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चरणदास चोर और आगरा बाजार के लिए आज भी याद किये जाते हैं हबीब

हबीब ने एक पत्रकार की हैसियत से अपने कॅरियर की शुरुआत की और रंगकर्म तथा साहित्य की अपनी यात्रा के दौरान कुछ फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं तथा उनमें काम भी किया। वर्ष 1982 में रिचर्ड एटनबरो की मशहूर फिल्म गांधी में भी उन्होंने एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। 

गमंच को एक नई शक्ल देने वाले प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर (85) बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे जिन्होंने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम किया। एक सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्मे हबीब को उनके बहुचर्चित नाटकों चरणदास चोर और आगरा बाजार के लिए हमेशा याद किया जाएगा जो उनके सबसे ज्यादा लोकप्रिय और प्रभावशाली नाटक माने जाते हैं। हबीब ने इनके अलावा भी बहुत से नाटकों की रचना की एवं मंचन किया।
उनका पूरा नाम हबीब अहमद खान था लेकिन जब उन्होंने कविता लिखनी शुरू की तो अपना तखल्लुस तनवीर रख लिया और उसके बाद से वह हबीब तनवीर के नाम से लोगों के बीच मशहूर हो गए। हबीब ने एक पत्रकार की हैसियत से अपने कॅरियर की शुरुआत की और रंगकर्म तथा साहित्य की अपनी यात्रा के दौरान कुछ फिल्मों की पटकथाएं भी लिखीं तथा उनमें काम भी किया। वर्ष 1982 में रिचर्ड एटनबरो की मशहूर फिल्म गांधी में भी उन्होंने एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। हबीब ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा रायपुर के लौरी म्युनिसिपल स्कूल से पास की थी तथा बीए नागपुर के मौरिश कालेज से किया। हबीब की एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हुई। केवल 22 साल की उम्र में वह 1945 में मुंबई चले गए जहां उन्होंने आकाशवाणी में काम किया। इसके बाद उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखे और कुछ में काम भी किया।
मुंबई में हबीब ने प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्यता ली और इप्टा का प्रमुख हिस्सा बने। एक समय ऐसा आया जब इप्टा के प्रमुख सदस्यों को ब्रिटिश राज के खिलाफ काम करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और तब इप्टा की बागडोर हबीब को सौंप दी गई। वर्ष 1954 में वह दिल्ली आ गए जहां उन्होंने कुदमा जैदी के हिन्दुस्तान थिएटर के साथ काम किया। इस दौरान वह बच्चों के थिएटर से भी जुड़े रहे और उन्होंने कई नाटक लिखे। इसी समय उनकी मुलाकात कलाकार और निर्देशिका मोनिका मिश्रा से हुई और बाद में दोनों ने शादी कर ली।
हबीब साहब के नाम से मशहूर हबीब ने 1954 में ही चरणदास चोर नाम का नाटक लिखा जो कि 18वीं सदी के शायर नजीर अकबराबादी पर आधारित था। नजीर मिर्जा गालिब की पीढ़ी के शायर थे। इस नाटक के लिए उन्होंने पहली बार दिल्ली के पास ओखला गांव में रहने वाले जामिया मिलिया इस्लामिया के विद्यार्थियों से काम करवाया और यही पहला अवसर था जब यह नाटक बंद जगह की बजाय खुले बाजार में मंचित किया गया। वर्ष 1955 में हबीब साहब इंग्लैंड चले गए और उसके बाद दो साल तक यूरोप का दौरा करते रहे। इस दौरान उन्होंने नाटक से संबंधित बहुत-सी बारीकियां सीखीं। यूरोप से हबीब 1958 में लौटे और आने के बाद संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम पर आधारित नाटक मिट्टी की गाड़ी का निर्माण किया। वर्ष 1959 में उन्होंने भोपाल में नए थिएटर की स्थापना की जिसके तकरीबन पचास साल पूरे हो चुके हैं।
हबीब साहब पहली बार विवादों में उस समय आए जब 90 के दशक में उन्होंने धार्मिक ढकोसलों पर आधारित नाटक पोंगा पंडित बनाया। नाटक का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों ने जमकर विरोध किया। भोपाल गैस त्रासदी पर आने वाली एक फिल्म में भी उनकी एक छोटी सी भूमिका है।
उन्होंने 2006 में रवीन्द्र नाथ टैगोर के उपन्यास राज ऋ षि और नाटक विसर्जन पर आधारित फिल्म राजरक्त का निर्माण और निर्देशन किया। उन्होंने मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल के साथ मिलकर नाटक चरणदास चोर पर एक हिन्दी फिल्म का निर्माण भी करवाया जिसमें स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिका निभाई। उनकी पत्नी मोनिका मिश्रा का निधन वर्ष 2006 में 28 मई को हुआ।

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