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दागी बाबा फरीद कॉलेज पर किसकी मेहर?

> सरकार क्यों मजबूर हुई तालाबंदी का फैसला बदलने को?
> मालिकों के खिलाफ पहले पुलिस रिपोर्ट भी हो चुकी है
> लगातार शिकायतों से राज्यपाल भी खफा

बाबा फरीद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में सरकार ने छात्रों की शिकायत सही पाए जाने के बाद हमेशा के लिए ताला लगा देने का फैसला किया था। गोल्डन फारेस्ट की विवादित और अदालत में लंबित जमीन पर अवैध रूप से खड़ी इमारत में चल रहे संस्थान के खिलाफ राज्य मानवाधिकार आयोग ने सरकार को कड़े कदम उठाने का फरमान सुनाया था। सरकार ने उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय और जिलाधिकारी को तालाबंदी की कार्रवाई के लिए चिट्ठी लिखी। अब ताज्जुब मत होइए कि इस विवादों के घेरे में रहने के शौकीन संस्थान को बंद करने की कार्रवाई तो नहीं हुई उलटे सरकार ने अपने ही फरमान को बदल डाला और इसका कोई ठोस तर्क भी नहीं दिया यानि, जिन छात्रों को संस्थान के कारण तकलीफ हुई और वे मारे-मारे फिरे, उनको इन्साफ भी नहीं दे पाई सरकार। इसके बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि तमाम शिकायतों और घपलों के साथ संचालित हो रहे इस कॉलेज पर सरकार की मेहर आखिर क्यों लगातार बनी हुई है और क्यों उसका बाल भी बांका नहीं हो रहा है।
राज्य गठन के दौरान जब राजधानी के कई कॉलेज छात्रों के भोलेपन और नासमझी के कारण अपना खजाना लगातार भर रहे थे और जब पुलिस मुकदमे में फंसे तो गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार होने वालों में अर्ने इंस्टीट्यूट के मालिक भी थे। इस इंस्टीट्यूट का जिक्र इसलिए किया जा रहा है कि बाद में इसके मालिकों ने इसी का नाम बदल कर बाबा फरीद कर लिया। इसके बाद भी उसकी कारस्तानियां जारी रही। सरकार को इस कॉलेज की शिकायतें लगातार मिलती रही तो उस पर जांच बैठा दी गई थी। जांच में एक बार फिर यह कॉलेज ढेरों गड़बडिय़ों का आरोपी पाया गया है। ताज्जुब है कि इसकी जांच रिपोर्ट मौजूद होने के बावजूद सरकार ने कभी भी इसके प्रबंधन के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की। सूत्रों के मुताबिक कॉलेज प्रबंधन को यूटीयू और सरकार का लगातार परोक्ष सहयोग मिलता रहा। इसके चलते न सिर्फ उसका हौसला बहुत बढ़ता गया बल्कि छात्रों का शोषण भी करता रहा। ताजा विवाद छात्रों को उनके शैक्षिक प्रमाणपत्र लेने और प्रवेश राशि लेने के बावजूद प्रवेश न देने से जुड़ा है। इसके बाद छात्रों ने प्रशासन, शासन और राज्य मानवाधिकार आयोग में कॉलेज प्रबंधन की शिकायत की थी।
आयोग के संस्थान के खिलाफ दिए गए फरमान के बाद सरकार ने जो आदेश ताला लगा देने का जारी किया था, उसमें अपर मुख्य सचिव (तकनीकी शिक्षा और मुख्यमंत्री) ओमप्रकाश के दस्तखत थे। इस आदेश पर अमल तो हुआ नहीं बल्कि ओम प्रकाश पर दबाव दाल कर उनसे ही आदेश को बदलवा देने में संस्थान के मालिक कामयाब हो गए। हैरानी की बात है कि यह मामला मुख्य सचिव एस रामास्वामी तक भी गया। उन्होंने भी तालाबंदी के फैसले को लागू कराने में असमर्थता जता दी। जो संस्थान नाम बदल कर काम कर रहा हो, जिसके मालिकों के खिलाफ छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने और फर्जी कॉलेज चलाने के आरोप लगे हों तथा फरार रहे हों, सरकार की जांच रिपोर्ट में कई मामलों में आरोपी पाए गए हों, गोल्डन फारेस्ट की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा किया हो, 52 पाठ्यक्रम सीमित बुनियादी सुविधाओं के बावजूद चल रहे हों, खुद राजभवन और सरकार उसके खिलाफ आदेश जारी कर चुका हो, उस कॉलेज के प्रबंधन का फिर भी कुछ न बिगडऩा त्रिवेंद्र सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति का मखौल ही है।
सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल केके पॉल ने भी इस कॉलेज के खिलाफ मिल रही तमाम शिकायतों के मद्देनजर जांच कराने का फैसला किया है। उन्होंने श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.उदय सिंह रावत को जांच सौंपी है। प्रो.रावत ने वक्त की कमी होने के कारण जांच कर पाने में असमर्थता जताई है, ऐसा सूत्रों का कहना है। इसके बाद यह जांच अब किसी और को सौंपी जा रही है। राज्यपाल और सरकार की नजरों में संस्थान की प्रतिष्ठा इस कदर खराब होने और राज्य मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के बावजूद बाबा फरीद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के खिलाफ कार्रवाई होने के बजाय उसको संरक्षण दिए जाने से सबसे ज्यादा सवाल अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और बीजेपी पर भी उठ रहे हैं, जो इन संस्थानों के खिलाफ कुछ कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं।

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