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गोरखालैंड के समर्थन में उतरे पूर्व जनरल

परमवीर चक्र विजेता थापा का अपमान

देहरादून। दार्जिलिंग और आसपास ही नहीं बल्कि देश और विदेश में इन दिनों अलग गोरखा राज्य गोरखालैंड के समर्थन में जबरदस्त रैलियां निकल रही हैं। देहरादून के गोर्खालियों ने भी गोरखालैंड राज्य के हक में देहरादून में जब रैली निकाली और गांधी पार्क के मुख्य द्वार पर धरना दिया तो सेना के अनेक पूर्व अफसरों ने भी इसमें जम कर शिरकत की। सबसे खास शिरकत पूर्व मिलिट्री अत्ताची लेफ्टिनेंट जनरल शक्ति गुरुंग की रही। सेना के पूर्व अधिकारियों की भारी तादाद में गोरखालैंड राज्य के समर्थन में उतरने से केन्द्रीय और राज्य सरकार की खुफिया एजेंसियों के भी कान खड़े हो गए हैं। उत्तराखंड के बाकी हिस्सों से भी गोरखालैंड राज्य के समर्थन में आवाजें उठने लगी हैं।
पूर्वोत्तर में कोर कमांडर रह चुके और देश के पहले गोरखाली लेफ्टिनेंट जनरल शक्ति गुरुंग के साथ उनकी पत्नी मधु गुरुंग ही नहीं बल्कि कई पूर्व ब्रिगेडियर, अन्य रैंक के पूर्व सेनाधिकारी और जवान भी शरीक हुए। सभी ने रैली के बाद धरना स्थल पर कहा कि सरहद पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने और देश की हिफाजत के लिए हमेशा जान देने और जान लेने की अनेक मिसालें पेश करने के बावजूद गोरखा जाति के बारे में जिस तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपमानजनक बातें कही हैं, वह शर्मनाक है। ममता को पता होना चाहिए कि दार्जिलिंग पहले पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं होता था। वहां की संस्कृति और रहन-सहन बंगालियों से पूरी तरह अलग है। गोरखालैंड राज्य की मांग वैसी ही है, जैसे कि उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना राज्य के गठन से पूर्व वहां के लोग उठाते रहे हैं। राज्य की मांग पूरी तरह जायज ही नहीं है बल्कि भारतीय संविधान के अंतर्गत है। गोरखालैंड आन्दोलन को जो लोग देश विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं वे असल देश विरोधी है। आन्दोलनकारियों ने कहा कि गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे गोरखाओं पर ममता और केंद्र सरकार के बल की तरफ से गोलियां चला कर उनकी हत्या करना शांत गोरखाओं को हिंसक होने के लिए उकसाएगा। इस बारे में केंद्र सरकार को तुरंत दखल देना चाहिए। केंद्र सरकार के पास सीधे राज्य बनाने का अधिकार है। इसका इस्तेमाल मोदी सरकार को गोरखालैंड मामले में करना चाहिए। पूर्व ब्रिगेडियर पीएस गुरुंग, के एस थापा, उमा उपाध्याय और पूजा सुब्बा भी धरने पर बैठने वालों में शामिल थे। इतनी तादाद में पूर्व सैन्याधिकारियों की शिरकत निश्चित रूप से अहम घटना मानी जा रही है। हालांकि, उन्होंने कहा कि वे लोकतान्त्रिक तरीके से आन्दोलन चलाए जाने का समर्थन करते हैं। इसी बीच स्थानीय गोर्खालियों में तब रोष भडक़ गया जब गढ़ी कैंट में छावनी परिषद दफ्तर के सामने परमवीर चक्र विजेता धन सिंह थापा लिखा सीमेंट का मार्ग प्रदर्शक चबूतरे के भीतर डाल दिया गया। इससे न सिर्फ नाम ही ऊपर रह गया है बल्कि यह बहुत अपमानजनक भी लग रहा है। गोर्खालियों ने कहा कि यह चाहे राज्य सरकार या फिर कैंट बोर्ड की एजेंसी ने किया हो, देश के लिए जान की बाजी लगा देने वाले योद्धा का अपमान है।
आज से 25 साल पहले भी कैंट बोर्ड ने इस सीमेंट के मार्ग प्रदर्शक को हटा दिया था। तब भी गोर्खालियों ने विरोध स्वरुप आन्दोलन किया था। तब इसको फिर लगा दिया गया था। गोरखा नेता सूर्यविक्रम शाही ने इसको सोची-समझी राजनीति, गोर्खालियों के देश के प्रति वफादारी और योगदान को कम करने और उनको अपमानित करने की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि अगर इस मार्ग प्रदर्शक को सम्मानजनक तरीके से नहीं लगाया गया तो वे एक आन्दोलन इसके लिए भी चलाएंगे।

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