You Are Here: Home » Front Page » ‘बीफ’ पर महासंग्राम

‘बीफ’ पर महासंग्राम

वर्तमान हालात को देखते हुए यह बात तय है कि भारतीय राजनीति का केन्द्र बिंदु फिलहाल कुछ वर्षों तक गाय ही रहेगी। जिस तरह से गाहे-बगाह इसे मुद्दा बनाया जा रहा है उससे साफ है कि गाय व बीफ अब राजनीति की मुख्यधारा में आ गई है। सभी राजनीतिक दलों को अब यह समझ में आ रहा है कि पार्टी की छवि चमकानी है तो गाय की सुरक्षा और संस्कृति की दुहाई देनी है। पिछले दिनों केरल में आयोजित कथित बीफ फेस्टिवल पर छिड़े विवाद के बाद जहां कांग्रेस अपनी छवि को लेकर चिंतित दिखी तो वहीं बीजेपी इस मुद्दे को और तूल देकर अपनी छवि चमकाने में लग गई। जिस तरह से पूरे देश में बीफ को लेकर संग्राम छिड़ा हुआ है उससे साफ प्रतीत हो रहा है कि यह मुद्दे यहीं थमने वाला नहीं है।

भारत की राजनीति का मुद्दा अब विकास नहीं ‘बीफ’ पर सिमट गया है। ऐसा पहली बार नहीं है जब ‘बीफ’ को लेकर पूरे देश में माहौल गरम है। दरअसल, कुछ ही दिन पहले भारत सरकार ने पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम की एक धारा में बदलाव किया। इसके बाद जिन मवेशियों की मवेशी बाजार से खरीद होती है उनको मारा नहीं जा सकता है। इस नियम का दक्षिण भारत में विरोध हो रहा है। इसी के तहत केरल में युवक कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बीफ फेस्टिवल का आयोजन किया और उससे जुड़ा एक वीडियो सामने आने के बाद विवाद शुरु हो गया। ‘बीफ फेस्टिवल’ का वीडियो सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपना लिया और कांग्रेस रक्षात्मक नजर आने लगी। दरअसल केरल में बीजेपी का जनाधार नहीं है। वो ऐसा स्टैंड ले सकते हैं जिसमें केरल में कामयाबी न मिले लेकिन दूसरे राज्यों और कांग्रेस को पीछे धकेलने में और नेतृत्व को रक्षात्मक मुद्रा में लाने में कामयाब होती है। हालांकि कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर बैकफुट पर आ गई है। कांग्रेस खेमे में पार्टी की छवि प्रभावित होने को लेकर चिंता बढ़ गयी है। जिस तरह से कांगे्रस को इस मुद्दे को लेकर डिफेंस करना चाहिए था वह नहीं कर पायी तो वहीं बीजेपी इस मुद्दे को भुनाने में लगी हुई है, जबकि मेघालय में बीजेपी नेता बर्नार्ड मरक ने पिछले दिनों बयान दिया था कि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो गोमांस पर प्रतिबंध नहीं होगा और बूचडख़ानों को कानूनी रूप से मान्यता दी जायेगी। उन्होंने तर्क दिया था कि इससे विभिन्न प्रकार के मांस की कीमतें घटेंगी। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बीजेपी को अपनी बात कहने की कला आती है। बीजेपी ने हमेशा ही भावनात्मक मुद्दे को अपना हथियार बनाया है और उसे इसका फायदा भी मिला है। उत्तर प्रदेश बड़ा उदाहरण है।
एक दौर था जब गाय का महत्व सिर्फ निबंध तक था, लेकिन आज गाय सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने का माध्यम बन गई है। पहले गाय घरों तक ही सीमित थी, लेकिन अब चौखट लांघ कर राजनैतिक अखाड़े में एक दूसरे को पटखनी देने में इस्तेमाल हो रही है। डेढ़ दशक पहले तक किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि भविष्य में गाय राजनीतिक दल व नेताओं की भाग्यविधाता बन जायेगी। आज योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के प्रहरी घोषित है तो उसमें भी गाय का ही योगदान है। गाय को राजनीति में लाने वाले योगी आदित्यनाथ ही है। राजनीति में आने के बाद जब उन्होंने गायों की दुर्दशा देखा तो उन्होंने इसकी सुरक्षा को प्रमुखता से उठाया। देखते ही देखते गाय को राजनीति में जगह मिल गई। चुनावों में जोर-शोर से गाय के मुद्दे को उठाया गया और उसका परिणाम भी सार्थक दिखने लगा। देखते-देखते गाय चुनावों में खासकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में सफलता की गारंटी बन गई। सीएम योगी के इस फार्मूले को बीजेपी ने भी हाथोहाथ लिया और इसे चुनावों में प्रमुखता से उठाया भी। योगी आदित्यनाथ ने भी सत्ता संभालने के बाद से अपनी प्रतिवद्घता को दोहराते हुए गाय की सुरक्षा को प्रमुखता पर रखा।
केन्द्र में मोदी सरकार के कार्यकाल को तीन बरस पूरे हो गए है। इन तीन सालों में कई बार गाय और ‘बीफ’ के मुद्दे पर बवाल हुआ। कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी ने अपने इस हथियार का इस्तेमाल किया। कई जगह सफलता भी मिली। फिलहाल एक बार फिर यह मुद्दा गरम है। इस मुद्दे को तूल देने की कोशिश जारी है। अब देखना होगा कि यह मुद्दा कुछ दिनों में खत्म होता है या किसी तरह 2019 तक इसे सुलगाए रखने की कोशिश जारी रहेगी।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.