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शाही को भारी पड़ी सियासत

अध्यक्ष पद पर नामांकन हुआ निरस्त

शाही के लिए इस बिना पर नामांकन निरस्त होना इसलिए भी बहुत बड़ा झटका समझा जा रहा है कि जिस गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का अध्यक्ष बता कर उनका सभा अध्यक्ष पद पर नामांकन निरस्त किया गया, उसमें अभी आगे और विवाद और झगड़े होते रहने की सम्भावना है…

देहरादून। देहरादून में स्थित गोरखाली सुधार सभा के चुनाव इसलिए बहुत अहम होते हैं कि इस संस्था से न सिर्फ गोरखाली समाज के बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं बल्कि इसकी प्रतिष्ठा देश भर में है। इसके बावजूद यह बात अलग है कि कामकाज के मामले में इस संस्था ने अभी वह जगह नहीं बनाई है, जो अभी तक बन जानी चाहिए थी। यह वह संस्था है जहां 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के नायक और देश के पहले फील्ड मार्शल एसएचएफजे मानक शॉ भी आ चुके हैं। इस बार के चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं कि इस बार जो प्रमुख नाम अध्यक्ष पद पर लडऩे के लिए उतरे हैं उनमें कोई भी पूर्व सैन्याधिकारी नहीं हैं। ऐसे में किसी गैर सैन्याधिकारी का अध्यक्ष बनना तय है। इस बार मौका माकूल देखकरमैदान में सूर्यविक्रम शाही भी उतरे लेकिन उनका नामांकन इस बिना पर खारिज कर दिया गया कि वह सियासी दल के अध्यक्ष हैं।
शाही के लिए इस बिना पर नामांकन निरस्त होना इसलिए भी बहुत बड़ा झटका समझा जा रहा है कि जिस गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का अध्यक्ष बता कर उनका सभा अध्यक्ष पद पर नामांकन निरस्त किया गया, उसमें अभी आगे और विवाद और झगड़े होते रहने की सम्भावना है। फ्रंट में उनके विरोधी गुट सिर्फ सभा के चुनाव होने तक का इन्तजार कर रहे हैं। शाही को इस बार सभा अध्यक्ष पद पर जीत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उनको विरोधियों की इस चाल का अंदाज नहीं लग पाया कि फ्रंट के अध्यक्ष के तौर पर उनका विरोध न करने के पीछे असली खेल सभा के चुनाव थे। जिसमें कोई सियासी दल का प्रमुख पदाधिकारी चुनाव नहीं लड़ सकता।
जैसे ही शाही ने सभा के अध्यक्ष पद पर नामांकन भरा, सभा के 16 शाखा अध्यक्षों ने ऐतराज जता दिया कि वह राजनीतिक पार्टी से हैं। इसलिए उनका नामांकन निरस्त कर दिया जाए। चुनाव अधिकारी सुषमा प्रधान ने इस पर नामांकन निरस्त कर दिया। इसके बाद अब नर बहादुर गुरुंग, पदम सिंह थापा और गोविन्द सिंह थापा ही अध्यक्ष पद के उम्मीदवार रह गए हैं। शाही को गोरखाली राजनेता के तौर पर पहचान हासिल है और गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट को उनके वक्त काफी तवज्जो मिला करती थी। जब उमा उपाध्याय उनकी जगह अध्यक्ष बनी तो फं्रट में वह बात नहीं रह गई। इसके बाद एक बार फिर शाही गुट ने फ्रंट पर जबरन कब्जा जमा लिया। उनके धड़े ने उमा को हटा दिया। उस वक्त शाही को यह अंदाज बिलकुल नहीं रहा कि इसका असर गोरखाली सुधार सभा के चुनाव में उन पर पड़ेगा।
अब शाही अपने साथ सभा चुनाव में नाइंसाफी होने की बात कर रहे हैं और इस मामले को अदालत तक ले जाने की बात कर रहे हैं। शाही को सभा की महिला शाखा अध्यक्ष रहीं सारिका प्रधान का बड़ा समर्थक भी समझा जाता है। इतना तय है कि नया अध्यक्ष और कार्यकारिणी आने के बाद सारिका को सभा में फिर प्रवेश शायद ही मिल पाएगा। सभा के इस बार के चुनाव में अध्यक्ष पद पर पूर्व सैन्याधिकारी किसको वोट देंगे, यह भी कौतुहल बना हुआ है। उनकी तादाद काफी है। वे नतीजा बदलने के क्षमता रखते हैं।

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