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खाली कुर्सियों का खेल

देहरादून। उत्तराखंड में मंत्रिपरिषद या मंत्रिमंडल में अधिकतम 12 मंत्रियों (मुख्यमंत्री समेत) को शामिल करने की बाध्यता के कारण पहले ही यहां के अधिकांश सत्ताधारी विधायकों के सपनों को ग्रहण लगा रहता है। उनके मंत्री बनने की ख्वाहिश पूरी होने की सम्भावना बहुत मुश्किल हो चुकी है। अगर विधायक कम हो तो फिर भी उम्मीद बंधती है, लेकिन सत्ता में बैठी पार्टी बीजेपी हो और उसके पास 70 में से 57 विधायक हों तो विधायकों के सपनों को ग्रहण लगने की सम्भावना कहीं ज्यादा हो जाती है। शायद इतना ही काफी नहीं है। मुख्यमंत्री अगर त्रिवेंद्र सिंह रावत सरीखे बेहद शक्तिशाली और किसी के दबाव में न आने वाले और हाई कमान तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के चहेते हों तो यह काम तकरीबन नामुमकिन जैसा दिखने लगता है। उत्तराखंड इसकी बेहतरीन मिसाल है। यहां न तो विधायकों की कमी है न ही किसी किस्म का कोई दबाव मुख्यमंत्री पर। इसको देख कर त्रिवेंद्र ने पहले तो कई बड़े नामों को झटका देते हुए मंत्रिपरिषद का गठन अपने हिसाब से किया फिर बची-खुची कसर सीटें पूरी न भर के निकाल दी। इसके पीछे त्रिवेंद्र की कोई रणनीति दिखती है? सियासी संमीक्षक मानते हैं कि इससे त्रिवेंद्र के पार्टी में मौजूद विरोधियों में यह सन्देश साफ जाता है कि वह फ्री हैंड हैं और जो चाहेंगे करेंगे। उन पर कोई गैर वाजिब दबाव डालने की कोशिश न करें। एक पहलू यह भी है कि खाली सीटों के लिए त्रिवेंद्र के सामने पसोपेश बना रहेगा की वरिष्ठता को देखें या फिर समीकरण और काबिलियत। फैसला करना बहुत मुश्किल है। 

