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तो अफसरों ने बदल डाले नतीजे

देहरादून। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा परिषद के लिए उत्तराखंड प्रतिनिधि का चुनाव पूरी तरह विवादों के घेरे में आ गया है। अब यह संदेह जताया जा रहा है कि चुनाव पूरी तरह घपलों और चालबाजियों के साथ हुआ। इससे सिर्फ एक नाम को फायदा पहुंचाया गया। इस खेल में शासन और उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के अफसरों का बहुत बड़ा हाथ माना जा रहा है। ऐसा क्यों किया गया, इसको लेकर जांच हो गई है और इसकी रिपोर्ट का बेसब्री से इन्तजार किया जा रहा है। मामले को लेकर नैनीताल उच्च न्यायालय में तो मुकदमा चल ही रहा था, अब प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इसमें रूचि लेना शुरू कर दिया है। उच्चतम न्यायालय ने तो इसकी त्वरित जांच रिपोर्ट ही तलब कर ली। अभी तक के हालात बताते हैं कि चुनाव में कुछ खेल तो जरूर हुआ है। हालांकि, अभी न तो उच्च न्यायालय का फैसला आया है न ही केंद्र सरकार की तरफ से ही रिपोर्ट सामने आई है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा परिषद के पिछले साल हुए चुनाव में उत्तराखंड प्रतिनिधि के तौर पर डॉ.रमाकांत शर्मा निर्वाचित घोषित हुए थे। उन्होंने डॉ.वेद प्रकाश त्यागी को हराया था। डॉ. त्यागी ने चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए कई जगह शिकायत कर दी थी। निर्वाचन के आधार पर डॉ. शर्मा का नाम भारत के राजपत्र में बतौर सदस्य अधिसूचित करने के लिए भेज दिया गया था। इस मामले में शिकायत मिलने के बाद से प्रधानमंत्री कार्यालय भी सक्रिय है। उसने डॉ.त्यागी की शिकायत पर ही केन्द्रीय आयुष मंत्रालय को भी इस मामले में रिपोर्ट देने को कहा। प्रधानमंत्री कार्यालय के जुड़ जाने के कारण अब इस मामले में अफसरों के लिए मामला दबा पाना या किसी को बचा पाना आसान नहीं रह गया है।
इस पूरे मामले में राज्य के अफसरों पर आरोप है कि उन्होंने डॉ. त्यागी को हराने और डॉ. शर्मा को जिताने के लिए बड़े खेल किए। इसमें शासन के एक अपर सचिव स्तर के और उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के एक पूर्व चर्चित अफसर का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। राज्य के अफसरों की मिलीभगत का अंदेशा इसलिए भी मजबूत हो रहा है कि केंद्र सरकार के जांच अधिकारी डेनियल रिचर्ड को राज्य सरकार ने शुरू में बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया। उनको जांच से संबंधित दस्तावेज तक नहीं दिखाए गए। इसके पीछे यह आधार दिया गया कि उच्च न्यायालय में मामला विचाराधीन होने के कारण वह कोई दस्तावेज दिखा तक नहीं सकते हैं, जबकि प्रशासनिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया एक साथ चल सकती हैं। इसके चलते केंद्र सरकार की जांच कुछ समय तक अटकी रही।
