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बीफ पर राजनीति अलग धंधा अलग !

संजय शर्मा

राजनीति करना और सरकार चलाना दोनों में बहुत फर्क है। दरअसल राजनीति में जो दिखता है वह असलियत में होता नहीं। कम से कम भाजपा के साथ ऐसा ही है। भाजपा की राजनीति का केन्द्र बिंदु सदैव से हिंदू, गाय और मंदिर रहा है। केन्द्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ‘गाय व गोमांस पर राजनीति चरम पर पहुंच गयी है। पिछले तीन साल में देश में ‘बीफ (गाय का मांस)को लेकर कई बार माहौल बिगाडऩे की कोशिश हुई है, इसके चलते हालात भी काफी संवेदनशील हो गए थे। यह भी बड़ा तथ्य है कि इसके बाद से ही बीफ के निर्यात में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई है। अब तो भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश बन गया है। देश की इस उपलब्धि पर उन माननीयों ने एक शब्द भी कहने की जरूरत महसूस नहीं की, जो गौरक्षा के नाम पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार रहते हैं। 

एक कहावत है, हाथी के दांत दिखाने के कुछ और होतेहै जबकि खाने के कुछ और होते हैं। ऐसा ही राजनीति का हाल है। जनता को बरगलाने के के लिए बड़ेे-बड़े दावे किए जाते हैं और सत्ता चलाने की बारी आती है तो उसके उलट काम किया जाता है। देश में गाय और गोमांस कितना संवेदनशील मुद्दा बन गया है यह किसी से छिपा नहीं है। भाजपा की राजनीति का तो केन्द्र बिंदु ही गाय है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में किस तरह हिंदुत्व और गाय का कार्ड खेला गया था, इससे सभी वाकिफ है। इतना ही यूपी चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र में प्रमुखता से इस बात का उल्लेख किया गया था कि यदि प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनती है तो वैध-अवैध स्लाटर हाउस बंद करा दिए जायेंगे। ऐसा हुआ भी। योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालते ही सबसे पहले अवैध स्लाटर हाउस पर कार्रवाई का आदेश दिया था। केन्द्र सरकार भी समय-समय पर दिखाती रही है कि गौ संरक्षण उनके एंजेडे में है। दूर जाने की जरूरत नहीं है। मई माह में केरल में बीफ फेस्टिवल पर विवाद छिड़ा था और बीजेपी इस मुद्दे को और तूल देकर अपनी छवि चमकाने में लग गई थी। और तो और केन्द्र सरकार ने मई माह में ही पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम की एक धारा में बदलाव किया था। इसके तहत जिन मवेशियों की बाजार से खरीद होती है उनको मारा नहीं जा सकता है। इस नियम का दक्षिण भारत में जमकर विरोध हुआ था। भाजपा जहां इस नियम की वकालत करती नजर आई थी तो वहीं कई राज्यों में इसका विरोध भी हुआ था। इतना ही नहीं कई भाजपा शासित राज्य भी इसमें शामिल थे। मेघालय में बीजेपी नेता बर्नार्ड मरक ने भी बयान दिया था कि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो गोमांस पर प्रतिबंध नहीं होगा और बूचडख़ानों को कानूनी रूप से मान्यता दी जायेगी। उन्होंने तर्क दिया था कि इससे विभिन्न प्रकार के मांस की कीमतें घटेंगी।
एक बात तो तय है कि देश की राजनीति हिंदू, गाय जैसे मुद्दों पर सिमट कर रह गयी है। खासकर आजकल गाय और गौमांस बहुत ही संवेदनशील विषय है। अखलाक का मामला हो या आईआईटी में बीफ बनाने को लेकर हुए बवाल से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे देश में यह कितना संवेदनशील मुद्दा है। फिर भी देश में इस पर भ्रम बरकरार है। एक तरफ सरकार पशुओं की खरीद-फरोख्त को लेकर बिल लाती है तो दूसरी ओर नए बूचडख़ाने और आधुनिकीकरण के लिए 15 करोड़ रुपए की सब्सिडी दे रही है। इस स्थिति में सरकार का ही एजेंडा साफ नहीं है तो लोगों को भ्रम होना लाजिमी है। पिछले दिनों खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और आर्थिक सहयोग संगठन (ओईसीडी) की एक रपट में जानकारी दी गई है कि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश है और वह अपनी यह स्थिति अगले दशक तक बनाए रखेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने पिछले वर्ष 15.6 लाख टन बीफ का निर्यात किया था और उम्मीद की जा रही है कि भारत विश्व में तीसरे सबसे बड़े बीफ निर्यातक की अपनी यह स्थिति बनाए रखेगा। भारत 2026 में 19.3 लाख टन के निर्यात के साथ विश्व के 16 प्रतिशत बीफ का निर्यातक होगा। हालांकि, निर्यात होने वाले बीफ के प्रकार को स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन ज्यादातर निर्यात होने वाला मांस भैंसों का रहा है। जैसा कि रपट बताती है कि म्यांमार ने भारत से जानवरों का आयात किया। ओईसीडी के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने पिछले साल 363,000 टन बीफ का आयात किया था और अगले दशक तक यह आंकड़ा बना रहेगा। एफएओ के अनुसार, 2016 में कुल 1.09 करोड़ टन बीफ निर्यात हुआ था और 2026 तक 1.24 करोड़ टन की वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। इस रिपोर्ट में विश्व में बीफ निर्यातक देशों में ब्राजील पहले स्थान पर, जबकि आस्ट्रेलिया दूसरे स्थान पर है। इस रिपोर्ट के बाद हमारे माननीय क्या कहेंगे जिनकी राजनीति ‘गाय और गोमांस पर चलती है।

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