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घपले-घोटालों से हलकान

देहरादून। उत्तराखंड के साथ ही आज से 17 साल पहले झारखंड और छत्तीसगढ़ का भी गठन हुआ था। तब यह समझा जा रहा था कि छोटा और पहाड़ी राज्य होने के कारण उत्तराखंड न सिर्फ अन्य राज्यों से बहुत आगे जाएगा, बल्कि यहां, खुशहाली, समृद्धि और विकास की रफ्तार कहीं ज्यादा दिखाई देगी। इस राज्य के गठन के लिए तब जी जान लगा कर पुलिस की गोलियों और लाठी-डंडों के सामने सीना तान देने वाले पुरुष-महिलाओं, युवाओं और बच्चों को शायद इसका अंदाज नहीं रहा होगा कि जिस राज्य को वे देश के सम्मुख आदर्श के तौर पर पेश करने का ख्वाब देख कर आन्दोलन चला रहे हैं और शहादत दे रहे हैं, वह अस्तित्व में आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा घपलों और घोटालों के कारण बटोरेगा। इसमें दो राय नहीं है कि राज्य के गठन के बाद अगर सबसे ज्यादा बदनामी और कुख्याति किसी राज्य के हिस्से आ रही है तो वह उत्तराखंड ही है। इस राज्य ने न सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता के मामले में देश के अन्य राज्यों को पीछे छोड़ दिया बल्कि आए दिन यहां के नौकरशाह और सियासतदां लगातार किसी न किसी विवादों और घोटालों में फंसते रहे हैं। यह विडम्बना है कि इनमें मुख्यमंत्री तक शामिल हैं। कम से कम शहीद आन्दोलनकारियों के ख्वाबों का प्रदेश ऐसा तो नहीं था।