यह मामला निश्चित तौर पर बेहद संगीन है। खास तौर पर यह देखते हुए कि इसमें संगठित तरीके से फर्जीवाड़े को अंजाम देने का आरोप है और चुनाव बेहद अहम संगठन के हैं। आरोपों के मुताबिक चुनाव में विश्वविद्यालय के एक पूर्व अफसर के साथ मिलकर डॉ. शर्मा, उनके पुत्र नवनीत कौशिक और दीपक ज्योति कोटियाल ने डुप्लीकेट मतपत्र छपवाए। उन पर मुहर ठोंकी गई। फिर उनको पोस्ट ऑफिस से निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में जमा नहीं कराया गया। इसके बजाए एक अफसर के घर पर ले जाकर उन्हें असली मतपत्रों से बदल कर नतीजा बदल दिया गया। शिकायत के बाद केंद्र सरकार के जांच अधिकारी देहरादून पहुंचे थे। शक के बादल इसलिए गहराए कि यहां उनको कोई सहयोग नहीं मिला। आयुष मंत्रालय ने इस असहयोग की सूचना प्रधानमंत्री कार्यालय को भी दे दी। राज्य सरकार के अफसरों के रवैये को देख इस डॉ. त्यागी ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली। वहां डॉ.त्यागी की याचिका स्वीकार हुई और उच्चतम न्यायालय ने 45 दिनों के भीतर जांच की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए। इसके बाद ही अफसरों का खेल खुल गया। देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण राज्य के अफसरों को जांच अधिकारी के सम्मुख मतपत्रों का बक्सा खोल कर उन्हें देखने देना पडा। डॉ. त्यागी का दावा है कि अब चुनाव में हुए खेल और बड़ी साजिश का अंत करीब है। जांच अधिकारी को उन्होंने खुद डुप्लीकेट मतपत्र दिखाए हैं। इन मतपत्रों में कॉलम भी वास्तविक से अलग हैं। कागज भी अलग है।
निर्वाचन अधिकारी जीबी ओली के दस्तखत को भी उन्होंने मूल से भिन्न करार दिया। समझा जा रहा है कि केंद्र सरकार की जांच रिपोर्ट न सिर्फ जल्द आ जाएगी, बल्कि इसकी रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार में काफी हंगामा होने के भी आसार हैं। जिन अफसरों के नाम इसमें शुरू से लिए जा रहे हैं, वे हमेशा आला हुक्मरानों के करीबी और विश्वासपात्र रहे हैं। उन पर आंच आती है तो उनके आकाओं को भी दर्द होना स्वाभाविक है। अभी तक उनके कारण ही ये कथित अधिकारी बचे हुए हैं।
डॉ. त्यागी की मांग है कि जो लोग इस साजिश के पीछे थे और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को चोट पहुंचाने के साथ ही गंभीर आपराधिक कृत्य किया, उनके खिलाफ तत्काल प्राथमिकी दर्ज हों और वे जेल जाएं। अगर यह मामला वाकई साजिश का निकलता है तो उत्तराखंड एक बार फिर बदनामी के चोटी पर चढ़ेगा। यहां हर तरह के घोटाले और साजिशें होती रही हैं। चाहे वह भर्ती से जुड़ा हो या जमीनों और जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन से। सेक्स स्कैंडल्स में बड़े-बड़े राजनेताओं के नाम आ रहे हैं। मंत्री तक फंस रहे हैं। अभी एनएच-74 घोटाले की जांच सरकार के स्तर पर चल रही है और सीबीआई जांच भी कभी भी शुरू हो सकती है। अब चुनाव में भी नतीजे प्रभावित करने का प्रमाण सामने आ गया तो यह मुलजिमों से ज्यादा उत्तराखंड का नाम बदनाम करने वाला साबित होगा।
शर्म की बात यह है कि लगातार घोटाले सामने आने और कई दोषियों के इनमें फंसने के बावजूद यहां के न तो नेता ही बाज आ रहे और न ही अफसर। अब इस मामले में यह देखना दिलचस्प और अहम होगा कि केंद्र सरकार की रिपोर्ट नकारात्मक आने पर आरोपी अफसरों के खिलाफ राज्य सरकार किस तरह और कितनी फुर्ती से कदम उठाती है। अभी तक बीजेपी सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त होने का सन्देश नहीं दे पाई है बल्कि कई ऐसे अफसरों ने मलाईदार और रसूखदार कुर्सियां पायीं हैं, जिन पर अनेक किस्म के दाग लगे हुए हैं।

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