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खुलेगा या नहीं तकदीर का ताला

देहरादून। उत्तराखंड में बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाने का कारखाना लगाया है, कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा, लेकिन यह ताज्जुब की बात है कि इस राज्य से पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोई इस लायक नहीं दिख रहा है कि उनको अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सके। ले-दे कर अजय टम्टा को सरकार में शामिल किया है, जोकि मंत्रीपरिषद का हिस्सा हैं। मंत्रिमंडल में उनके शामिल होने पर शक के बादल ही हैं। उन पर मोदी या पार्टी को शायद इतना यकीन ही नहीं कि स्वतंत्र प्रभार ही दे दिया जाए और कोई ढंग का मंत्रालय सौंपा जाए। उत्तराखंड के साथ मोदी की यह बेरुखी इसलिए हैरान करती है कि यहां से बीसी खंडूड़ी केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। वह वाजपेयी सरकार के सबसे काबिल और सफल मंत्रियों में शुमार किए जाते थे। उनकी इसी क्षमता को देख कर ही उनको 2007 और 2011 में उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया था। उनके नाम पर अनाधिकारिक तौर पर उम्र की बंदिश लग चुकी है, लेकिन भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के तौर पर दो नाम और हैं जिनमें मोदी मंत्रिमंडल का सदस्य बनने की काबिलियत की कमी नहीं है। भले महारानी माला राज्यलक्ष्मी मंत्री बनने की होड़ में न मानी जा रही हो। यह बात अलग है कि सियासत में कभी भी कुछ भी घट सकता है। ऐसे कयास तेज हैं कि जल्द ही मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा। यह इसी महीने संभावित है। उत्तराखंड के लोगों और यहां के सांसदों की नजरें भी उम्मीदों के साथ इस पर टिकी हुई हैं।

