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ऐतिहासिक रही मोदी की इजराइल यात्रा

मोदी के स्वागत के लिए भारत के महाराष्ट्र और अन्य प्रांतों से यहूदी तेल अवीव पहुंचे थे। दुनिया के किसी देश में एक विदेशी अतिथि के आगमन पर उसका इतना रोमांच भरा स्वागत शायद ही हुआ हो। मोदी जहां भी गए तकरीबन हर जगह हर फ्रेम में बिन्यामिन नेतन्याहू उनके साथ दिखे। समंदर किनारे वाली वो तस्वीर भी रेत पर निशान छोडऩे वाली कही जा सकती है। यहां तक कि नेतन्याहू प्रोटोकॉल तोडक़र मोदी को विदा करने एयरपोर्ट तक गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल की यात्रा पर जाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, यह बात ही चकित करती है, क्योंकि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जिसने दुनिया भर से ठुकराए हुए यहूदियों को दो हजार साल पहले शरण दी। यहां यहूदी समाज इतना घुलमिल गया कि उसने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अत्यंत आत्मीय एवं भरोसे योग्य इजराइल के साथ ऐसे संबंध बनाने में सात दशकों का समय लगा तो इसका एकमात्र कारण छद्म सेक्युलरवाद रहा। भारत अरब देशों के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है। फिलिस्तीन के प्रति भारत की नीति बदली नहीं है। दरअसल इसराइल और फिलिस्तीनी क्षेत्र का विवाद भारत की आजादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा है। इसराइल से संबंध जब शुरू हुए उसके बाद देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया था और कोई भी दल राजनीतिक वजहों से ये जोखिम नहीं उठाना चाहता था।
इजराइल का जन्म 1948 में हुआ। भारत ने 17 सितंबर, 1950 को उसे मान्यता दी, लेकिन अरब देशों से संबंध न बिगड़े, इस आशंका से 1992 तक इजराइल से हमारे राजनयिक रिश्ते नहीं बने। बावजूद इसके 1962, 1965 और 1971 के युद्धों और कारगिल संघर्ष में इजराइल ने भारत की मदद की, जबकि मुस्लिम देशों ने खासकर तेल उत्पादक अरब देशों ने कश्मीर और अन्य मुद्दों पर कभी भी भारत का साथ नहीं दिया, बल्कि पाकिस्तान समर्थक नीति अपनाई। इजराइल बीते 15 से 20 साल में भारत को रक्षा उपकरण देने के मामले में चौथा सबसे बड़ा देश बन चुका है। अमरीका, रूस और फ्रांस के बाद इजराइल का नंबर आता है। इजराइल ने भारत को कई तरह के मिसाइल सिस्टम, रडार और हथियार दिए है। इजराइल अपने आप बहुत बड़े प्लेटफॉॅर्म और जहाज नहीं बनाता लेकिन वो मिसाइल और रडार सिस्टम बनाता है। बीते डेढ़ दशक में भारत की इन पर निर्भरता बढ़ी है। भारत और इजराइल के संबंधों को इस लिहाज से भी समझा जा सकता है कि बीते एक दशक के दौरान दोनों देशों के बीच करीब 670 अरब रुपए का कारोबार हुआ है। मौजूदा समय में, भारत सालाना करीब 67 अरब से 100 अरब रुपए के सैन्य उत्पाद इजाइल से आयात कर रहा है। ये आंकड़े तब और महत्वपूर्ण लगने लगते हैं जब उस तथ्य की ओर ध्यान जाता है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत जनवरी, 1992 में हुई थी। दोनों देशों के बीच रिश्ते को मजबूती देने में इजराइल की हथियार बेचने की मंशा भी रही है। इसमें 1999 के करगिल युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए लेजर गाइडेड बम और मानवरहित हवाई वाहन शामिल रहे हैं। संकट के समय भारत के अनुरोध पर इजराइल की त्वरित प्रतिक्रिया ने उसे भारत के लिए भरोसेमंद हथियार आपूर्ति करने वाले देश के तौर पर स्थापित किया और इससे दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए। इतने प्रगाढ़ रिश्ते होने के बावजूद किसी प्रधानमंत्री ने इजराइल जाने की जरूरत नहीं समझी। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा ऐतिहासिक ही कही जायेगी।

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