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अगर अराजक होने से सच सामने आता है तो मैं हूं अराजक: यशवंत

PAGE 10-----------14-20 MAY1करीब आठ साल पहले जब यशवंत सिंह ने ‘मीडिया का बाप’ नामक स्लोगन से भड़ास4 मीडिया की शुरुआत की थी तो मीडिया जगत में भूचाल आ गया था। यह ऐसी शुरुआत थी जिसने पत्रकारों को एक मंच दिया तो बड़े-बड़े मीडिया घरानों पर नकेल कसने का माध्यम बना। भड़ास 4 मीडिया देखते ही देखते शोषित पत्रकारों की आवाज बन गया। कई बार भड़ास ने आवाज उठाकर स्ट्रिंगरों, पत्रकारों को उनके हक का पैसा उनके मालिकानों से दिलवाया। पहली बार कोई ऐसा मीडिया आया, जो उनकी खबर लेता था, जो सबकी खबर लेते थे। 17 मई को ‘भड़ास फॉर मीडिया’ अपने आठ साल पूरे करेगा। आठ साल का सफर इतना आसान भी नहीं था। शुरुआत से लेकर अब तक के सफर के दौरान बहुत सी कठिनाइयां आई लेकिन यशवंत ने हार नहीं मानी और अपने सकारात्मक सोच की बदौलत आगे बढ़ते गए। भड़ास फॉर मीडिया की प्रसिद्धि कहें या डर कि तमाम मीडिया संस्थानों में भड़ास पर प्रतिबंध लगा हुआ है। बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों को यह डर होता है कि जो उनके यहां नहीं छपेगा वह भड़ास पर छपेगा। यदि यह कहें कि वर्तमान में यह पोर्टल अनेक पत्रकारों के लिए उनकी आवाज बुलंद करने का मंच बन गया है तो गलत नहीं होगा। भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह से वीकएंड टाइम्स की स्थानीय संपादक प्रीति सिंह ने मीडिया के विभिन्न पहलुओं पर बात की और उन्होंने बड़े ही बेबाकी से अपनी राय रखी।

पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-

पत्रकारिता जगत में आपको अराजक माना जाता है। कहा जाता है कि आप अराजकता फैलाते हैं?
मुझे लगता है कि एक आदमी अराजक होकर हर छोर पर जी लेता है। वह समझ पाता है कि अराजकता के इस छोर पर क्या मिला और उस छोर पर क्या मिला तो वह दोनों का मूल्यांकन करके एक बेहतर राह पर जा सकता है। फिलहाल इस समय मैं कम अराजक हूं। ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है ताकि मैं विवाद में आऊं।

आप पर यह भी आरोप है कि आप की वजह से लोगों की छवि धूमिल हुई है?
मैंने सबसे ज्यादा छवि अपनी धूमिल कर ली हैं। आज मैं भी किसी बड़े मीडिया संस्थान में संपादक बनकर आराम की जिदंगी जी रहा होता अगर सच सामने ना ला रहा होता।

बहुत से अंशकालिक पत्रकार आपकी बात में आकर जोश में आ गए और उन्होंने क्रांति करने की शुरुआत कर दी। लेकिन आपके यहां छपने के बाद वह सडक़ पर आ गए। अब उनकी लड़ाई कौन लड़ेगा। आखिर इसका विकल्प क्या है?
मेरा मानना है कि बजाए आप ऐसे जीर्ण-शीर्ण दशा में लगातार जीते रहे उससे अच्छा है कि आपको धक्के मारकर सडक़ पर ला दिया जाए, ताकि आप कुछ नया सोच सकें। ऐसी जिदंगी से क्या फायदा कि आप न मर पा रहे हैं, न जी पा रहे हैं। जहां आप अपनी बात नहीं रख पा रहे हैें और न ही अच्छे पैसे कमा पा रहे हैं। बहुत से ऐसे लोग है जिन्होंने भड़ास 4 मीडिया से इंस्पायर होकर लीक से अलग काम किया है। मेरा कहना है कि पैसा कमाने के लिए कोई और धंधा करो और पत्रकारिता पूरे मन से करो ।

