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आईटी सेक्टर में क्यों जा रही हैं हजारों की नौकरियां

टाइम्स आफ इंडिया से लेकर बिजनेस स्टैंडर्ड तक लिख रहा है कि 2008-10 में जो छंटनी हुई थी, उससे भी अधिक संख्या में छंटनी हो रही है। इस बार मध्यम और सीनियर लेवल के अफसरों को चलता किया जा रहा है। जिन्होंने मकान और कार के लोन ले रखे हैं और टी शर्ट- बरमूडा पहनकर एयरपोर्ट जाने लगे थे, उन्हें अपने भविष्य को फिर से तय करना पड़ेगा। टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा है कि मध्यम और सीनियर के साथ साथ जल्दी ही निचले स्तर के आईटी इंजीनियर भी छंटनी की चपेट में आने वाले हैं। हालत ये है कि लेबर यूनियन को भारत की तरक्की का विरोधी मानने वाले ये लोग अब लेबर यूनियन बना रहे हैं या उनसे संपर्क कर रहे हैं। जब तक नौकरी रहती है सब लेबर यूनियन को समस्या मानते हैं, जैसे ही नौकरी जाती है लेबर यूनियर की याद आने लगती है। अब छंटनी को छंटनी नहीं कहा जाता है। कहीं इसे सेपरेशन प्रोग्राम कहा जाता है तो कहीं री-स्ट्रक्चरिंग प्रोग्राम कहा जाता है। कॉगनिजेेंंट नाम की कंपनी ने ऐलान किया है कि वाइस प्रेसिडेंट, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट स्तर के 1000 अधिकारियों को निकाला जा सकता है।
भारत के आईटी सेक्टर में खलबली मची है, नौजवानों के दिल में बाहुबली छाया हुआ है। 150 अरब डॉलर के इस सेक्टर में कंपनियों के मुनाफे में लगातार गिरावट आ रही है। बिजनेस अखबार नौकरियों पर फोकस करने लगे हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लगातार सीरीज छाप रहा है कि कैसे आटोमेशन यानी रोबोट के आने से अलग अलग सेक्टर में छंटनी बढ़ रही है। छात्रों से लाखों रुपये की फीस लूट कर उन्हें बताया जा रहा है कि भारत के 60-70 फीसदी इंजीनियर नौकरी के लायक नहीं है। ऐसे नालायक इंजीनियर पैदा करने वाले संस्थान किस लाइसेंस के तहत चल रहे हैं और क्यों लूट रहे हैं, इस पर लुटने वाले छात्र भी चुप हैं क्योंकि वे उन नेताओं के खिलाफ कैसे बोल सकते हैं जिनसे वो मानसिक रूप से भी लुट चुके हैं। जिनके संस्थानों में लाखों की फीस देने के लिए शिक्षा के निजीकरण का स्वागत कर रहे हैं। आईटी सेक्टर में मची खलबली के लिए प्रधानमंत्री मोदी दोषी नहीं है लेकिन उनकी भक्ति में लगे मीडिया के पास वक्त नहीं है कि वो इन मसलों की तरफ लौटे और समाज को बताये कि हमारे इंजीनियर कूड़े के ढेर में बदल चुके हैं।
आईटी सेक्टर की बड़ी कंपनियां सैंकड़ों और हजारों की संख्या में कर्मचारियों को निकाल रही हैं। छोटी कंपनियों का तो पता ही नहीं चलता। टाइम्स आफ इंडिया से लेकर बिजनेस स्टैंडर्ड तक लिख रहा है कि 2008-10 में जो छंटनी हुई थी, उससे भी अधिक संख्या में छंटनी हो रही है। इस बार मध्यम और सीनियर लेवल के अफसरों को चलता किया जा रहा है। जिन्होंने मकान और कार के लोन ले रखे हैं और टी शर्ट- बरमूडा पहनकर एयरपोर्ट जाने लगे थे, उन्हें अपने भविष्य को फिर से तय करना पड़ेगा। टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा है कि मध्यम और सीनियर के साथ-साथ जल्दी ही निचले स्तर के आईटी इंजीनियर भी छंटनी की चपेट में आने वाले हैं। हालत ये है कि लेबर यूनियन को भारत की तरक्की का विरोधी मानने वाले ये लोग अब लेबर यूनियन बना रहे हैं या उनसे संपर्क कर रहे हैं। जब तक नौकरी रहती है सब लेबर यूनियन को समस्या मानते हैं, जैसे ही नौकरी जाती है लेबर यूनियर की याद आने लगती है।
