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मंत्री बने पर दबंगई गायब

खामोशी संग कर रहे काम
हरक, आर्य और सुबोध पर लगाम
कैबिनेट की बैठकों में भी कम ही आ रहे सतपाल

देहरादून। वह भी जमाना था जब यशपाल आर्य रूठ जाते थे तो कांग्रेस और मुख्यमंत्री हरीश रावत के माथे पर पसीना छलक आता था। अपने मंत्री को लेकर मुख्यमंत्री इतने ज्यादा दबे-दबे कभी नहीं दिखे थे लेकिन आर्य जो कि पिछली कांग्रेस सरकार में कई मलाईदार मंत्रालयों के मंत्री होने के साथ ही काफी समय तक पार्टी अध्यक्ष भी रहे, ने एक प्रकार से पार्टी और सरकार को उंगलियों पर नचाया था। हरक सिंह रावत से ज्यादा शातिर मंत्री प्रदेश में शायद ही कोई रहा हो। बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों में मंत्री से नीचे न मानने वाले हरक लगातार विवादों से घिरे रहते हैं लेकिन उन्होंने कांग्रेस सरकार में मंत्री रहने के दौरान मुख्यमंत्री रावत को अपनी हर मांग मानने के लिए मजबूर करने में सफलता पाई थी। सुबोध उनियाल की तब तूती बोलती थी जब विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री थे, लेकिन जब बहुगुणा हटाए गए तब भी सुबोध की धमक में मामूली ही कमी आई थी। इसलिए हैरत होती है जब यह धूम धड़ाके को पसंद करने वाले मंत्री और राजनेता आज कल नई नवेली और सहमी सी दुल्हन की तरह बीजेपी सरकार में काम कर रहे हैं।
यह तो अंदाज सभी लगा चुके थे कि कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में जाने वाले इन नेताओं को वहां वैसी आजादी और मनमौजी माहौल नहीं मिलेगा, लेकिन इतना भी अहसास किसी को नहीं था कि बीजेपी में कांग्रेस छोड़ कर आए ये खुर्राट नेताओं की स्थिति चील और गिद्ध की छांव से भी बचने वाले भयभीत सांप जैसी हो जायेगी। असलियत यह है कि इतने दबाव में और इस कदर बच बचा कर काम करने का यह इन पूर्व कांग्रेसी नेताओं का पहला अनुभव होगा। आलम यह है कि नौकरशाह उनकी उस तरह आंख बंद कर के न तो बात मान रहे हैं न ही उनकी दबंगई के प्रभाव में ही आ रहे हैं। ऐसे मामले सामने आने लग रहे हैं, जब अफसर इन मंत्रियों के निर्देशों को ताक पर रख कर अपने हिसाब से फैसला कर रहे हैं। साफ है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने नौकरशाहों को इशारा किया हुआ है कि मंत्रियों, (खास कर कांग्रेस से आए) की बातों और निर्देशों को आंख मूंद कर अमल में न लाए। कोई गड़बड़ी हुई तो वे भी नापे जाएंगे। ऐसे में अफसर भला क्यों कोई जोखिम लें।
शुरू में सतर्क रहे नौकरशाह अब मंत्रियों को तवज्जो देने से कटने लगे हैं। ऐसा न होता तो पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज को हेलीकॉप्टर मुद्दे पर मुख्यमंत्री से अपना दर्द बयान न करना पड़ता। पायलट महाराज को पहाड़ में उतार कर दुबारा लेने नहीं आया था। महाराज के बारे में बताया जाता है कि उनकी कई बातें ऐसी हैं, जो मानी नहीं गई है। इसके चलते वह नाखुश बताए जाते हैं। यह साफ नहीं हो पाया है कि महाराज क्यों मंत्रिमंडल की बैठकों से दूरी बना रहे हैं। अलबत्ता, सियासी वातावरण में तैर रही हवा के मुताबिक महाराज अपने साथ हो रहे बर्ताव से नाराज हैं। मुख्यमंत्री उनकी सुन नहीं रहे हैं, इसलिए वह मंत्रिमंडल की बैठकों में न आ कर अपनी नाखुशी जाता रहे हैं। बाल विकास और महिला कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रेखा आर्य के साथ तो गजब ही हो रहा है। उनकी इच्छा न होने के बावजूद डीपीओ और सीबीपीओ के तबादले कर दिए गए। हैरान मंत्री ने इस पर न सिर्फ ऐतराज जताया बल्कि सार्वजनिक तौर पर कह भी दिया कि इस तबादले की उनको कोई खबर नहीं थी। उनके पास तबादले की फाइल भी नहीं आई। विभागीय प्रमुख सचिव राधा रतूड़ी इस तरह मंत्री को नकारने वाले अफसरों की कतार में नहीं समझी जाती है। उन्होंने जोर दे कर कहा कि तबादले की जानकारी न सिर्फ मंत्री को दी गई थी बल्कि उनसे इस सम्बन्ध में चर्चा भी की गई थी। अब हकीकत क्या है, यह मंत्री और प्रमुख सचिव ही जानते हैं। इतना जरूर है कि बीजेपी से कांग्रेस में गए और फिर वापस बीजेपी में लौट आईं रेखा की इस मामले में अच्छी खासी छिछालेदर ही नहीं हुई बल्कि उन्होंने खुद को कमजोर मंत्री के तौर पर भी स्थापित कर दिया।
आर्य जो कांग्रेस सरकार में सत्ता की मजबूत धुरी हो चुके थे, लेकिन उनके न चाहते हुए भी सरकार ने परिवहन निगम के एक अफसर को, जो निलंबित थे, को आर्य की इच्छा के बगैर बहाल कर दिया। कांग्रेस राज में ऐसा हुआ होता तो आर्य कब के कोप भवन में चले गए होते। हरक तो बहुत दमदार मंत्री थे। बीजेपी में आने के बाद उनकी हनक ही गायब हो गई। वह अपनी पसंद के आईएफएस अफसरों का न तो तबादला कर पा रहे हैं, न ही उनके जल्द होने की उम्मीद ही नजर आ रही है। सुबोध भले कांग्रेस में सहज न होने के नाम पर बीजेपी में चले गए, लेकिन उनको अब लग रहा होगा कि कांग्रेस और बीजेपी में क्या और कितना फर्क है। कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को पहला झटका तभी लग गया था जब उनको उनकी उम्मीदों के माफिक मंत्रालय ही नहीं दिए गए। कांग्रेस का वे सब इतना नुकसान कर चुके हैं और उसको दुश्मन बना चुके हैं कि बीजेपी अब उनका इकलौता घर रह गया है।
बीजेपी में उनके साथ जो भी और जैसा भी बर्ताव हो, उसी में रहना उनकी मजबूरी हो चुकी है। बीजेपी को भी यह पता है। कांग्रेस से आए इन मंत्रियों को लेकर वह आश्वस्त है कि उनके साथ जैसा भी बर्ताव किया जाए, वे कहीं नहीं जाने वाले हैं। फिर बीजेपी के पास जैसा बहुमत है, उसको देखते हुए कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को लगता है कि उनकी जरा सी भी टेढ़ी चाल उनकी मंत्री की कुर्सी जा सकती है। बस यही मजबूरी उनको हनक दूर रख चुपचाप काम करा रही है। बीजेपी में संघ और पार्टी नेतृत्व की पैनी नजर मंत्रियों पर रहती हैं, लेकिन हरक, सुबोध, सतपाल, आर्य और रेखा पर कहा जा सकता है कि अतिरिक्त ध्यान दिया जा रहा है।

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