You Are Here: Home » UTTAR PRADESH » दहक रहा है दार्जिलिंग

दहक रहा है दार्जिलिंग

यह सबके लिए एक मिसाल है कि नेता का एक बयान किसी क्षेत्र में कितनी अशांति फैला सकता है, पर नेता इससे कोई सबक लेंगे, ऐसा मुझे नहीं प्रतीत होता है। पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग क्षेत्र इसका ताजा उदाहरण है। पिछले कुछ दिनों से यहां हिंसक आंदोलन छिड़ा हुआ है, शांत-सा पहाड़ी क्षेत्र आगजनी, धरने प्रदर्शन और आंदोलन का केंद्र बना हुआ है।
मई में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक घोषणा की कि पहली कक्षा से ही सभी विद्यार्थियों को बांग्ला भाषा पढऩी अनिवार्य होगी। हालांकि बाद में सफाई आयी कि दार्जिलिंग में यह अनिवार्य नहीं होगी, लेकिन तब तक गोरखा नेता इसको मुद्दा बना चुके थे। दार्जिलिंग के लोग पहले से ही भाषा को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। अविश्वास और असंतोष की भावना वहां पहले से ही थी। बस, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के नेता सडक़ों पर उतर आये और पूरा क्षेत्र आग में जलने लगा। बात भाषा की अनिवार्यता से आगे बढ़ गयी और पृथक राज्य पर जा टिकी है। 2013 के बाद इस इलाके में इतनी हिंसा कभी नहीं हुई। इस समय पूरा क्षेत्र अशांत है, उद्वेलित है।
मैं इस बात का पक्षधर हूं कि किसी भी समुदाय पर कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए। अगर दार्जिलिंग के लोग नेपाली और हिंदी पढऩा चाहते हैं, तो उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन अपनी बात मनवाने का यह तरीका भी उचित नहीं है। ममता बनर्जी की घोषणा के बाद पहले तो शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन का दौर शुरू हुआ, उसके बाद दोनों ओर से बयानबाजी का दौर चला, जिसके बाद आंदोलन हिंसक हो उठा। ममता बनर्जी का जो स्वभाव है, उससे हम सब वाकिफ हैं, वह हर बात को नाक का सवाल बना लेती हैं और मजाल है जो उससे वह पीछे हट जाएं। अब दोनों ओर से सख्त भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। ममता बनर्जी ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस बल का इस्तेमाल जारी रखा जायेगा। ममता का आरोप है कि जब वह दार्जिलिंग अपने मंत्रियों के साथ बैठक कर रही थीं, तब मोर्चे के नेताओं ने हमले की योजना बनायी थी। पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन यह सच है कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) समर्थकों ने इस दौरान भारी प्रदर्शन और पथराव किया था। ममता बनर्जी के बयान के बाद जीजेएम नेता बिमल गुरुंग की ओर से व्हाट्सएप पर जवाबी बयान आया कि यह चरम संघर्ष है, वह अंतिम सांस तक लड़ेंगे।
हालांकि यह भी सच है कि भाषाई घोषणा ने तो बस आग में घी का काम किया, असंतोष और अविश्वास की खाई काफी समय से गहरा रही थी। दिक्कत यह है कि ममता सरकार और जीजेएम दोनों इस मुद्दे को अलग-अलग नजरिये से देखते हैं। राज्य सरकार मानती है कि यह कानून व्यवस्था का मसला है, जबकि जीजेएम इसे कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा मानता है। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि दार्जिलिंग से सांसद भाजपा के एसएस अहलूवालिया हैं। गोरखा मोर्चे की मदद से वह संसद पहुंचे हैं और वही केंद्र सरकार के समक्ष गोरखा प्रतिनिधियों की पैरवी कर रहे हैं। हाल में जीजेएम के महासचिव रोशन गिरी और सांसद एसएस अहलूवालिया ने राजनाथ सिंह के समक्ष अपनी मांगें रखीं। हाल में जीजेएम के नेता बिमल गुरुंग के घर की तलाशी ली गयी थी। सरकार का कहना है कि बड़ी संख्या में हथियार बरामद किये गये। दूसरी ओर गिरी का कहना है कि हम आदिवासी हैं। पुलिस ने हमारे परंपरागत उपकरणों को हथियार के रूप में दिखाया है। यही कारण है कि हम गोरखालैंड की मांग कर रहे हैं, क्योंकि हमारी संस्कृति, विरासत और परंपराओं का यहां कोई सम्मान नहीं है। अगर गौर से देखें, तो ऐसा लग रहा है कि 30 साल बाद इतिहास जैसे अपने आपको दोहरा रहा है। 1980 के दशक में गोरखालैंड को लेकर दार्जिलिंग और इसके आसपास का इलाका सुलग उठा था। उस वक्त सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था। उन्होंने ही पृथक गोरखालैंड की मांग रखी थी। इस बार चेहरा बिमल गुरुंग का है और संगठन के रूप में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सामने है। 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आयी थी, तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा स्वायत्त पर्वतीय परिषद के गठन पर सहमत हो गया था। बिमल गुरुंग इसके प्रमुख कार्यकारी बनाये गये।
उस दौरान उनकी दलील थी कि पृथक राज्य की लड़ाई वह केंद्र सरकार के साथ लड़ेंगे, लेकिन इस बीच तृणमूल कांग्रेस ने दार्जिलिंग में अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू कर दी। सरकार ने कई विकास बोर्ड बनाये और उनमें अलग-अलग जातीय समुदाय के लोगों को जिम्मेदारी सौंप दी। इसे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने मोर्चे को कमजोर करने की ममता सरकार की कोशिश माना। मई में जब मिरिक नगरपालिका के चुनाव हुए तो तृणमूल कांग्रेस ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को हराकर इस पर कब्जा जमा लिया। मोर्चे को अपनी जमीन खिसकती नजर आयी और उनके मतभेद शुरू हो गये। इस बांग्ला भाषा की घोषणा ने मोर्चे को आंदोलन का हथियार सौंप दिया। पिछले दिनों ममता बनर्जी ने क्षेत्र के विकास को लेकर दार्जिलिंग में कैबिनेट की बैठक बुलायी, तो उनका स्वागत प्रदर्शन, नारेबाजी और भारी पथराव से हुआ। हालात की गंभीरता को देखते हुए सेना बुलानी पड़ी।
कैबिनेट के अन्य सदस्य तो चले गये लेकिन ममता ने दार्जिलिंग में मोर्चा जमा लिया। हालांकि उस दौरान क्षेत्र में बड़ी संख्या में पर्यटक थे, जो इस इलाके की रोजी-रोटी का सवाल है, इसलिए आंदोलन थोड़ा स्थगित रहा। लेकिन जैसे ही पर्यटक लौटने लगे, आंदोलन ने जोर पकडऩा शुरू कर दिया। अब हालात बेकाबू होते नजर आ रहे हैं और राजनीति इसमें घी का काम कर रही है। दार्जिलिंग को यदि शांत करना है तो राज्य और केंद्र सरकार दोनों को पहल करनी होगी और राजनीतिक समस्या का मिल बैठकर राजनीतिक समाधान निकालना होगा, तभी जाकर इस पर्वतीय इलाके की आग शांत होगी।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.