह है कि जिन लोगों ने दो साल पहले उसके खिलाफ शुरू हुई जांचों को चुपचाप ठंडे बस्ते में डाल दिया, उनकी जांच कैसे होगी, और इसे करेगा कौन? इससे भी बुरी बात यह कि पूरे उत्तर प्रदेश में इस तरह के न जाने कितने यादव सिंह पूरे जोर-शोर से सक्रिय होंगे, जिन्हें राज्य की सरकार बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे जिस हद तक बीएसपी सरकार के लाड़ले थे, उतने ही या उससे भी ज्यादा प्रिय समाजवादी हुकूमत के लिए भी हैं। ऐसे में यूपी के सामने विकल्प क्या है? अंधेरे में रोशनी की किरण का मुहावरा हम आदतन इस्तेमाल करते हैं, लेकिन लूट की इस अंधी सुरंग में रोशनी नाम की कोई चीज कहीं दूर-दूर तक नहीं है। क्या यूपी के विकास की कथा ऐसे भ्रष्टï नायक लिखेंगे।

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