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अदालत-सरकार हुईं सख्त

विलासिता की वस्तुएं खरीदने पर रोक

गंभीर बीमार शिक्षकों को अनिवार्य रिटायरमेंट

देहरादून। प्रदेश में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा और शिक्षकों की लापरवाही के किस्से कोई ढंके-छुपे नहीं रह गए हैं। मोटे वेतन के बावजूद न तो शिक्षक पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंचते हैं न ही उनमें वो काबिलियत दिखती है जो निजी स्कूलों में उनसे पांच-छह गुना कम तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों में दिखाई देती हैं। प्रशासन भी इस मामले में कम जिम्मेदार नहीं है जो शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने में तो दिलचस्पी दिखाती नहीं है लेकिन विलासिता की वस्तुएं खरीदने में कतई पीछे नहीं रहता है। ऐसे में नैनीताल हाईकोर्ट का कार, एयर कंडिशनर, वाटर प्योरीफायर जैसे विलासिता की वस्तुएं खरीदने पर रोक लगाना वाकई उचित फैसला कहा जाएगा। इस बीच सरकार ने सुधार का बड़ा कदम उठाने का सैद्धांतिक फैसला कर लिया। इसमें उन शिक्षकों को अनिवार्य तौर पर रिटायर करने का प्रस्ताव है, जो गंभीर रूप से बीमार हैं और सिर्फ मनमाफिक जगह पर ही सेवा कर सकते हैं।
ये दोनों फैसले अहम हैं और सरकार का फैसला प्रशासन और शिक्षा में सुधार के नजरिये से ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होगा। अदालत का विलासिता की चीजें खरीदने पर रोक लगाने का फैसला उसके नाराजगी के तौर पर भी देखा जा सकता है। हाई कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में बच्चों को न्यूनतम जरूरतें पूरी करने के आदेश सरकार को दिए थे। यह पूरा न होने पर उसका यह आदेश सामने आया। देहरादून के दीपक राणा ने पिछले साल स्कूलों की दुर्दशा के बारे में याचिका दायर की थी। उस पर हाई कोर्ट ने सरकार को आदेश दिए थे, जो पूरे नहीं हो पाए। अदालत में शिक्षा सचिव चंद्रशेखर भट्ट भी तलब किए गए। आदेश में कहा गया कि अगर स्कूलों में बच्चे फर्श पर बैठ कर पढऩे को मजबूर हैं तो फिर मास्टर और अफसर भला क्यों एसी में बैठे, सरकारी कार में आएं और मशीन का साफ पानी पिए। सरकार ने भी अपनी तरफ से कुछ कडक़ फैसले ले कर शिक्षकों में खलबली मचा दी है। अब तक जो शिक्षक खुद को शारीरिक रूप से अक्षम बता कर तबादले पर जाने से बचते रहे हैं, उनके लिए सरकार ने सोचा है कि उनको अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया जाए। उनकी जगह स्वस्थ और काम कर सकने वाले शिक्षकों को रखा जाएगा। आम तौर पर ऐसा होता रहा है कि सुगम में तैनात शिक्षक दुर्गम में तबादला होने पर खुद को गंभीर बीमारी का शिकार बता कर और मेडिकल सर्टिफिकेट देकर खुद को तबादले पर जाने से रोक लेते थे। दूसरी तरफ जिनका तबादला दुर्गम से सुगम में हो जाता है वे किसी न किसी तरह खुद को कार्यमुक्त करा के सुगम में आ जाते हैं। इससे दुर्गम के स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होते हैं या फिर उनकी नफरी आधी भी नहीं रह जाती है।
स्कूलों में पढ़ाई का स्तर न होने या फिर शिक्षकों के न होने के कारण भी कई लोग बच्चों की खातिर पहाड़ से तराई की तरफ पलायन कर जाते हैं। शिक्षा मंत्री अरविन्द पांडेय अगर अपनी सोच को सख्ती से लागू कर पाए तो यह उनका बड़ा और ऐतिहासिक कदम कहा जाएगा। यह कदम उठाने के लिए उनके पास यह सही वक्त भी है। खास तौर पर यह देखते हुए कि चुनाव अभी दूर-दूर तक नहीं हैं।

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