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जुगाड़ से गुरूजी बनने का खेल खत्म!

— शिक्षा मंत्री अरविन्द का एक और मास्टर स्ट्रोक
— अब तक की भर्तियों पर बिठाई जांच
— सरकारी इमदाद से चलने वाले गैर सरकारी स्कूलों में भर्ती घपला आया सामने
— करोड़ों की कमाई हाथ से जाने पर प्रबंधन में खलबली

चेतन गुरुंग
देहरादून। शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय की पहचान कभी बाहुबली की थी लेकिन आज की तारीख में उनकी यह पहचान लोग भूलते जा रहे हैं। उनको अगर पहचाना जा रहा है तो स्कूलों (सरकारी और निजी) में सुधार करने और घपलों के खेल को रोकने की उनकी कोशिशों के कारण। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ.धन सिंह रावत लगातार नए कदम उठा रहे हैं तो पाण्डेय ने पहले निजी स्कूलों को मनमानियों से बाज आने की चेतावनी दी और फिर उनको कसने का अभियान चलाया। यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में उनका पहला अहम कदम था, लेकिन सरकारी इमदाद से चलने वाले गैर सरकारी स्कूलों में होने वाली भर्तियों को तत्काल प्रभाव से रोकने और हाल ही में हुई नियुक्तियों को रद्द करने के फैसले के बाद तो हलचल ही मच गई है। इतना ही नहीं उन्होंने आइन्दा ऐसे स्कूलों में भर्तियाँ सिर्फ योग्यता के आधार पर ही करने का आदेश भी जारी कर डाला यानि, जुगाड़ से गुरूजी बनने का खेल एकदम खत्म।

पाण्डेय का यह फरमान कोई छोटा या सामान्य नहीं है। 166 हाई स्कूल और 308 इंटरमीडिएट अशासकीय स्कूल प्रदेश में हैं और यह कोई छोटी तादाद नहीं है। इनमें लगातार प्रधानाचार्य, प्रधानाध्यापक, प्रवक्ता, एलटी शिक्षक और कर्मचारियों की भर्ती होती हैं। सरकार के ताजा फरमान भर से 2700 पदों पर भर्तियां अधर में चली गई हैं। सरकार ने इतना भर ही नहीं किया बल्कि पिछली सरकार के दौरान जो भर्तियां चुनाव आचार संहिता के दौरान हुईं, उनको भी निरस्त करने की कोशिश चल रही है। सरकार के पास रिपोर्ट है कि भर्तियों में जम कर पैसा और भाई-भतीजावाद चला। ऐसा करना स्कूल प्रबंधन के लिए आसान था। वह इंटरव्यू और अनुभव के बिना पर ही ज्यादातर को सेवा में रख रहा था। उनके प्रमाणपत्रों को तवज्जो नहीं दी जा रही थी। इसमें प्रबंधन जिसको चाहे उसको सेवा में रख सकता था और यही वह कर रहा था। पाण्डेय ने एक और अहम कदम यह भी उठाया कि पिछले कुछ अरसे में हुई भर्तियों की जांच के लिए भी गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में अफसरों की नियुक्ति कर दी।
हैरानी की बात है कि स्कूलों में भर्ती के लिए घूसखोरी की रकम 25 लाख रुपये तक पहुंच गई थी। पाण्डेय के मुताबिक उन्होंने इतना सख्त फैसला यूं ही नहीं किया। इसके लिए कुछ शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई की गई। अल्मोड़ा के आर्य कन्या विद्यालय में 25-25 लाख रुपये लेकर भर्तियां करने की शिकायत पर जांच कराई गई। विभागीय जांच में पाया गया कि भर्तियां वाकई सही तरीके से नहीं हुई थी। इससे घूस लेकर भर्ती करने की शिकायत की पुष्टि काफी हद तक हुई। जांच में पाया गया कि ऐसे लोगों को बाहर कर दिया गया, जिनके पास बेहतर शिक्षा थी और प्रमाणपत्र भी थे। उन पर अनुभवी और इंटरव्यू में ज्यादा अंक हासिल करने का आधार बनाते हुए कम योग्य लोगों को तवज्जो दे कर उनको भर्ती कर दिया गया।
पाण्डेय के इस सख्त कदम का विरोध शुरू हो गया है। यह तर्क दिया जा रहा है कि इसका नुकसान भर्तियों में उनको होगा, जिन्होंने उत्तराखंड बोर्ड से पढ़ाई की। सीबीएसई और आईसीएससी बोर्ड के छात्रों को ज्यादा अंक इम्तिहान में दिए जाने की दलील दी जा रही है। यह तर्क इसलिए कमजोर पड़ता है कि उत्तराखंड शिक्षा परिषद ने भी परीक्षाओं में अब अंक देने की प्रणाली को बदल डाला है और इसके छात्र भी अब 90 फीसदी से ऊपर अंक इम्तिहानों में ला रहे हैं। सरकारी मदद से चल रहे निजी स्कूल प्रबंधनों की दलील यह भी है कि स्कूल का ढांचा उन्होंने खड़ा किया है। ऐसे में भर्तियों में प्रबंधन के अधिकार को सरकार कैसे खत्म कर सकती है। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि जिन स्कूलों में नियम के अनुसार साफ-सुथरे तरीके से भर्तियां हुई हैं, वहां की भर्तियां निरस्त करने का फैसला ठीक नहीं है।
कहने को पहले की व्यवस्था में भी भर्ती के लिए गठित समिति की अध्यक्षता मुख्य शिक्षा अधिकारी करते थे और सरकार के भी अफसर इसमें शामिल होते थे। इसके बावजूद प्रबंधन का प्रतिनिधि इंटरव्यू में अधिक से अधिक अंक देकर जिसको चाहते थे, उसके नंबर इतने कर देते थे कि उनका चयन हो जाता था। शिक्षा मंत्री के तौर पर पाण्डेय का यह कदम निश्चित तौर पर क्रांतिकारी साबित होगा। राज्य में स्कूलों में होने वाली भर्तियों का ही लालच होता था कि विधायक और स्कूल प्रबंधन से जुड़े लोग अपने स्कूलों को सरकारी सहायता प्राप्त की श्रेणी में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे हैं। यह खेल खत्म होने से उनमें जबरदस्त हलचल होनी स्वाभाविक है।
स्कूलों में भर्तियों में भाई-भतीजावाद और घूसखोरी के चलते ही सरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर निम्नतम है। इसके चलते सभी अपने बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं। खुद सरकारी स्कूल के गुरूजी भी यही करते हैं। पाण्डेय के लिए अपने इस अहम फैसले पर डटे रहना आसान नहीं होगा। उन पर इसको वापस लेने के लिए दबाव भी बनना शुरू हो गया है। उन्होंने अभी तक इस बारे में अपनी दृढ़ता दिखाई है। उन्होंने सरकारी शिक्षक और शिक्षिकाओं के लिए वर्दी भी तय करके पहले से ही हलचल मचा दी है। दुर्गम या पहाड़ों में तैनात महिला शिक्षक साड़ी को अव्यवहारिक करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि साड़ी पहन कर पहाड़ों में चला नहीं जा सकता है। अभी तक युवा शिक्षा मंत्री अपने फैसले पर अडिग हैं। उम्मीद है कि अशासकीय स्कूलों में पुरानी प्रक्रिया से भर्ती पर रोक के फैसले पर भी वह यही रुख अपनाए रखेंगे।

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