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नौकरशाही और मीडिया

इसलिए मौजूदा दौर में पत्रकारों के लिए काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है। उसके लिए आज बढिय़ा खबर लाना और साथ में कम्पनी के लिए पैसा जुटाना अनिवार्य हो गया है। मजबूरी ऐसी हो गई है कि पत्रकार या तो नौकरशाहों को अपने दबाव में लेने के लिए उलटी-सीधी खबरें लिख दे रहे हैं या फिर उनके जनसम्पर्क अधिकारी बन जा रहे हैं। ऐसा ही हाल नौकरशाहों का भी हो गया है…

पत्रकार के लिए अगर सबसे मुश्किल काम है तो नौकरशाह के साथ रिश्ते को संभाले रखना। आज के दौर में तो यह बेहद मुश्किल काम हो चुका है। खास तौर पर जब अखबार कम्पनियां और प्रबंधन चाहते हैं कि पत्रकार उनके लिए पैसा भी जुटाए। कैसे भी। तकरीबन सभी बड़े-छोटे अखबारों में यह चलन तेजी पर है। दिक्कत यह है कि ऐसा तभी मुमकिन है जब पत्रकार के संबंध नौकरशाहों के साथ अच्छे हों। भले मधुर न हो। मंत्री और राजनेता इसलिए नहीं कह रहा हूं कि आज की तारीख में वे अपनी तवज्जो खो चुके हैं। मंत्रियों की अनुमोदित फाइल सचिव क्या अपर सचिव तक बदल डालते हैं। मंत्री अपने काम के लिए सचिवों के दफ्तरों में बेहिचक नजर आते हैं।
मतलब की बात पर आते हैं। अगर आप तेजतर्रार और खुर्राट किस्म के पत्रकार हैं और एक या दो नौकरशाह से भी आपकी मित्रता है तो आप अपनी कम्पनी के बहुत काम के हैं। आईएएस अफसर, खास तौर पर सीधी सेवा वाले। जो कैबिनेट सचिव तक जाते हैं राज्यों में मुख्य सचिव बनते हैं। दरअसल, ताकत ही उनके पास है। कुछ पीसीएस से आईएएस बने अफसरों को छोड़ दिया जाए तो 17 साल के उत्तराखंड में सिर्फ और सिर्फ सीधी भर्ती वाले आईएएस अफसरों का ही बोलबाला रहा है। चाहे वह आज के अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश हो या फिर दो साल पहले तक सरकार की धुरी रहे मुख्य सचिव (मुख्य प्रधान सचिव भी बने) पद से रिटायर हुए राकेश शर्मा या फिर प्रभात कुमार सारंगी। आज ओम प्रकाश ही सरकार चला रहे, ऐसा सभी कहते हैं। समझा जाता है कि वह वैसे ही ताकत रखे हुए हैं, जैसा कभी सारंगी रखते थे। उस वक्त के मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी वही करते थे, जो सारंगी चाहते थे। मुख्यमंत्री के सचिव सारंगी मंत्रियों तक को हुक्म सुनाया करते थे। मुख्य सचिव रहे और बाद में केंद्र सरकार में सचिव रहे एम रामचंद्रन की भी धमक को लोग आज तक याद रखते हैं।
अफसर और भी रहे, जो अपनी काबिलियत और ज्ञान से जलवा बिखेरते रहे, लेकिन इनमें से कुछ ने अपना ज्ञान और हुनर को गलत जगह लगा दिया। इसका उनको खामियाजा भुगतना पड़ा वरना उनका जवाब नहीं था। ऐसे ही अफसरों में अमरेन्द्र सिन्हा और विजेंद्र पाल शुमार किए जा सकते हैं। अमरेन्द्र कंप्यूटर घोटाले में करियर चौपट करा बैठे और पाल अपनी मर्जी के मालिक और मुंहफट होने के चलते नुक्सान खा बैठे। बहरहाल, बात पत्रकार और नौकरशाह के बीच के रिश्ते की चल रही है। हां तो ये वो अफसर थे, जो दबंग थे और दबना उनकी फितरत में नहीं था। ऐसे अफसरों के रहते पत्रकार को बड़ी खबरें सरकार और विभागों से निकाल कर लाना और खोजी पत्रकारिता को जिन्दा रखना, परेशानियों से भरा होता है। अगर आप दफ्तर में कमजोर हैं या आपने स्टोरी कमजोर लिख दी तो आपकी छुट्टी होने में देर नहीं लगेगी। आज के दौर की पत्रकारिता और अखबार प्रबंधन एक दम अलग किस्म का है। अब सिर्फ कारोबार और पैसा मतलब रखता है। एक बड़ी खबर और बड़ा विज्ञापन में से विज्ञापन को तरजीह मिलती है अब। विडंबना यह है कि मीडिया घरानों में आन्तरिक गुटबाजी और राजनीति इस कदर हावी है कि नौकरशाही या मुख्यमंत्री के साथ भविष्य में काम पडऩे के लिहाज से थोड़ा सा भी नरम रवैया अपनाया तो बिक जाने का ठप्पा तत्काल ही लगा दिया जाता है या फिर ब्रांडिंग करने का।
