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शहर संवारने की कवायद में अपने ही अड़े

बीजेपी नेताओं को ही नहीं भा रहा सरकार का कदम

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक की जुगलबंदी देहरादून शहर को संवारने में रंग दिखा रही है। एक बार फिर बीजेपी सरकार के दौर में ही राजधानी की मुख्य सडक़ों को चौड़ा कर यातायात बेहतर करने और अवैध निर्माण हटाने का अभियान चला। आम लोग इससे खुश दिख रहे हैं लेकिन बीजेपी के ही नेता इस मुहिम के विरोध में आ खड़े हुए हैं। वे इसके विरोध में न सिर्फ पार्टी मंच पर आवाज उठा रहे हैं बल्कि सरकार की आलोचना करने से भी नहीं चूक रहे हैं। यह बात अलग है कि यह उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है,जो भाजपाई विरोध कर रहे हैं वे उसी क्षेत्र की राजनीति करते हैं जहां अभियान चल रहा है।
पिछली बार जब रमेश पोखरियाल निशंक की सरकार थी तब पहली बार बीजेपी सरकार ने घंटाघर और चकराता रोड के आसपास अवैध निर्माण और अतिक्रमण को खत्म किया था। इस मामले में सरकार और निशंक की तब खूब तारीफ हुई थी। भले कारोबारियों ने तब भी जम कर विरोध किया था लेकिन आज चकराता रोड चौड़ी है और घंटाघर के पास बोटल नैक नहीं है तो इसके लिए निशंक और उस वक्त के जिलाधिकारी डॉ. राकेश कुमार को उसका श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए। राकेश ने तमाम विरोधों और राजनेताओं के दबावों से बेअसर रहते हुए अपना कामकाज जारी रखा था। राकेश की भूमिका अब मौजूदा जिलाधिकारी मुरुगेशन निभा रहे हैं और निशंक की तरह ही त्रिवेंद्र ने भी अफसरों को शहर को संवारने के लिए फ्री हैण्ड दे दिया है।
अभियान के दौरान घंटाघर, दर्शनलाल चौक, इनमुल्ला बिल्डिंग, अंतरराज्यीय बस अड्डा की तरफ के अवैध निर्माण सुबह से लेकर देर रात तक अभियान चला कर खत्म कर दिया गया। इस मामले में प्रभावित लोगों के साथ ही खुद बीजेपी के बड़े नेताओं जिनमें अनिल गोयल, उमेश अग्रवाल और विशाल गुप्ता जैसे लोग भी शामिल थे, ने अभियान को रुकवाने की कोशिश ही नहीं की बल्कि जम कर विरोध भी किया। उन्होंने मुख्यमंत्री और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष अजय भट्ट तक भी आवाज पहुंचाई लेकिन अभियान तभी रुका जब काम पूरा हो गया। त्रिवेंद्र ने इस कदम को तब उठाया जब उनकी सरकार पर कोई दबाव नहीं है। सरकार अभी शुरू ही हुई है। यह निश्चित रूप से सख्त और कड़वे कदम उठाने और फैसले करने के लिए उचित वक्त है। इससे पहले ट्रांसपोर्ट नगर पर भी सरकारी जीसीबी ने अपना काम कर दिखाया था। तभी साफ हो गया था कि सरकार अपने इरादे से डिगने वाली नहीं है। शहरी विकास मंत्री और देहरादून के प्रभारी मंत्री मदन कौशिक ने भी कुछ दिन पहले ही इसके बारे इशारा कर दिया था कि शहर को संवारने के लिए अप्रिय कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। यह अभियान सिर्फ उन बीजेपी नेताओं के लिए परेशानी का सबब बन सकता है जो प्रभावित इलाकों से ताल्लुक रखते हैं। वे पार्टी टिकट के लिए दावेदारी पेश करते रहते हैं। उनके विरोध से एक तरफ पार्टी और सरकार नाराज हो सकती है। दूसरी तरफ इलाके के लोग भी अपना नुकसान होने से उन पर बरसना नहीं छोड़ रहे हैं।

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