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लाठी खाने वाले पार्टी से हुए बाहर, गायत्री जैसे बदनाम लोग मंत्री बनकर काट रहे माल

सीएम अखिलेश यादव की नाराजगी से सपा मे हडक़ंप

सीएम के करीबी युवा नेताओं को निकालने से यूथ ब्रिगेड जबरदस्त खफा, सोशल मीडिया पर जाहिर की नाराजगी
पहली बार सैफई महोत्सव में नहीं पहुंचे सीएम अखिलेश और उनकी सांसद पत्नी डिंपल यादव
सीएम को कमजोर करने में जुटे पार्टी के ही कुछ लोग
इन्हीं लोगों ने पहले सीएम के करीबी अफसर यशस्वी यादव को भी साजिश करके हटवाया था

Captureसंजय शर्मा
लखनऊ। सैफई महोत्सव में इस बार यादव परिवार का सबसे स्टार चेहरा गायब है। सैफई और आस-पास के लोगों की आंखों में सवाल है कि आखिर सीएम अखिलेश यादव को पार्टी के भीतर ही परेशान क्यों किया जा रहा है। जो लोग सीएम के सबसे करीबी हैं उनको ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है? सीएम की यूथ ब्रिगेड टीम के सदस्य सुनील साजन और आनन्द भदौरिया का पार्टी से निलंबन से इतना बड़ा तूफान खड़ा हो जाएगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। सपा की यूथ बिग्रेड ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर मानो अभियान ही छेड़ दिया है। युवा नेता गुस्से से सवाल करते हैं कि मायावती सरकार के खिलाफ जो युवा नेता लगातार लाठियां खा रहे थे और जिनके सिर से खून टपक रहा था, उन्हें अब बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनसे पार्टी की बदनामी हो रही है। दूसरी ओर गायत्री जैसे लोग पूरे देश में सरकार की फजीहत करा रहे हैं तो उन्हें और आगे बढ़ाया जा रहा है। यह लोग नेताजी से सवाल कर रहे हैं कि आखिर यह कहां का इंसाफ है। सैफई महोत्सव में न जाकर इस बार सीएम अखिलेश यादव ने भी मानो ऐलान कर दिया कि अब वे और ज्यादती बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। ’टीपू के इन तेवरों से अब पूरी पार्टी में सन्नाटा छा गया है। बगावत के इन तेवरों ने चुनाव की तैयारी कर रही पार्टी के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।‘
कोई कुछ भी दावा करे मगर यह हकीकत है कि 2012 में पार्टी की इस अभूतपूर्व सफलता में अगर किसी एक व्यक्ति को इसका श्रेय दिया जाए तो वह अखिलेश यादव ही हैं। उन्होंने और उनकी टीम ने जिस तरह प्रदेश भर में युवाओं के साथ माहौल बनाया और उसने पार्टी को सत्ता तक पहुंंचा दिया। मगर शपथ ग्रहण में ही दागी मंत्रियों के साथ यह बात सामने आ गई थी कि अखिलेश सारे फैसले लेने में स्वतंत्र नहीं है। तब से शुरू हुई यह बात आज तक अखिलेश का पीछा नहीं छोड़ रही।
कुछ दिन पहले ही जब लखनऊ में यशस्वी यादव को एसएसपी बनाया गया था तब से पार्टी का एक बड़ा तबका उनका विरोध इसलिए करने लगा क्योंकि वह सीएम के सबसे करीबी थे। आखिर में इस तबके ने नेताजी के कान भरे और सीएम को भारी मन से यशस्वी यादव को हटाना पड़ा। तब से यह गुट कई मामलों पर सीएम को दबाव में लेने की कोशिश करने लगा। यह बात सभी जानते हैं कि नोएडा समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी मामले सीधे रामगोपाल यादव देखते हैं। सीएम उसमें कोई दखल नहीं देते। बावजूद इसके सीएम की टीम को लगातार आलोचना झेलनी पड़ रही है। इन दोनों युवा नेताओं पर आरोप है कि वह जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में असहयोग कर रहे थे, मगर पार्टी के युवा पूछते हैं कि काबीना मंत्री पंडित सिंह तो खुले आम पार्टी के प्रत्याशी का विरोध कर रहे हैं तो वह पार्टी में कैसे हैं। जाहिर है इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।

अखिलेश को मनाने पहुंचे धर्मेन्द्र यादव
नाराज सीएम को मनाने के लिए आज उनके छोटे सांसद भाई धर्मेन्द्र यादव और तेज प्रताप यादव उनके घर पहुंचे। सीएम ने एक कार्यक्रम में हरी झंडी दिखाई मगर पत्रकारों के सवालों के जवाब में सिर्फ इतना कहा कि थोड़ा इंतजार कीजिए। अब सबको इंतजार है कि यादव परिवार की इस जंग में जीत किसकी होगी।

माया सरकार में इस तरह पुलिस बूटों के नीचे आए थे आनन्द भदौरिया
इस फोटो ने 2012 के चुनाव में काफी सुर्खियां बटोरी थी। एसएसपी लखनऊ के जूते के नीचे अखिलेश जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए यह आनन्द भदौरिया हैं। सुनील साजन ने भी माया सरकार में ’यह जान अखिलेश तेरे नाम’ नारे लगाते हुए न जाने कितनी बार लाठियां खाई और खून से लथपथ हुए। सत्ता का निर्मम चेहरा देखिए, सडक़ पर अखिलेश के लिए संघर्ष करने वाले इन्हीं लोगों को आज बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और बदनाम लोग आज भी सत्ता की मलाई खा रहे हैं।

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