ऐसे वक्त जब कि प्रदेश केदारनाथ आपदा घोटाले और उधमसिंह नगर में एनएच-74 घोटाले के कारण देश भर में मीडिया का ध्यान आकृष्ट कर रहा है, विधानसभा में पिछले साल हुई डेढ़ सौ से ज्यादा भर्तियों में घपले के कारण वह फिर सुर्खियों में है। इस मामले में नैनीताल उच्च न्यायालय का सरकार और विधानसभा प्रशासन से जवाब मांगना बहुत अहम कदम समझा जा रहा है। इस मामले में अगर न्यायालय ने कोई जांच बिठा दी तो कई बड़े नामों का इसमें फंसना स्वाभाविक समझा जा रहा है। ये भर्तियां पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान जब गोविन्द सिंह कुंजवाल विधानसभा अध्यक्ष थे, तब की गई थीं। आरोप हैं कि 158 अलग-अलग किस्म के पदों पर भर्तियां आनन-फानन में कर दी गईं। इसके लिए किसी तरह की तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिसकी पकड़ थी, वह नियुक्ति पा गया। आरोप यह भी लगे कि इसमें खूब सिफारिशें और घूसखोरी हुई। हालांकि, यह अभी तक प्रमाणित नहीं हुए हैं। ये सिर्फ आरोपों के स्तर पर हैं। बहरहाल, जिस तरह से भर्तियां हुईं, उस पर सवाल उठने स्वाभाविक है।
यह सवाल पूछा जा सकता है कि इतनी ज्यादा और बड़े पदों पर भी भर्तियों के बावजूद इनकी सार्वजनिक विज्ञप्ति क्यों नहीं निकाली गई। ऐसा होता तो ज्यादा लोग और अधिक काबिल लोगों के सामने आने की सम्भावना रहती। ऐसा न कर चंद लोगों में से ही योग्य अभ्यर्थी चुनने की मजबूरी रही। इस कदम के पीछे खास लोगों को चुनने का शक जताया जा रहा है। अल्मोड़ा से ही 32 लोगों का चयन हो गया। खास बात यह है कि कुंजवाल का यह गृह जिला भी है। भर्तियां ऐन चुनाव से पहले हुईं साथ ही बिना चयन समिति का गठन किए हो गईं। इस मामले में घोटाले का शक जताते हुए राजेश चंदोला, हिमांशु जोशी, अंकुर रावत, राजेंद्र सत्यवली ने नैनीताल उच्च न्यायालय की शरण ली थी। उच्च न्यायालय में मुख्य सचिव, स्पीकर, विधानसभा सचिव के साथ ही कुंजवाल (अब पूर्व) को भी उपनल के प्रबंध निदेशक और चयनित अभ्यर्थियों सहित पक्षकार बनाया हुआ है।
विधानसभा में हुई भर्तियों में खेल का आरोप कोई पहली बार नहीं लगा है। इससे पहले जब हरबंस कपूर और यशपाल आर्य स्पीकर थे, तब भी विधानसभा में बेहिसाब भर्तियां हुईं और इसमें तमाम शिकायतों के बावजूद सरकार कुछ कर नहीं पाई। ऐसा होता रहा है कि हर भर्ती के दौरान स्पीकर के खासमखास लोग ही ज्यादा नियुक्ति पाते रहे हैं। इतना ही नहीं सचिवालय में अपर निजी सचिव रहे और राज्य सरकार के विभागों में निचले पदों पर कार्य करते रहे लोग भी जुगाड़ के चलते विधानसभा में अपना संविलियन कहीं उच्च पदों पर कराने में सफल होते रहे हैं। आज वे संयुक्तसचिव तक हो चुके हैं। विधानसभा में भर्ती घोटाले के उछलने के साथ ही एक बार फिर यह जाहिर हो गया कि यह प्रदेश पैसों वालों, घोटालेबाजों और जुगाड़ वालों का है। सामान्य और शरीफ लोगों के लिए यहां सिवाय निराशा और नाकामी के कुछ नहीं है।
पूर्व में हुए पटवारी, दारोगा और होम्योपैथिक चिकित्सक भर्ती घोटाले इसको साबित करते हैं। इसके साथ एल्डिको-सिडकुल, केदारनाथ आपदा, जल विद्युत् परियोजना आवंटन घोटाले के बाद एनएच-74 घोटाले भी घोटालों की दुनिया में मील का पत्थर साबित होते रहे हैं। एनएच-74 घोटाला 300 करोड़ रुपये से ज्यादा का माना जा रहा है। इस बात पर हैरानी जताई जा रही है कि सीबीआई जांच शुरू होने से जुड़ी अधिसूचना अभी तक क्यों जारी नहीं हो पाई है। भले राज्य सरकार की विशेष जांच दल और पुलिस इसकी अपने स्तर पर जांच कर रही है। इससे किसी को खास नतीजा निकलने की उम्मीद नहीं है। यह प्रदेश और यहां के लोगों के लिए कतई उत्साहजनक नहीं है कि घोटालों और विवादों में मुख्यमंत्रियों जिसमें मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत (ढेंचा बीज घोटाले में नाम आया था, लेकिन जांच में उनको क्लीन चिट मिल गई है) और हरीश रावत (सरकार बचाने के लिए पैसा खर्च करने को तैयार रहना), विजय बहुगुणा (केदारनाथ आपदा के दौरान) के नाम खास तौर पर उछले। इनमें से किसी भी मामले में हालांकि, कोई नहीं फंसा है। यहां लोग कैसे पैसों की नदी अपनी ओर मोड़ रहे हैं, यह पिछले दिनों उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के महाप्रबंधक एसए शर्मा और उनके खासमखास समझे जाने वाले निगम के पसंदीदा ठेकेदार अमित शर्मा के यहां आयकर विभाग के छापे के दौरान खुल कर सामने आया। दोनों शर्माओं के यहां बेहिसाब माल-असबाब का पता चला। इस मामले में अभी परीक्षण चल ही रहा है। महाप्रबंधक शर्मा को आखिर उनकी राज्य सरकार ने इज्जत लुटते देख मुअत्तल कर दिया और ठेकेदार शर्मा को ब्लैक लिस्ट कर दिया। निगम के निलंबित महाप्रबंधक के यहां मिली संपत्ति देखकर उनको उत्तर प्रदेश में पकड़े गए मुख्य अभियंता यादव सिंह का उत्तराखंडी संस्करण माना जा रहा है, जबकि एक कथित विडियो क्लिप के बारे में बताया जा रहा है कि उसमें खुद अमित शर्मा अपने पास 500 करोड़ की संपत्ति होने का दावा कर रहा है। नियुक्तियों में घोटाले का आलम यह है कि उत्तराखंड पॉवर कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक की कुर्सी पर बीसीके मिश्र और वरिष्ठ आईएएस अफसरों को दी जाने वाली अपर स्थानिक आयुक्त की कुर्सी पर शिक्षक मृत्युंजय मिश्र को बिठाए जाने के पीछे भी बड़ा खेल होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। मृत्युंजय का नाम उत्तराखंड आयुर्वेदिक चिकित्सा परिषद के चुनाव में हुए घपलों में भी आ रहा है। उनके साथ ही सचिवालय कैडर के अपर सचिव गोविन्द वल्लभ ओली का नाम भी इसी मामले में उछल रहा है। इसकी जांच केंद्र सरकार भी कर रही है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सरकार अगर घोटालों और घपलों को थाम पाती है तो यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में शुमार की जाएगी।

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