You Are Here: Home » UTTAR PRADESH » अपनी-अपनी ढफली बजा रहे कांग्रेस के क्षत्रप

अपनी-अपनी ढफली बजा रहे कांग्रेस के क्षत्रप

हाल यही रहा तो लोस चुनाव भी गया

देहरादून। कांग्रेस में पुरानी कहावत है। कांग्रेस को सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है। अपने झगड़े खत्म कर मिल कर रहे तो किसी भी दल को धराशाई करने की क्षमता रखती है। उत्तराखंड में यह हकीकत कई बार साबित हुई और एक बार फिर पार्टी विधानसभा चुनाव में अपनी ऐतिहासिक गत बनाने के बाद उठने की कोशिश करने के बजाए एक-दूसरे की गर्दन नापने में जुट गए हैं। चुनाव में जिस शर्मनाक तरीके से कांग्रेस ने शिकस्त का वरण किया उसके बाद तो यह माना जा रहा था कि राज्य स्तर पर भी पार्टी नतीजे की समीक्षा करेगी। कारण तलाश कर उसको दूर करने के लिए अभी से जुट जाएगी। पार्टी के दिग्गज आपस के झगड़े-मतभेद भुला कर साथ बैठेंगे। फिर मिलकर पार्टी को सशक्तकरने की कोशिश करेंगे। ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा। किशोर उपाध्याय और पार्टी के वरिष्ठ नेता गण लगातार बयानवीर साबित हो रहे हैं। उनके शब्द बाण विरोधियों को नहीं कांग्रेस और अपने ही पार्टी के नेताओं को छलनी कर रहे हैं। यही आलम रहा तो पार्टी पौने दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी कुछ सकारात्मक नतीजा दे पाएगी, उसमें जबरदस्त संदेह है। सब अपनी ढफली बजा रहे हैं और राग अलग-अलग निकाल रहे हैं। कांग्रेस में बीजेपी की त्रिवेंद्र सरकार से लडऩे का माद्दा ही नहीं दिख रहा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के लिए यह सब संभाल पाना तकरीबन नामुमकिन सा दिख रहा है। हालांकि, उनमें यह क्षमता है। अभी उनके पास वक्त भी है।
कांग्रेस इस समय जितने धड़ों में बंटी है, उतनी कभी नहीं रही। हरीश रावत, किशोर उपाध्याय, प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश अलग-अलग तरह से सोचते हैं। अलग तरीके से काम कर रहे हैं। उनके बयान ऐसे आते हैं, जो पार्टी को मजबूत करने के बजाए उसकी नींव हिलाने का काम ज्यादा कर रहे हैं। कभी इंदिरा के शब्द बाण हरीश को बिंध देते हैं तो कभी किशोर की तरफ से मिसाइल हरीश की तरफ छोड़ दी जाती है। हरीश एक परिपक्व नेता हैं और राजनीति को शीर्ष स्तर पर जिया है। लिहाजा, वह सीधे और मर्म को भेदने वाले तीर छोडऩे के बजाए तीखे व्यंग्यकार की तरह ऐसा प्रहार विरोधियों पर करते हैं कि उसमें भले शालीनता रहे, लेकिन उसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है। इन सबके बीच प्रीतम कहां हैं? वह अभी बतौर अध्यक्ष पार्टी चलाने के लिए तौर-तरीके ही तैयार करने पर काम कर रहे हैं। वह पार्टी में शालीन तरीके से ही काम करने की प्रतिष्ठा रखते हैं और सभी को साथ ले कर चलने में यकीन रखते हैं। कांग्रेस के संक्रमण काल में यही प्रीतम की शक्ति और क्षमता है। पार्टी नेतृत्व ने इसको देखते हुए ही उनको मरी गाय जीवित करने का जिम्मा सौंपा है।
प्रीतम में काबिलियत है लेकिन इतने बड़े सूरमाओं को साथ ले कर चलना या उनको नियंत्रित करना आसान न तो है न ही अभी ऐसा कर पा रहे हैं। सूरमाओं को नेतृत्व का भय दिख ही नहीं रहा। सब जो दिमाग और जुबान में आ जाता है, बोल दे रहे हैं। पार्टी का जो होता है सो होता है। उनको इसकी परवाह नहीं दिखती। राजेन्द्र शाह अभी उतनी हैसियत नहीं रखते कि दिग्गजों पर टिप्पणी कर सके। उन्होंने पूर्व अध्यक्ष किशोर को आइना दिखाते हुए कहा कि सबको अपने दायरे में रहना चाहिए। किशोर ने जिस तरह हरीश पर लगातार हमले का सिलसिला जारी रखा है, उसको देख के लगता है कि वह खुद को राज्यसभा न जा पाने के लिए जिम्मेदार को बिलकुल बख्शने को राजी नहीं है।
यह बात दीगर है कि इससे कांग्रेस को तो नुक्सान हो रहा है, खुद उनकी भी आगे बढऩे की राह रोक रहा है। समीक्षक हैरान हैं कि इतना लम्बा सार्वजनिक जीवन जीने और राजनीति कांग्रेस की ही करती रहने के बावजूद आखिर इंदिरा क्यों हरीश पर प्रहार कर संगठन को कमजोर और बीजेपी सरकार को मजबूत कर रही हैं। कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष के चलते ही प्रीतम कोई बड़ा आन्दोलन या कार्यक्रम सरकार के खिलाफ तैयार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि त्रिवेंद्र सरकार में सब कुछ अच्छा-अच्छा चल रहा हो। कांग्रेस उसकी कमजोरियों और कमियों को न तो पकड़ पा रही है न ही दिखने के बावजूद सरकार को घेरने के लिए कुछ कदम उठा पा रही है। वह पहले खुद को संभाल ले, यही बहुत है। ऐसे आलम में लोक सभा चुनाव के लिए कांग्रेस खुद को किस तरह तैयार कर पाएगी और कैसे बीजेपी की घेराबंदी करेगी, इस पर सबकी नजर टिकनी स्वाभाविक है। आखिर यह नहीं भूलना होगा कि प्रीतम सिंह के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो पार्टी को तब भी खड़ा कर बीजेपी को चुनावी जंग में परास्त कर डालेगी, जबकि वह भीतर की लड़ाई से ही मुक्ति नहीं पा सकी है।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.