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कतई नई नहीं है फेक न्यूज की बात… हां, नाम जरूर नया है…

कई साल बाद झूठी ख़बरों की समस्या फिर चर्चा में आई है। हां, झूठी खबरों का नामकरण जरूर नया है। अपने देश में इसे इस समय अंग्रेजी में फेक न्यूज नाम दिया गया है। कोई 10 साल पहले इसी तरह की खबरों को पेड न्यूज कहकर चिंता जताई गई थी। उसके भी 10-20 साल पहले हम ऐसी ही दुर्लभ खबरों को प्रोपेगंडिस्ट मीडिया के नाम से जानते थे। यानी झूठी खबरों का चलन कोई नया नहीं है। हां, इसमें कुछ नया है तो बस इतना कि दुनियाभर की सरकारें अपनी आलोचनाओं से ज्यादा परेशान होने लगी हैं। वे होती तो पहले भी होंगी, लेकिन एक सामान्य पर्यवेक्षण है कि पहले खबर देने वाले प्रतिष्ठान उतने ताकतवर नहीं हुआ करते थे। पिछले आठ साल में अपने देश के मीडिया प्रतिष्ठान इतने संपन्न हो गए हैं कि वे अपने दम पर ही राजनीतिक प्रचार-प्रसार का काम संभाल सकते हैं। किसी सरकार को उखाडऩे के लिए या किसी की सरकार बनाने के लिए खुल्लमखुल्ला झूठी खबरें देने में जहां नैतिकता-अनैतिकता का सवाल है, इसे यह तर्क देकर जायज ठहराना कोई मुश्किल काम नहीं है कि झूठ के खिलाफ झूठ बोलना भी एक प्रकार का नैतिक काम ही है। खैर, दार्शनिक हीगल के इस दर्शन की नैतिकता-अनैतिकता को तय करना जटिल काम है। फिलहाल यहां फेक न्यूज के कुछ दार्शनिक पहलुओं की चर्चा करने का मौका है।

फेक न्यूज की ताकत
सच्ची-अच्छी बातें तो हम कक्षा एक से लेकर दीक्षित होने तक पढ़ते ही रहते है। सो, सच्ची-अच्छी बातें सामान्य घटनाएं मानी जाती हैं। खबर की परिभाषा ही आज यह बताई जाती है कि जिसमें कोई कंट्रास्ट और कॉन्फ्लिक्ट हो, यानी जहां झगड़ा, झांसा, लफड़ा हो या असामान्य बात हो। किसी को पगड़ी पहनाए जाने की ख़बर को खबर नहीं माना जाता, पगड़ी उछालने की खबर खबर बनती है, क्योंकि असामान्य बात होने का आवश्यक और सनसनीखेज तत्व उसमें होता है। लोक की सेवा करने के लिए सदैव तत्पर नेता और अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप इसीलिए सनसनीखेज खबरें बनती हैं, क्योंकि ऐसी खबरें उन्हें समग्र समाज की सेवा की बजाय खुद की या अपने समूह की सेवा में लगा हुआ दिखाती हैं। भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने की घटना उतनी सनसनीखेज नहीं होती, जितनी सनसनीखेज खबर सिर्फ आरोप लगाने की होती है, क्योंकि आरोपों के सिद्ध करने की लंबी प्रक्रिया में आरोपी जीते-जी ही गुजर लेता है।
इसी प्रक्रिया में जो झूठे आरोपों का शिकार होते हैं, वे भी गुजर लेते हैं। यानी आरोप ही अगर किसी को तबाह कर सकते हों, तो झूठ की ताकत तो अपने आप सिद्ध हो जाती है और वैसे भी, फेक, यानी फर्जी खबरों की ताकत सीधी-सच्ची बात की तुलना में हजारों गुना ज्यादा मानी जाती है। राजनीति में जनाधार की तरह मीडिया में पाठक या दर्शक आधार भी शांति या आदर्श की बातों की बजाय अगर अशांति, हिंसा अनैतिकता और झूठ की खबरों से बढ़ता हो, तो फेक न्यूज की ताकत के सामने कौन टिक सकता है।

लेकिन ज्यादा चिंता न कीजिए, क्योंकि…
क्योंकि देश का औसत नागरिक इन वर्षो में ज्यादा शिक्षित हुआ है। औपचारिक शिक्षा से भी और अपने रोजमर्रा, माहमर्रा और सालमर्रा के अनुभवों से भी। वह पहले से ज्यादा तार्किक हुआ है। एक अनुभव है कि आजकल देश में सत्ता बदलते ही वह अपने अखबार और टीवी चैनल भी बदल देता है। आमतौर पर यह बात भी सुनने को मिलती है कि फलां अख़बार या टीवी चैनल फलां पार्टी का है और फलां फलां का। हो सकता है, फिर भी मीडिया लिटरेसी बढ़ाने की ज़रूरत हो, लेकिन अखबारों के प्रत्यक्ष ग्राहक और टीवी के अप्रत्यक्ष ग्राहकों की समझ पर यकीन करके चलना ही चाहिए। समग्र समाज की सामूहिक मेधा को लेकर निश्चिंत नहीं रहने का कोई कारण फिलहाल नहीं दिखता है।

