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हुई छीछालेदर तब मानी सीबीआई

इस घोटाले की सीबीआई जांच न होने के कारण बीजेपी और त्रिवेंद्र सरकार एक दम बैकफुट पर थी। लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि एक ऐसा घोटाला जो बीजेपी के वक्त का न होकर कांग्रेस राज के दौरान का है, उस पर सीबीआई जांच के लिए कांग्रेस ही दौड़ और चीख रही है और सत्ता संभाल रही बीजेपी जांच से क्यों भाग रही है। हालांकि, त्रिवेंद्र सरकार ने सीबीआई को चिट्ठी लिखकर जांच करने की सिफारिश की थी, लेकिन मामला खराब हुआ केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की चिट्ठी से। उन्होंने राज्य सरकार को चिट्ठी भेज दी कि ज्यादा हल्ला न करें। सीबीआई जांच हुई तो एनएचएआई के अफसरों का हौसला गिर जाएगा। इससे राज्य में परियोजना का काम न सिर्फ प्रभावित होगा बल्कि आने वाले सालों में बाकी परियोजनाओं के लिए पैसे जारी होने में भी दिक्कत आएगी। यह गडकरी की राज्य सरकार को एक किस्म से न सिर्फ धमकी या कहिये ब्लैकमेलिंग थी। एक घोटाला जो तकरीबन 300 करोड़ के करीब का माना जा रहा है, उसकी जांच में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली मोदी सरकार ही आड़े आ रही थी।
यह आलम तब था जब खुद मुख्यमंत्री ने सीबीआई जांच की सिफारिश की थी और स्मरण पत्र भी भेजे थे। इसमें कोई शक नहीं की इस मामले में केंद्र सरकार के कदम ने मोदी सरकार की छवि को उत्तराखंड में तो खूब धक्का पहुंचाया। यह मान लिया गया कि इस मामले में जो सियासतदां फंस सकते हैं, वे पूर्व कांग्रेसी हैं लेकिन आज बीजेपी में हैं। उनको बचाने की कोशिश भी बीजेपी अंदरखाने कर रही है। सीबीआई जांच की सिफारिश सिर्फ दिखावा माना जा रहा था। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि बिना राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अफसरों की मिलीभगत के इतना बड़ा खेल इतने लम्बे समय तक नहीं खेला जा सकता है। उनको भी बचाने की कोशिश का नतीजा था कि सीबीआई जांच टाली जा रही थी। अलबत्ता, जिस वक्त कृषि भूमि को अकृषि दिखा कर मोटा मुआवजा कथित और तथाकथित किसानों को बांटा गया, उस दौरान उधमसिंह नगर, जहां का यह मामला है, में जिलाधिकारी रहे आईएएस अफसरों पर भी जांच की आंच तो आएगी ही। यह तो जांच में ही पता चल पाएगा कि, बतौर आर्बिट्रेटर क्या उन्होंने भी इस खेल में बड़ी भूमिका निभाई थी। यह जरूर है कि बतौर आर्बिट्रेटर वे सीधे कहीं फंसते नहीं दिखते हैं लेकिन साजिश का हिस्सा या सब कुछ देखते-जानते हुए भी आंख बंद करने का सुबूत निकल आया तो उनको दिक्कत होना स्वाभविक है।
इस मामले में उधमसिंह नगर के जिला पंचायत से जुड़े एक शख्स का नाम तो प्रमुखता से आ ही रहा है, बल्कि एक प्रमुख राजनेता जो कुछ महीने पहले कांग्रेस में थे, अब बीजेपी में हैं, का भी नाम खूब लिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार एक शक्तिशाली राजनीतिक धड़े ने इस घोटाले में बहुत सक्रिय भूमिका निभाई थी। एक चर्चित पीसीएस अफसर को, जो अब इसी मामले में निलंबित चल रहा है, को उस वक्त मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत ने सिर्फ इसी लिए उधमसिंह नगर भेजा था कि वह जा के उस राजनेता की हरकतों पर अंकुश लगाएं। ऐसा हुआ भी लेकिन उसके खिलाफ भी जम कर लॉबिंग हुई और वह आज तमाम दिक्कतों में घिरा हुआ है।
