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जाने कहां गए वो दिन

यूं तो जिंदगी अनिश्चितताओं का नाम होती है, मगर राजनीति इससे भी ज्यादा अनिश्चित होती है। राजनीति में चमकते हुए सितारे कब गुमनाम अंधेरों में खो जाते हैं इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। भारतीय राजनीति खासतौर से भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति जिस व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती थी आज वह अपने ही पार्टी में उपहास का केन्द्र बनकर रह गया है। किसी जमाने में रथयात्रा निकालकर पूरे देश में हिंदुत्व का संदेश देने वाले लालकृष्ण आडवाणी आज जिस सूनी आंखों से राजनीति के मार्ग को निहार रहे हैं वह किसी भी व्यक्ति के लिए पीड़ाकारक हो सकता है, पर राजनीति इसी का नाम है। राजनीति में बुलंदियों पर जिस सीढ़ी से चढ़ा जाता है सबसे पहले उसी को गिराया जाता है। यह बात एक बार फिर साबित हो गई जब तमाम चर्चाओं के बाद लाल कृष्ण आडवाणी को राष्टï्रपति पद के लिए भाजपा ने नहीं चुना।

मोदी सरकार बनने के बाद से ही लाल कृष्ण आडवाणी को साइड लाइन किए जाने की चर्चाए आम थीं, लेकिन राष्टï्रपति पद के लिए उनके नाम का का चयन न होने ऐसी खबरों को बल मिल गया है। दरअसल मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले आडवाणी सहज नहीं थे। उनका यह आचरण मोदी गुट के लोगों को पंसद नहीं आया था। जाहिर है जब पार्टी में मोदी नाम का परचम लहरा रहा हो तो हर उस व्यक्ति को किनारे लगना ही था जो सपने में भी मोदी के खिलाफ जा सकता था। ऐसा नहीं है कि इसके लिए लाल कृष्ण आडवाणी जिम्मेदार न हो। दरअसल पार्टी के राष्टï्रीय अध्यक्ष रहते हुए लाल कृष्ण आडवाणी ने बड़ी गलती कर दी थी। उनको लगता था कि हिंदुत्व के दम पर पार्टी कभी सत्ता का सुख नहीं भोग पायेगी। इसके लिए कुछ और सहयोगियों को साथ में लाना ही होगा। आडवाणी के उग्र हिंदुत्व चेहरे के चलते ये संभव नहीं था कि बाकी धर्मनिरपेक्ष दल उनके साथ आ जाते। इस दौर में आडवाणी को अपना धर्मनिरपेक्ष चेहरा दिखाने की जरूरत महसूस हुई। कहा जाता है कि राजनीति में गलतियों के लिए कोई माफी नहीं होती। इस दौर में आडवाणी अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर बैठे।
खुद को धर्मनिरपेक्ष करने के लिए आडवाणी अपने पाक दौरे में जिन्ना की मजार पर जा पहुंचे। उनको लगा कि जिन्ना की मजार पर जाकर जिन्ना की तारीफ कर देने से वह साबित कर सकेंगे कि वह उग्र हिंदुत्व के चेहरे नहीं है बल्कि वह सेक्युलर विचारधारा का समर्थन करते हैं, मगर आडवाणी का यह दांव उनकी जिंदगी का सबसे गलत दांव साबित हुआ। जो राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ आडवाणी के चेहरे को निर्विदाद रूप से सबसे ज्यादा पंसद करता था, जिन्ना के मजार पर जाने से वह भडक़ गया और उसने मान लिया कि आडवाणी जैसा कट्टïर स्वयं सेवक अब उसका नहीं रहा। लिहाजा संघ आडवाणी के इस कदम से बेहद नाराज हो गया और आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ गया। इसके बाद आडवाणी को अपने पक्ष में लॉबिंग उससे भी भारी पड़ गई। दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले आडवाणी को लगता था कि अगर गठबंधन की सरकार बनी तो उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे आगे होगा। इसीलिए वह विपक्ष के कुछ प्रमुख पार्टियों के प्रमुख नेताओं के संपर्क में आ गए। यह सारी रणनीति इस बात के लिए थी कि अगर लोकसभा चुनाव में कुछ कम सीटें रह गई तो वह प्रधानमंत्री पद के लिए ऐसा नाम होंगे जिस पर संभवत: विपक्ष भी राजी हो जायेगा, मगर जब सरकार प्रचण्ड बहुमत से आयी तो आडवाणी के सपने धराशायी हो गए। पूरे देश में चली मोदी लहर ने आडवाणी के सपनों को चूर-चूर कर दिया।
उधर मोदी खेमा भी इस राजनीति से आहत था। नरेन्द्र मोदी को नजदीक से जानने वाले लोग जानते हैं कि राजनीति में जिसने भी उनका विरोध किया मोदी ने उसको कभी आगे नहीं आने दिया। शुरुआती दौर में इस बात की चर्चा चली कि पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ आयी सरकार में आडवाणी की हैसियत क्या होगी, मगर मार्गदर्शक मंडल बनाकर मोदी गुट ने साफ कर दिया कि अब भारतीय राजनीति में वहीं होने जा रहा है जो वह चाहेंगे। तीन साल तक आडवाणी खेमा खामोशी के साथ राष्टï्रपति चुनाव का इंतजार करता रहा। आडवाणी खेमे को उम्मीद थी कि राष्टï्रपति पद के लिए उनका नाम फाइनल हो जायेगा, मगर जीवन और राजनीति के अंतिम दौर में आडवाणी को शायद यह पीड़ा झेलनी ही थी। न सिर्फ राष्टï्रपति पद के लिए एक अंजान नाम को फाइनल कर दिया गया, बल्कि इस बारे में आडवाणी से सलाह भी नहीं ली गई। ये ही नहीं सोशल मीडिया पर जिस तरह उनका उपहास उड़ाया गया वह भी किसी को मायूस करने के लिए काफी था, मगर ये राजनीति का क्रूर चेहरा है जिसे सबको झेलना ही होता है।
जो बीत गए वो जमाने नहीं आते आते हैं नए लोग, पुराने नहीं आते।।

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