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सरकार के फैसलों के पीछे कौन

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेद्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा अगर ढेंचा बीज घोटाले को छोड़ दें तो सार्वजनिक जीवन में साफ और सरल रही है। बीज घोटाले में उनको क्लीन चिट मिल चुकी है। आलोचक या विरोधी इसके लिए भले कोई भी आरोप लगाए कि दोषमुक्त होने का प्रमाणपत्र उनको अपनी सरकार में मिला। संघ की पृष्ठभूमि वाले और संघ के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खासमखास त्रिवेंद्र के लिए माना जाता है कि वह 17 साल की अवस्था वाले उत्तराखंड के अब तक के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं। बीजेपी राज के सबसे मजबूत मुख्यमंत्री तो हैं ही। बीजेपी की छवि उत्तराखंड राजनीति में इसलिए भी खराब है कि वह स्थिर सरकार नहीं दे पाती है और मुख्यमंत्री भी लगातार बदलती रहती है। मौजूदा मुख्यमंत्री इस कदर शक्तिशाली और आलाकमान के विश्वासपात्र हैं कि वह पांच साल गुजार दें तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। त्रिवेंद्र खुशकिस्मत हैं कि उनको गठबंधन सरकार नहीं मिली। जो सरकार वह चला रहे हैं, उसके पास ऐसा बहुमत है, जो प्रधानमंत्री मोदी को मिले अवसर से कुछ ही कम है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि त्रिवेंद्र अपनी, मोदी, शाह और पार्टी की छवि को ध्यान में रखते हुए सरकार को धमक के साथ और बिना किसी विवाद या हंगामे के चलाएंगे।

