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कम्प्यूटर पर कट-पेस्ट की सुविधा ने पुस्तकों की आदत छुड़ायी

आज सारी दुनिया इस बात से चिंतित है कि लोगों की पढऩे-पढ़ाने की आदत छूटती जा रही है। एक समय था जब नई किताब के बाजार में आते ही उसे कैसे भी प्राप्त कर पढऩे की जिज्ञासा होती थी। घर के ड्राइंग रूम और बिस्तर के सिरहाने किताबें अवश्य होती थीं। भले ही ड्राइंग रूम में रखी किताबें स्टेटस सिंबल के रूप में हों पर इतना सर्वमान्य है कि नई किताबों को पढऩे-पढ़ाने और कालजीवी पुस्तकों को सहेज कर रखना गौरव की बात मानी जाती रही है। डिजिटल क्रान्ति से ज्ञान के विस्तार ने पढऩे-पढ़ाने की आदत को बदल कर ही रख दिया है। दरअसल इन्टरनेट या यों कहें कि खोजी साइटों ने लोगों को शार्टकट की राह दिखा दी है। यही कारण है कि अब पढऩे वाले लोग कम ही रह गए हैं।
पढऩे-पढ़ाने की आदत को खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। यह बेहद चिंतनीय है कि आज की पीढ़ी के पास किताब पढऩे का तो समय ही नहीं है क्योंकि काम तो शार्टकट से ही चल जाता है। इसका सीधा असर प्रिंट मीडिया में भी देखा जा सकता है। पत्र-पत्रिकाएं तेजी से डिजीटल दुनिया में जाने लगी हैं। बदलती जीवन शैली में आज अन्य आदतों के साथ ही पढऩे-पढ़ाने की आदत भी कहीं खोती जा रही है। इसकी गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि दुनिया के कई देश और संगठन अब वल्र्ड बुक नाइट जैसे आयोजन कर लाखों किताबें बांटने की आवश्यकता महसूस करने लगे हैं। टेलीविजन और इन्टरनेट ने पढऩे की आदत ही छुड़ा दी है। लोगों की पढऩे-लिखने की आदत खोती जा रही है। भागमभाग की जिन्दगी में टेलीविजन पर प्रसारित बिन सिर पैर के सीरियलों और चटपटे समाचारों के बीच पढऩे की आदत खो गई है। इन्टरनेट ने जानकारी के छोटे-छोटे केप्सूलों के माध्यम से आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराकर शार्टकट की आदत डाल दी है। सारी दुनिया आज लोगों में कम होती पढऩे की आदत से चिंतित है।
एसएमएस, एमएमएस, ईमेल ने लिखने की आदत को छुड़ा दिया है। इनके कारण दैनिक लेखन में भी जो क्रियेटिविटी होती थी वह लगभग समाप्त होती जा रही है। इसकी जगह अब कट पेस्ट लेती जा रही है। दरअसल कम्प्यूटर पर पत्र लिखना कट पेस्ट ही है। इससे सबसे बड़ा नुकसान आज की पीढ़ी की कल्पनाशक्ति का खोना है। दूसरी ओर स्मरण शक्ति भी प्रभावित होती जा रही है। एक समय पढऩे, बार-बार दोहराने और लिख कर याद करने पर जोर दिया जाता था, बच्चों को एक साथ बैठाकर बारहखड़ी से लेकर गिनती और पहाड़े याद कराए जाते थे, यह सब कहीं खो गया है। यही कारण है कि समाचार पत्रों में शिक्षा के स्तर को लेकर आए दिन पढऩे को मिलता है कि आठवीं के बच्चे को गिनती नहीं आती, लिखना नहीं आता। सही पढ़ नहीं पाता, उच्चारण की गलतियां तो आम बात है। यह विषय से भटकाव न होकर बुनियाद की बात है। एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे कॉमिक्स की दुकानों पर अपनी मनपसंद कॉमिक्स की तलाश में जुट जाते थे। जल्दी से जल्दी पूरी करने का कम्पटीशन होता था। आज तो चंदा मामा, छोटू-मोटू आदि गुजरे जमाने की बात होती जा रही है।