त्रिवेंद्र को मोदी-शाह के चहेतों में ही नहीं शुमार किया जाता है बल्कि संघ के भी वह प्रिय हैं। इसके चलते ही वह कई चुनाव हारते रहने के बावजूद कभी भी राजनीति की मुख्य धारा से कभी बाहर नहीं समझे गए। हकीकत तो यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जब वोट पड़े भी नहीं थे, अंदरखाने यह चर्चा तेज हो चुकी थी कि पार्टी की सरकार आने और त्रिवेंद्र के चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री वही बनेंगे। लोगों को तब यह अतिश्योक्ति लगती थी कि लगातार चुनाव हारने के बाद जीत जाने के बावजूद यह कैसे मुमकिन है, जबकि पार्टी में भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक, अजय भट्ट सरीखे खुर्राट किस्म के नेता पहले से हैं। नाम बड़ा तो बीसी खंडूड़ी भी हैं लेकिन उनकी उम्र के कारण उनको दावेदार नहीं समझा गया। सिवाय गासिपों के। लोग यह ध्यान नहीं दे रहे थे कि त्रिवेंद्र झारखण्ड के प्रभारी भी थे जो उनकी हाई कमान का खास होने का साफ संकेत था। जब प्रकाश पन्त को मुख्यमंत्री की दौड़ में समझा जा रहा था, त्रिवेंद्र को हाई कमान साफ बता चुका था कि उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालनी है। बेशक वह चुप्पी बरते रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भारी और अभूतपूर्व बहुमत के बाद समझा जा रहा था कि त्रिवेंद्र के लिए 11 मंत्रियों को चुनना कतई आसान नहीं होगा। सब यह देख रहे थे कि वह कैसे इसको अंजाम देंगे।
उन्होंने तब यह मास्टर स्ट्रोक खेला, जिसमें उन्होंने दो मंत्रियों की सीट खाली छोड़ दी। कहां तो 11 मंत्री चुनने की दिक्कत की बात हो रही थी कि सबको कैसे संतुष्ट कर पाएंगे और कहां उन्होंने यह झलका दिया कि 12 का मंत्रिपरिषद भी बहुत बड़ा होता है। इसकी जरुरत नहीं है अगर बहुत मजबूरी न हो। उन्होंने सिर्फ नौ मंत्री ही बनाए। खास बात यह है कि त्रिवेंद्र के इस फैसले के पीछे का राज पार्टी में भी चंद लोगों को ही पता है और वे भी मुंह सिले हुए हैं। त्रिवेंद्र की इस कूटनीतिक चाल के पीछे राजनीति के जानकार यह देख रहे हैं कि इससे उनको क्या फायदा पहुंच रहा है। पहला तो यह फायदा है कि खाली कुर्सियों पर बैठने के लोभ या कहें उम्मीद में बैठे विधायकों को खामोश रखने में सफलता मिल रही है। वे चुप हैं कि जुबान खोलने और मुख्यमंत्री के बारे में कुछ भी बोलने से कहीं उनकी उम्मीदों को झटका न लग जाए। एक फायदा यह है कि ऐसा करके उन्होंने खुद के बेहद शक्तिशाली मुख्यमंत्री होने का साफ सन्देश दे दिया कि उनके खिलाफ बगावत करने का मतलब सियासी अंत होगा। कोई मंत्री अगर मुख्यमंत्री के तौर पर उनको चुनौती देने की कोशिश करेगा तो उसको नुकसान ही होगा। साथ ही यह भी बता दिया कि वह फैसले करने के लिए पूरी तरफ अपनी मर्जी के मालिक हैं। कोई उन पर दबाव डालने की हिमाकत न करे।
उन्होंने एक के बाद एक कई ऐसे भी फैसले किए हैं जो पार्टी और मीडिया के लोगों के भी गले नहीं उतरा लेकिन वह इससे बेपरवाह दिखते हैं। उत्तराखंड ऊर्जा निगम के प्रबंध निदेशक की कुर्सी पर बीसीके मिश्र जैसे दागदार अनुभवहीन को बिठाने का फैसला हो या फिर लाख आलोचनाओं के बावजूद एक मास्टर को अपर स्थानिक आयुक्त जैसी कुर्सी पर बिठाना और तमाम हंगामों के बावजूद बनाए रखना। वह अपने हिसाब से चल रहे हैं। ऐसे में किसी विधायक या उनकी लॉबी (हालांकि, यह आज की तारीख में जंग खा चुकी है) की हिम्मत नहीं पड़ रही कि वे मंत्री बनने की इच्छा तक जतला सके। ऐसा नहीं है कि त्रिवेंद्र दो बची कुर्सियों पर विधायकों को नियुक्ति कर मंत्री न बनाएं। दरअसल, उनको इस सियासी चाल में फायदा यह भी दिख रहा है कि जिस दिन दोनों कुर्सियां भर जायेंगी, मंत्री न बन पाने वाले लॉबी से जुड़े विधायक खुसर-फुसुर शुरू कर सकते हैं। अभी तो उम्मीदें जिंदा हैं। जिनके नाम मंत्री बनने के लिए लिए जा रहे हैं, उनमें पुष्कर सिंह धामी, मुन्ना सिंह चौहान, हरबंस कपूर, बिशन सिंह चुफाल, स्वामी यतीश्वरानंद के साथ ही कुछ और नाम प्रमुख हैं। इनमें शायद ही कोई ऐसा होगा जिन्होंने पार्टी और संघ में अपने आकाओं को साधने की कोशिश न की हो। दरअसल, वे अब चक्कर लगा-लगा के थकने लगे हैं। भले उम्मीद और हौसला नहीं खोया है।
मंत्रियों की खाली सीट न भर के मुख्यमंत्री यह संदेश भी दे रहे हैं कि वह सरकारी खजाने पर जितना कम बोझ डाल सकते हैं, डाल रहे हैं। एक मंत्री पर न सिर्फ करोड़ों रूपये का औपचारिक खर्च सरकार का आता है, बल्कि भ्रष्टाचार के दरवाजे भी ज्यादा खुलते हैं। यह उत्तराखंड के 17 साल का इतिहास बताता है। मंत्री कम बना कर और ज्यादातर अहम मंत्रालय खुद रख का त्रिवेंद्र ने मंत्रियों पर लगाम भी लगा ही रखी है। कम से कम चार मंत्री ऐसे हैं जो अपने महकमों से बिलकुल भी खुश नहीं हैं, लेकिन वे चुप्पी साधे बैठे हैं कि कहीं यह भी न छिन जाए। इतना ही नहीं त्रिवेंद्र ने जिस तरह लाल बत्तियां न तो बांटी हैं न ही बांटने का ही कोई संकेत दे रहे हैं, उससे भी यही सन्देश निकल रहा है कि सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने और सरकार को लाल बत्तियों के चलते बदनाम होने देने का उनका कोई इरादा नहीं है। पिछली कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें लाल बत्तियों के कारण बुरी तरह बदनाम हुई थी और चुनाव में निबट गई थीं। हो सकता है कि त्रिवेंद्र बाद में लाल बत्तियां बांटने को मजबूर हों पर आज तो यह बाध्यता नहीं दिखाई दे रही है। दबाव में न होने और पूरी आजादी से सरकार चलाने की छूट के दौर में त्रिवेंद्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पौने दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव। इन चुनावों में उनके सामने पांचों सीटें जितवाने की कठिन चुनौती है। इसमें एक भी सीट कम रहने का जोखिम वह नहीं ले सकते हैं। इसके चलते वह कोई ऐसा कदम उठाने को राजी नहीं हैं, जो सरकार और पार्टी को भारी पड़े और आखिर में उनको नुकसान पहुंचाए। हाई कमान तब उनकी कोई भी दलील सीट कम होने पर नहीं सुनेगा, यह तय है। मुमकिन है कि त्रिवेंद्र दो खाली सीटों को तब तक खाली ही रखें, फिर जिसके क्षेत्र में ज्यादा बढिय़ा प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में होगा, उसको मंत्री की कुर्सी से नवाजेंगे। इतना तय है कि लोकसभा चुनाव के बाद मंत्रिपरिषद में भी चुनाव और मंत्रालय के कामकाज में सफलता-असफलता के लिहाज से परिवर्तन भी होगा।

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