इस फेरबदल पर कोश्यारी और निशंक का सियासी भविष्य बहुत हद तक जुड़ा हुआ है। दोनों यहां मुख्यमंत्री बनने के दावेदार के तौर पर खुद को प्रस्तुत करते रहे हैं, लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पहले तो उनको इस लड़ाई में परास्त कर दिया। फिर अब इसकी कोई उम्मीद दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही है कि पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री को जल्द बदल सकता है। खासतौर पर यह देखते हुए कि संगठन में त्रिवेंद्र की जबरदस्त पकड़ है और पार्टी के दिग्गज उनमें विश्वास रखते हैं यानि, कोश्यारी और निशंक के लिए अभी तो राज्य की राजनीति में कोई उम्मीद नहीं दिखती है। ऐसे में उनकी उम्मीदों के तार केन्द्रीय मंत्रिमंडल से ही जुड़ते हैं। यह देखने वाली बात होगी कि क्या मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की उम्मीदों और रणनीति के खांचे में दोनों फिट बैठते हैं या नहीं।
दोनों के अलावा खंडूड़ी को टीम मोदी में जगह मिलने की उम्मीद अब समाप्त प्राय है। महारानी को मौका मिलना आश्चर्य से कम नहीं होगा। खास कर यह देखते हुए कि सांसद के तौर पर उनकी दूसरी पारी भी अवाम को खुश करना तो दूर संतुष्ट तक नहीं कर पाई है। टम्टा को प्रोन्नति मिलने की गुंजाइश नहीं दिखती है। वह कुर्सी पर बने रहे, यही काफी होगा। कोश्यारी और निशंक ही राज्य के उन दो सांसदों में हैं, जिनमें क्षमता के साथ गुंजाइश भी दिखती है। दोनों के लिए मोदी मंत्रिपरिषद में फेरबदल बहुत अहम हो चुका है अगर कोश्यारी को मौका नहीं मिलता है तो यह समझ में आ जाएगा कि उनका सियासी जीवन अवसान पर पहुंच चुका है। आगे उनका भविष्य मार्गदर्शक मंडल के सदस्य से ज्यादा नहीं रह जाएगा। कोश्यारी का संघ में ही नहीं पार्टी के भी कई बड़े नेताओं में अच्छी पैठ है। दिक्कत बस यह है कि वह मोदी और अमित शाह को लुभा नहीं पा रहे हैं। साथ ही उनकी बढ़ती उम्र जो अब 75 पार कर चुकी है, आड़े आ सकती है।
निशंक के हक में उम्र है। उनकी और त्रिवेंद्र की उम्र तकरीबन बराबर है। वह भी खंडूडी, कोश्यारी की तरह मुख्यमंत्री रह चुके हैं। जब वे मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए गए थे, तो उनके सियासी भविष्य पर तभी ताला लगता दिख रहा था। निशंक संघर्ष करके राजनीति में आगे और ऊपर आए हैं और सियासत के माहिर खिलाड़ी हैं। खंडूड़ी और कोश्यारी उनके सियासी दुश्मन रह चुके हैं। यह निशंक की योग्यता है कि उन्होंने दोनों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए बड़ी सफाई से किया। निशंक ने मुख्यमंत्री पद से पहले तो खंडूड़ी को हटवाया फिर खुद मुख्यमंत्री बन गए। इसमें दो राय नहीं है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद से उनके सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। यह बात अहम है कि इसके बावजूद उन्होंने 2012 में विधानसभा का चुनाव विपरीत हालात में, अंदरखाने दगाबाजी झेलने के बावजूद जीता फिर पिछले लोकसभा चुनाव में भी उतर कर बाजी मारकर दिखाई। चार महीने पहले बीजेपी के उत्तराखंड में सत्ता में आने के दौरान सियासी हलके और बीजेपी में अंदरखाने उनके नाम की चर्चा मुख्यमंत्री के तौर पर हलके से चली थी, लेकिन उनका असली दावा तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल में ही दिखाई देता है। उत्तराखंड से टीम मोदी के मंत्रिमंडल में अगर किसी को जगह मिलने की उम्मीद दिखती है तो निशंक को। निशंक से हाई कमान अब शायद नाखुश या नाराज भी नहीं है। ऐसा होता तो उनको लोकसभा का टिकट भी शायद ही मिल पाता। निशंक के लिए टीम मोदी में जाना निजी तौर पर बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं होता है तो उनके लिए सियासी अवसान की घड़ी बहुत जल्द आ जाएगी। उत्तराखंड में त्रिवेंद्र के बने रहने के पूरे आसार अभी से हैं और केंद्र में ही उनकी सम्भावना है। सिर्फ सांसद बने रहना उनके लिए सियासत से जुड़े रहने का सबब नहीं होगा। वह मुख्यमंत्री रहे हैं और उत्तर प्रदेश में भी कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। इसलिए अगर उनको मोदी की टीम में जगह मिलती है तो हैरत भी नहीं होनी चाहिए।उत्तराखंड के लिए भी यहां से किसी का मंत्रिमंडल में शामिल होना बहुत जरूरी है। टम्टा महज राज्यमंत्री हैं। साथ ही लो प्रोफाइल मंत्रियों में शुमार होते हैं। उनके केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में होने के बावजूद राज्य को कोई फायदा होता अभी तक नहीं दिखा है। उनको एक किस्म से उत्तराखंड को प्रतिनिधित्व देने के नाम भर के लिए मंत्री बनाया हुआ है। साथ ही उनको बहुत प्रतिभावान और प्रभावशाली भी नहीं समझा जाता है। कोश्यारी, खंडूड़ी और निशंक ऐसे नाम है, जो राज्य की बात और समस्या को मंत्रिमंडल की बैठक में असरदार तरीके से उठा ही नहीं सकते बल्कि प्रदेश के लिए बहुत लाभदायक साबित हो सकते हैं। अपना सियासी भविष्य तो बचायेंगे ही। आगे भी बढ़ाएंगे।

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