इस उम्मीद को ठेस पहुंच रही है और लगातार पहुंच रही है। ताजा मामला पिट्कुल में पांच दागी अभियंताओं को बहाल करने का फैसला है। यह हल्ला भी आसमान में तैर रहा है कि जल्दी ही एक बेहद विवादास्पद मास्टर को एक बेहद ही अहम प्राधिकरण में प्रमुख पद पर बैठाया जाएगा। इससे पहले भी कई फैसले इस सरकार ने लिए हैं, जिसके कारण मुख्यमंत्री को विपक्ष और मीडिया का निशाना बनना पड़ रहा है। खास बात यह है कि इन फैसलों को छोड़ दिया जाए तो त्रिवेंद्र पर कोई घपले या घोटाले का आरोप निजी तौर पर नहीं लगा है। इन सबको देखते हुए यह सवाल उठ खड़ा होना वाजिब है कि जब खुद त्रिवेंद्र का दामन साफ है और व्यक्तिगत तौर पर अपनी छवि को लेकर वह बहुत सतर्क हैं तो फिर ऐसे विवादित फैसले क्यों ले रहे हैं और कौन उनको ऐसा करने की सलाह दे रहा है? ऐसा कौन है जो त्रिवेंद्र और पार्टी के बड़े नेताओं तथा संगठन की साख को दांव पर लग रहा है?
पार्टी के दिग्गज और सियासत की नब्ज पकडऩे वाले मानते हैं कि दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में नतीजे जो भी हों, त्रिवेंद्र की कुर्सी को कोई खतरा नहीं है। हाई कमान पूरी तरह उनके है। यह वाकई बड़ी बात है। इसके चलते त्रिवेंद्र पर पार्टी के भरोसे को कायम रखने का भारी दबाव रहेगा। साथ ही लोकसभा की पांचों सीटें जिताने की अहम जिम्मेदारी भी होगी। पांचों सीटें जितना तब मुमकिन है जब सरकार बेदाग चलती रहे। विवादों से दूर रहे। जन सरोकारों से जुड़े फैसले लें। दागियों, भ्रष्ट अफसरों या राजनेताओं को दंडित करें और दूर रखें। खास बात यह है कि ऐसा होता नहीं दिख रहा है। सबसे पहले तो कांग्रेस पृष्ठ भूमि वाले पांच लोगों को मंत्री बना करउन्होंने जो सन्देश दिया, वही सकारात्मक नहीं निकला। इसके बाद कई विवादों से घिरे एक शिक्षक को उन्होंने एक के बाद एक मलाईदार और अहम कुर्सी सौंप कर उन्होंने अभी तक लोगों को चौंका रखा है। किसी की समझ में यह नहीं आया है कि आखिर जिसके पास प्रोफाइल के नाम पर सिर्फ बदनामी हो, उस पर मुख्यमंत्री का हाथ क्यों है? यह चर्चा है कि अभी उन्हें और भी अहम कुर्सी सौंपी जानी है। यह कुर्सी हालांकि, आईएएस कैडर के लिए है, लेकिन उनके नाम की चर्चा होना वाकई हैरान करने वाली है। इसमें कोई पेंच फंसा तो ऐसा संभव है कि उनको उसी प्राधिकरण में कोई और पद सौंप दिया जाए। कहा तो यह जा रहा है कि इस मामले को लेकर शासन के दो आला अफसरों में मतभेद तक हैं। वैसे एक तथ्य यह भी है कि अभी वह जिस कुर्सी पर है, उसमें भी वरिष्ठ आईएएस अफसर बिठाए जाते हैं।
मुख्यमंत्री नौकरशाही में एक खास लॉबी से जुड़े आईएएस अफसरों को ही तवज्जो दिए जाने और उनको अहम कुर्सियां सौंपे जाने को लेकर भी सवालों के घेरे में हैं। इसके पीछे क्या राज है, यह कोई नहीं समझ पा रहा है। कई तेजतर्रार आईएएस जिनमें ज्यादातर युवा हैं, इन दिनों पैदल हैं। उनके पास एक किस्म से काम ही नहीं है। सरकार उनको कोई काम देने के मूड में दिख भी नहीं रही है। बताया जाता है कि ये वो नौकरशाह हैं, जिनको सरकार की धुरी बन चुके नौकरशाह या तो पसंद नहीं करते हैं या फिर उनकी लॉबी से नहीं हैं। त्रिवेंद्र पर उत्तराखंड ऊर्जा निगम के प्रबंध निदेशक की कुर्सी पर बीसी के मिश्र को बिठाए जाने को लेकर भी खूब ऊंगली उठी। मिश्र पर तमाम आरोप लगते ही नहीं रहे हैं बल्कि उनको पूर्व में बर्खास्तगी भी झेलने पड़ चुकी है। इतना ही नहीं उनके पास मौजूदा कुर्सी पर बैठने के लिए अनुभव भी नहीं था। त्रिवेंद्र सरकार की जो अच्छी नियुक्तियां समझी जाती हैं, वे संयोग से आईपीएस से जुड़ी हैं। मौजूदा डीजीपी अनिल रतूड़ी और उनसे पहले एमए गणपति वाकई बेहद काबिल और साफ सुथरी छवि वाले हैं। दोनों को पुलिस प्रमुख बनाकर एक किस्म से त्रिवेंद्र सरकार ने अपनी छवि चमकाई है। यह बात अलग है कि रतूड़ी को काटने के लिए सरकार के पास विकल्प भी नहीं है।
सरकार के फैसलों के कारण ऐसा नहीं कि सिर्फ सियासी समीक्षक हैरान हैं। पार्टी के भीतर भी ऐसे लोग हैं, जिनको समझ में नहीं आ रहा है कि मुख्यमंत्री के पास ऐसी कौन सी मजबूरी है, जो ऐसे फैसले कर रहे हैं या फिर कुछ खास अफसरों के प्रभाव में हैं। खास तौर पर यह देखते हुए कि त्रिवेंद्र के बारे में कहा जाता है कि वह किसी के दबाव में नहीं आ रहे हैं। यहां तक कि जो उनके खास राजनेता हैं वे भी शिकवा करते हैं कि उनको तवज्जो नहीं मिल रही है। त्रिवेंद्र पर यह आंच आना इसलिए चकित करता है कि यह सरकार जीरो टॉलरेंस वाली होने का दावा करती है। भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा करती है। संघ की पैनी नजर में होने की बात की जाती है। लिहाजा, छोटी से भी गलती या फैसला भी सूक्ष्मदर्शी से गुजर कर निकल रहा है।

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