आईएएस अफसर सेंथिल पांडियन ने कुमायूं के आयुक्त रहते इस घोटाले की जांच की थी। उन्होंने घोटाले को सही पाया है लेकिन यह आधा भी नहीं है। उन्होंने सिर्फ अकृषि को कृषि भूमि दिखा कर पुरानी तारीखों में लैंड यूज परिवर्तन की बात की है। उनकी रिपोर्ट पर ही त्रिवेंद्र सरकार ने छह पीसीएस अफसरों को मुअत्तल किया। हकीकत यह है कि कई ऐसे मामले भी हैं, जिसमें सरकारी जमीन पर भी या तो करोड़ों रुपये का मुआवजा ले लिया गया या फिर कद्दावर राजनेताओं और माफियाओं ने मिल कर मुआवजा लेने की कुचेष्टा की। सरकारी तालाबों तक को अपना बता कर करोड़ों रुपये मुआवजे मांगे गए। इस खेल में पटवारी और लेखपालों तक की भूमिका रही, ऐसा बताया जाता है। सिर्फ, उनकी रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा बांटे गए। जमीन के मालिकाना हक के और कोई दस्तावेज थे ही नहीं। अब बात प्राधिकरण के अफसरों की। सूत्रों के अनुसार इस पूरे खेल में उनकी अहम भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। सच तो यह है कि घोटाले में प्राधिकरण के अफसरों का सक्रिय योगदान रहा। ऐसा कैसे मुमकिन है कि जिस प्राधिकरण का पैसा जा रहा है, वो खामोशी के साथ घोटाले होने देता रहा और क्या उसके घाघ किस्म के समझे जाने वाले अफसर इतने भोले हो गए थे कि उनको खेल का पता ही नहीं चल रहा था। कई मामलों में लोगों को जमीन का मुआवजा आर्बिट्रेटर ने कई गुणा बढ़ा कर देने के लिए कहा। प्राधिकरण सभी मामलों में उससे ऊपर की अदालत में क्यों नहीं गया? प्राधिकरण की भूमिका इस घोटाले में देखा जाए तो राज्य सरकार के अफसरों से किसी भी तरह कम नहीं है। राज्य सरकार के अफसर तो मध्यस्थ की भूमिका में थे। फायदा पाने वाला कोई और था और पैसा देने वाला भी कोई और.यह बात दीगर है कि इसी में राज्य सरकार के अफसरों ने हो सकता है अपनी हिस्सेदारी भी तय कर ली।
सियासी सूत्रों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग को लेकर मुखरता इसलिए दिखाई कि वह अपने साथ गद्दारी करने वाले एक प्रमुख सियासतदां को सबक सिखाना चाहते हैं। यह सियासतदां आज बीजेपी के प्रमुख अंग हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार लाख कहे कि सीबीआई स्वतंत्र जांच एजेंसी है, लेकिन इस मामले में साफ हो गया कि ऐसा बिलकुल भी नहीं है। जब तक केंद्र सरकार की इच्छा रही, जांच नहीं बैठी और जब केंद्र सरकार और बीजेपी की छिछालेदर जम कर होने लगी तो सीबीआई ने जांच हाथ में ले ली। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र जांच के हक में थे और उन्होंने केंद्र सरकार और पार्टी के शीर्ष नेताओं को समझाया कि सीबीआई जांच नहीं होती है तो पार्टी और सरकार को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक बनेगी। इतना ही नहीं त्रिवेंद्र ने स्पेशल टास्क फोर्स को भी घोटालों की जांच में झोंक डाला। तीन महीने पुरानी त्रिवेंद्र सरकार इसके साथ ही अब धीरे-धीरे फॉर्म में आती दिखने लगी है।

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