विज्ञापन के विकल्प के रूप में
विज्ञापनों के झूठ कोई नई बात नहीं। अपने माल की गुणवत्ता का झूठा प्रचार आकर्षक विज्ञापनों से ही सधता है। इधर विज्ञापनों के जरिये बेचे माल को बरतते-बरतते विज्ञापनों की विश्वसनीयता कम होती चली जाना भी अनोखी बात नहीं है। इसीलिए 90 और सन 2000 के दशक में विज्ञापन की बजाय उसी प्रचार सामग्री को मीडिया की खबरों के रूप में पेश करने का चलन बढऩा हमने देखा ही है। जब यह चलन शुरू हुआ था, वहीं यह भी तय हो गया था कि राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी उपलब्धियों का झूठा प्रचार करना और अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ झूठा प्रचार किया जाना भी शुरू हो जाएगा। वही हुआ दिखा। प्रचार का काम विज्ञापनों की बजाय मीडिया को साधकर बाकायदा न्यूज से होने लगा। इसमें विज्ञापनों वाला तत्व होने के कारण ही विद्वानों ने इसका नामकरण फेक न्यूज के नाम से किया होगा।

फेक न्यूज से भी बड़ा एक और संकट
फेक न्यूज में तो फिर भी एक शब्द न्यूज का जुड़ा है, लेकिन समाचारविहीनता यानी न्यूजलेसनेस उससे भी बड़ा संकट दिख रहा है। यह काम पत्रकारिता क्षेत्र के विद्वानों और विशेषज्ञों के देखने का है कि खबरों को रोकने के पीछे क्या दर्शन हो सकता है। शोध परिकल्पना के रूप में कहा जा सकता है कि कोई भी विज्ञापक यह भी चाहता है कि उसके विज्ञापन की सच्चाई पर कोई सवाल न उठे। फेक न्यूज प्रसारित करने वाला पक्ष भी क्यों नहीं चाहेगा कि उसके खिलाफ कोई सवाल न उठे। इस तरह फेक न्यूज अपने अलावा किसी भी न्यूज को अपने लिए घातक ही मानती है। ऐसे में न्यूज को रोका जाना फेक न्यूज से भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकता है लेकिन इस शोध परिकल्पना को सिद्ध या असिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक शोध पद्धति से अध्ययन की दरकार है।

सच को रोकने के पीछे का दर्शन
समाजशास्त्र में एक अवधारणा है जिसका नाम है एनोमी। हिन्दी में इसे अनामिकता के नाम से पढ़ाया जाता है। यह एक सामाजिक दुर्दशा की अवस्था का नाम है, जिसके पांच लक्षण पहचाने गए हैं। इनमें पहले तीन हैं, कानूनविहीनता, आदर्शविहीनता और सामाजिक अलगाव। विघटन की स्थिति का लाभ लेने वाले पक्ष कानून और आदर्श की पुर्नस्थापना को अपने लिए घातक मानते है। सर्व-सामूहिकता भी उन्हें अपने लिए नाशक-विनाशक लगती है। इस तरह फेक न्यूज को अपने से ज़्यादा इस बात की ज्यादा चिंता रहती है कि न्यूज उन्हें बेअसर न कर दे। एक दार्शनिक प्रतिस्थापना है कि झूठ को तर्क से बड़ा डर लगता है। दार्शनिक तर्क को ही सच का रूप मानकर चलता है।

मसला पत्रकारिता की आचार संहिता तक पहुंचेगा
पिछले दो दशकों में जब भी पेड न्यूज पर विमर्श हुआ, बात आचार संहिता तक पहुंच गई लेकिन पिछले तीन दशकों में संप्रभुता की हद तक स्वतंत्रता का भोग करने वाली पत्रकारिता, बस संहिता में बंधने की बात को सहन नहीं कर सकती थी। हमने दसियों दंतविहीन नियामक जरूर बनाए, लेकिन उनकी असरदारी को हम आज तक महसूस नहीं कर पाए लेकिन आज जब पत्रकारिता के सामने अपनी विश्वसनीयता का ही सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया हो, तो वह अपने इस संकट से निपटने के लिए आचार संहिता की बात मान भी सकती है। आखिर अपने व्यापार के लिए विश्वसनीयता को बनाए रखना भी तो जरूरी है। कम से कम स्वनियमन के लिए राजी होने में उसे ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। अगर यह काम नहीं भी होता है, तो भी कोई बात नहीं, क्योंकि मीडिया के ग्राहकों, यानी देश के समाज की समझदारी हमें सबसे ज़्यादा निश्चिंत करती है। वे भी अपने इशारों से मीडिया को ईमानदार और जागरूक बनाने का काम कर सकते हैं। काम क्या, बल्कि बाध्य कर सकते हैं।

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