अब छंटनी को छंटनी नहीं कहा जाता है। कहीं इसे सेपरेशन प्रोग्राम कहा जाता है तो कहीं री-स्ट्रक्चरिंग प्रोग्राम कहा जाता है। कॉगनिजेेंंट नाम की कंपनी ने ऐलान किया है कि वाइस प्रेसिडेंट, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट स्तर के 1000 अधिकारियों को निकाला जा सकता है। अखबार के अनुसार कॉगनिजेंट आईटी सेक्टर की कामयाब कंपनी मानी जाती है फिर भी उसके यहां से 6000 लोगों के निकाले जाने की खबर है। यानी जितने लोग काम करते हैं उसका 2.3 प्रतिशत। अखबार के अनुसार कागनिजेंट से निकाले गए दस कर्मचारियों ने श्रम विभाग से शिकायत की है कि उनसे इस्तीफा पत्र पर जबरन दस्तखत कराये गए हैं। इंफोसिस कंपनी भी मैनेजर, प्रोजेक्टर मैनजर स्तर के 1000 लोगों को निकालने की योजना बना रही है। इंफोसिस ने कहा है कि वह 10,000 अमरीकी को नौकरी पर रखेगी। आप जानते हैं कि अमरीका ने अपने वीजा नियमों को इस तरह बदल दिया है कि अब भारतीय इंजीनियरों के लिए वहां जाकर काम करना आसान नहीं रहेगा। तीन हफ्ता पहले विप्रो के सीईओ ने कहा था कि अगर राजस्व नहीं बढ़ा तो 10 प्रतिशत कर्मचारियों को निकाल दिया जाएगा। इस वक्त विप्रो में 1 लाख 81 हजार कर्मचारी हैं। इसका दस प्रतिशत हुआ 18000। विप्रो ने अखबार से इस सूचना का खंडन किया है। फ्रेंच आईटी कंपनी है ष्ट्रक्कत्रश्वरूढ्ढहृढ्ढ 9000 कर्मचारियों को निकालने की तैयारी कर रही है। कंपनी ने 35 वाइस प्रेसिडेंट, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, डायरेक्टर और सीनियर डायरेक्टर से चले जाने को कह दिया है। मुंबई आफिस से 200 लोगों को विदा कर दिया गया है।
हालांकि ये कंपनियां नई भर्तियों की भी बात करती हैं लेकिन छंटनी की संख्या से लग रहा है कि आईटी सेक्टर में हाहाकार मचा हुआ है। आईटी सेक्टर कंपनियों के ग्रोथ रेट में भयंकर गिरावट है। जिन्होंने 20 प्रतिशत का लक्ष्य रखा था उनके लिए 10 प्रतिशत तक पहुंचना भी मुश्किल होता जा रहा है। 2015-16 का साल भी उनके लिए बहुत अच्छा नहीं रहा है। आइटी सेक्टर के लोगों ने अखबार को बताया है कि आईटी सेक्टर में लगातार गिरावट है। इसका मॉडल ही है कि सीनियर को निकालो ताकि लागत कम हो और बचे हुए पैसे से कम पैसे में नए लोग लाए जा सकें मगर संकट इतना गहरा है कि जिनके 3 से 7 साल के अनुभव हैं वो भी निकाले जा रहे हैं। यानी मध्यम स्तर के कर्मचारियों को भी निकाला जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि कंपनियां तेजी से आटोमेशन की तरफ बढ़ रही है जिसके कारण इस सेक्टर से 40 फीसदी कर्मचारी हटा दिये जाएंगे। इस पर बहस इसलिए जरूरी है कि आटोमेशन और रोबोट के कारण 40 फीसदी इंजीनियर की जरूरत नहीं होगी, तो लाखों की संख्या में पैदा होने वाले इंजीनियर कहां खपाये जायेंगे। यह सूचना दहेज मार्केट में भी तेजी से जानी चाहिए। लोग बीस-बीस लाख दहेज देकर आईटी इंजीनियर से शादी कर रहे हैं। बेटी और उसके बाप का कानूनी रूप से प्रतिबंधित यह सामाजिक निवेश डूब सकता है। कंपनियां खुल कर चुनौतियों के बारे में बात नहीं करती हैं कि कहीं सरकार न नाराज हो जाए, वो इन सवालों को ऐसे किनारे लगा देती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बीस पचास हजार लोगों को निकाल देना सामान्य बात हो।
कहा जा रहा है कि निकाले जा रहे सभी लोगों को नए नए कौशल सीखने होंगे। नया सीख भी लेंगे तो ऐसा कौन सा सेक्टर जो उनके स्वागत के लिए बिछा है। जब तक ये नया कौशल सीख कर आयेंगे कंपनियां आटोमेशन की तरफ बढ़ चुकी होंगी। नौकरियां पहले से कम हो चुकी होंगी। आटोमेशन और रोबोट की तरफ तेजी से कंपनियां बढ़ रही हैं। हो सकता है इन इंजीनियरों को ठेके पर काम करना पड़े, कम पैसे पर काम करना होगा। जाहिर है इंजीनियर बनने का ख्वाब देख रहे युवाओं के लिए चुनौती भरा वक्त इंतजार कर रहा है। इन सब खबरों पर देश में कोई बहस नहीं है। यह हमारे देश में ही सकता है कि एक नेता के बयान पर घंटो बहस हो सकती है, गाय पर तीन दिन तक बहस हो सकती है और तलाक पर तीन महीने। ये सब भी जरूरी मुदï्दे हैं लेकिन ऐसा कैसे हो जाता है कि नौकरी के सवाल पर कोई बहस ही नहीं होती। सबसे अच्छी बात है कि हम जिनके लिए बहस की चिंता कर रहे हैं, उन्हीं को फर्क नहीं पड़ता है। जो भी है संकेत अच्छे नहीं है।

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