वैसे तो सारी दुनिया में ही पढऩे-पढ़ाने पर जोर रहा है पर हमारे यहां इस पर खास बल दिया गया है। अक्षर को ब्रह्म माना गया है। अक्षर ब्रह्म की साधना की जाती रही है। अन्य साधनाओं की ही तरह शब्द साधना है। शब्दों से मंत्र शक्ति विकसित की गई, मंत्र साधना से शारीरिक-मानसिक बाधाओं के निराकरण के उपाय खोजे गए। पुस्तक के महत्व को इसी से समझा जा सकता है कि पुस्तक पूजा का विधान किया गया। पुस्तक की पूजनीयता का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुस्तक को लेकर भी शोच-अशोच का ध्यान रखा जाता था। जूठे हाथ लगाना तक निषेध माना गया। पुस्तक पढऩे के नियम-कायदे बनाए गए। पुस्तक के पांव छू जाने की स्थिति में सिर के लगाना उसकी पवित्रता को दर्शाता है। आज भी जब पुराण परायण होता है तो यजमान अपने सिर पर पोथी रखकर यात्रा निकालता है। गुरु पूजन पर्व में गुरु के साथ उनकी पुस्तक पूजन का विधान है। मां सरस्वती की पूजन वीणा पुस्तकधारिणी के रूप में की जाती है। ज्ञान की अधिष्ठात्री के रूप में सरस्वती की पूजा की जाती है। बार-बार अध्ययन और मनन पर जोर दिया गया है। करत-करत अभ्यास की बात की जाती है।
पढऩे-पढ़ाने की आदत छूटने से आज सारी दुनिया चिंतित है। हालांकि अब लोगों में पढऩे की आदत डालने के लिए जतन किए जाने लगे हैं। वैज्ञानिक सोच है कि पढऩे से प्राप्त जानकारी हमारे मस्तिष्क पर सीधा असर डालती है। पढऩे से प्राप्त ज्ञान में स्थायित्व व गहनता होती है। व्यक्ति की चिंतन मनन की शक्ति बढ़ती है। सोच में गहनता और गंभीरता आती है। एकाग्रता बढ़ती है। यही कारण है कि लोगों के पढऩे की आदत छूटने से चिंतित दुनिया के देश अब विशेष लोगों को मुफ्त किताबें बांटने की पहल करने लगे हैं। हमारे देश में पुस्तक दान और विद्या दान पर जोर रहा है। समय-समय पर पुस्तकें बांटने की परंपरा रही है। अवसर विशेष पर विश्व बुक नाइट का आयोजन कर दुनिया के लोगों को किताबें वितरित की जा रही हैं।
वर्ष 2011 में पहली बार स्काटलैंड के इडैनवर्ग में विश्व बुक नाइट का आयोजन किया गया। इसकी सफलता व इसके प्रति उत्साह का इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि 2012 में अप्रैल में आयोजित विश्व बुक नाइट में अमेरिका ही नहीं यूरोप के कई देशों की भागीदारी बढ़ गई। मुफ्त किताबें बांटने से किताबों की बिक्री पर पडऩे वाले असर को नजरअंदाज करते हुए बड़े प्रकाशक इस मुहिम में शामिल हुए। इस वल्र्ड बुक नाइट में 25 लाख किताबों का मुफ्त वितरण किया गया है। ऐसा नहीं है कि आयोजन के नाम पर कोई भी किताब बांट दी हो, बल्कि नामी गिरामी लेखकों की जानी-मानी किताबों का वितरण किया गया। इस तरह के आयोजनों में स्कॉटलैंड के साथ ही जर्मनी, बिट्रेन, आयरलैंड, अमेरिका के साथ ही दुनिया के कई देश जोरशोर से हिस्सा लेने लगे हैं। विश्व पुस्तक मेलों के साथ ही स्थानीय स्तर तक पुस्तक मेलों का आयोजन होने लगा है। जिस तरह से पासबुक, रेडीरेकनर टाइप के गुटकों ने शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है ठीक वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व इन्टरनेट के शार्टकट ने पढऩे की आदत को प्रभावित किया है। आशय यहां इन्टरनेट के महत्व का नकार नहीं है केवल यह है कि किताबी ज्ञान को भी पूर्ववत महत्व मिलना ही चाहिए नहीं तो इंस्टेंट जानकारी के आधार पर दुनिया अधिक दिन नहीं चल सकेगी।
आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में लोग स्वप्रेरणा से पुस्तकें खरीद कर पढऩे की आदत डालेंगे ताकि सतही ज्ञान से ऊपर उठकर ज्ञान का विस्तार हो सकेगा। आओ हम सब मिल कर किताबों की दुनिया में लौटने का संकल्प लें। अक्षर ब्रह्म की साधना की सनातन परंपरा को जीवंत करें।

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