आपका पूरे देश की मीडिया से ताल्लुक रहता है। पत्रकारों के बारे में ऐसी धारणा है कि पत्रकार होना मतलब गरीब होना है। जिन पत्रकारों के पास अच्छे पैसे है, बड़ी गाड़ी में घूम रहे हंै उसके लिए कहा जाता है कि ब्लैकमेलिंग से पैसे कमाए हैं। क्या पत्रकारिता एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए उतने पैसे उपलब्ध नहीं करा सकता? आप इससे कितने सहमत हैं?
सोशल मीडिया ने सभी को पत्रकार बना दिया है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो दूसरों की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन वह पेशे से पत्रकार नहीं है। आप अमिताभ ठाकुर को देख लीजिए। पिछले कई महीनों से सरकार से लड़ रहे है। वह भले ही पुलिस में है लेकिन वह पत्रकारिता कर रहे हैं। ऐसे कई नाम है जो लोगों की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसे पत्रकारिता ही कहा जाएगा। कई सोशल एक्टिविस्ट है। आप जलपुरुष राजेन्द्र सिंह को देख लीजिए। लंबे समय से लड़ रहे है। मेरा मानना है कि अच्छा जीवन जीना एक सोच है और हममे से ज्यादातर लोग ऐसा जीवन चाहते हैं। यह कहीं से गलत नहीं है। आज मीडिया के जरिए पैसे कमाने वाले ज्यादा है। कोई पोर्टल खोल दिया है तो कोई ओवी वैन खरीद लिया है और अच्छा पैसा कमा रहे हैं। ऐसे लोग पत्रकार नहीं है बल्कि मीडिया के माध्यम से पैसा कमा रहे हैं। पत्रकारिता का जवाबदेही सडक़ पर पड़े गरीब और मानसिक विकलांग के प्रति बनती है जिसकों कोई पूछने वाला नहीं है, न कि रुपए-पैसे और सुख-सुविधा से।

पत्रकारिता में नैतिकता और आदर्श की बात होती है, तो आमतौर पर छोटे और मझले अखबार को लेकर यह बात ज्यादा होती है कि ये ब्लैकमेलिंग करते हैं। जबकि कई बार देश के बड़े मीडिया हाउसेज के बारे में भी ब्लैकमेलिंग की खबरे आई हैं, इन पर बात नहीं होती।
मेरा मानना है कि सही मायने में छोटे और मझले अखबार ही पत्रकारिता कर रहे हैं। यही अखबार क्रांति चेतना का काम कर रहे हैं। जो खबरें बड़े घराने टाइप लोग नहीं छापते, उसे छोटे अखबार प्रकाशित करते हैं। जिन खबरों को बड़े मीडिया घराने छापने की हिम्मत नहीं कर पातेउसे मझले, छोटे अखबार दिलेरी से छापते हैं। बड़े मीडिया घरानों की पत्रकारिता में काफी बदलाव आ गया है। वहां पत्रकारिता कम, कारोबार ज्यादा हो रहा है।

सोशल मीडिया के बारे में क्या कहेंगे?
वर्तमान में मीडिया के दो छोर है। एक तरफ बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने खड़े हैेे तो दूसरी ओर सोशल मीडिया है। सोशल मीडिया पर हर आदमी पत्रकार है। उसे अपनी बात रखने की आजादी है। कोई गलत कर रहा है तो सोशल मीडिया पर उसे गाली दे सकता है। हर पत्रकार कटघरे में है। हर पत्रकार पर सवाल उठ रहा है। मेरा मानना है कि अबक्रांति विचारधाराओं से नहीं आती। अब क्रांति टेक्नालॉजी करा रही है। विचारधारा गौड़ हो रही है। टेक्नालॉजी ने लोगों को एक-दूसरे से ऐसे कनेक्ट कर दिया है कि अब अपनी बात पहुंचाने के लिए पर्चे बांटने की जरूरत नहीं है।

भड़ास का अगला स्टेप क्या है?
मुझे लगता है कि ऐसे प्लेटफार्म बने रहे जहां पर कॉमन मैन अपनी बात कह सके। कॉमन जर्नलिस्ट अपनी बात कह सके। सच्चे पत्रकार तो मिलेंगे ही। कुछ दिनों पहले अंग्रेजी अखबार के कुछ पत्रकारों ने पनामा पेपर्स का खुलासा किया। यह एक नया ट्रैंड है ‘क्रॉस बार्डर इन्वेस्टीगेशन’ । ऐसी पत्रकारिता जिसमें पूरी दुनिया के कुछ अच्छे पत्रकार मिलकर आपस में एक बड़े स्कैंडल का खुलासा कर रहे हैं। यह बहुत अच्छी चीज है। बेहतर पत्रकार तो हमेशा रहेंगे लेकिन उनकी बात कहने के लिए ऐसा प्लेटफार्म होना चाहिए। भड़ास जैसे कई पोर्टल आ गए है जो तेवर के साथ लिख रहे हैं। भड़ास हमेशा मीडियाकर्मियों की लड़ाई में उनके साथ था और हमेशा रहेगा।

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