इसलिए मौजूदा दौर में पत्रकारों के लिए काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है। उसके लिए आज बढिय़ा खबर लाना और साथ में कम्पनी के लिए पैसा जुटाना अनिवार्य हो गया है। मजबूरी ऐसी हो गई है कि पत्रकार या तो नौकरशाहों को अपने दबाव में लेने के लिए उलटी-सीधी खबरें लिख दे रहे हैं या फिर उनके जनसम्पर्क अधिकारी बन जा रहे हैं। ऐसा ही हाल नौकरशाहों का भी हो गया है। कई नौकरशाहों को मैं करीब से जानता हूं। वे मेरे साथ पुराने रिश्ते और तकरीबन मित्रता के नाते कई बार दिल की बात बांट लेते हैं। उनकी दिक्कत है कि वे सभी को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं या उसके हक में नहीं हैं। ऐसे में उनके अच्छे काम सुर्खियां नहीं बटोर पाते हैं। उलटे पत्रकार सूक्ष्मदर्शी ले कर उनके विभागों में घुसे रहते हैं। अमरेन्द्र और राकेश संबंध बनाए रखने में फिर भी सुलझे हुए अफसर थे। दोनों एक ही बैच के थे। इसके बावजूद मीडिया में दोनों को बहुत नकारात्मक रवैया भी झेलना पड़ा।
कह सकते हैं कि राज्य गठन के शुरूआती दौर के नौकरशाह खुशकिस्मत थे। वे आज जैसी मीडिया के पल्ले नहीं पड़े। पहले नौकरशाह जिन्होंने मीडिया के डंक को झेला था, मधुकर गुप्ता थे। वह मुख्य सचिव भी बने और बाद में केन्द्रीय गृह सचिव भी रहे। उनका और उनकी पत्नी का नाम उत्तराखंड की सियासत को झकझोर देने वाले जैनी सेक्स स्कैंडल से जुड़ा और वह सफाई देते-देते थक गए कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है। इस स्कैंडल में मैंने एक के बाद एक कई स्टोरी लिखी थी। उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। एनडी तिवारी मुख्यमंत्री थे। उन पर विधानसभा से ले कर सडक़ों तक हमले हो रहे थे। तिवारी ने सफाई और चतुराई के साथ डॉ. हरक सिंह रावत से सदन में इस्तीफा देने का ऐलान करवा दिया। इससे पहले उनका इस्तीफा अपने पास लेकर रख लिया था। डॉ. रावत आज त्रिवेंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
डॉ. रावत ने सीबीआई जांच का सामना किया। फिर मैंने एक स्टोरी यह भी लिखी कि जैनी की खुद की पृष्ठभूमि संदिग्ध है। बच्चे के जच्चा-बच्चा कार्ड में पिता के नाम की जगह बबलू लिखा जाना भी डॉ.रावत के हक में गया। इस स्टोरी को भी मैंने ही ब्रेक किया था। कार्ड हकीकतराय नगर, देहरादून का बना था। इससे पहले जैनी बच्चे के पिता का नाम हरक सिंह बता रही थी। बबलू के बारे में वह कुछ खास नहीं बता पाई। यह कार्ड मेरे पास था और हरक की गुजारिश पर इसकी एक कॉपी मैंने उनको दे दी थी। इसके बाद ही हरक का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा। इस मामले में मधुकर गुप्ता जैसे-तैसे अपनी जान बचा कर केंद्र सरकार में चले गए।
पत्रकारों की मुसीबत मौजूदा सन्दर्भ में कितनी ज्यादा है, यह इसी से पता चलता है कि एक बड़े अखबार में एक दिन जब बीच के दो पेज का व्यावसायिक दर वाला विज्ञापन छपा तो प्रतिद्वंद्वी अखबारों के संपादक और महाप्रबंधक तक विज्ञापन दाता महकमे के प्रमुख सचिव के दफ्तर के बाहर पांच दिन तक जमे रहे। बाद में उनको मामूली कीमत में उतना ही बड़ा विज्ञापन छापना पड़ा। बाजार में खुद को टिकाए रखने के लिए। इसमें अहम बात यह थी कि इनमें जिन दो अखबारों को विज्ञापन नहीं मिला था, उन दोनों के ब्यूरो प्रमुख उस नौकरशाह के खिलाफ जम कर खबरें लिखा करते थे। बाद में उन्होंने महसूस किया कि नौकरशाहों के साथ बिगाडक़र रखना कभी-कभी कितनी मुसीबत का सबब बन जाता है। अब ऐसे हालात में बताइये कैसे पत्रकार अपना काम खुल कर करें। खास कर जब विज्ञापन जुटाने की भी जिम्मेदारी उसके कन्धों पर डाल दी जाए और कम्पनी के तमाम उलटे-सीधे काम भी कराने हों। इसके चलते पत्रकार मजबूरी में लायजनर या फिर दलाल की शक्ल ले रहे हैं, मजबूरी में।

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