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तो क्या केन्द्र सरकार के निशाने पर हैं योगी ?

प्रधानमंत्री मोदी के बारे में कहा जाता है कि वह एक हद तक ही किसी को बर्दाश्त करते हैं। देर-सबेर वह नकेल कस ही देते हैं, खासकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का। ऐसा ही कुछ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ हुआ है। उनके धुर विरोधी शिव प्रताप शुक्ल को मोदी ने अपने कैबिनेट में शामिल कर योगी पर लगाम कसने की कोशिश की है। यह योगी के लिए बहुत बड़ा झटका है। सभी को पता है कि गोरखपुर में योगी का एकछत्र राज्य है। उन्होंने किस तरह शिव प्रताप शुक्ल का राजनीतिक कॅरियर खत्म किया था। शिव प्रताप शुक्ल की ताजपोशी से निश्चित ही उनका गोरखपुर व पूर्वांचल की राजनीति में कद बढ़ा है। पीएम मोदी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सभी को पता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने हिंदुत्व का वकालत करने वाले नेताओं से दूरी बना ली थी, उसमें योगी भी शामिल थे, लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव में शानदार जीत मिलने के बाद से मोदी ने योगी को अहमियत दी। योगी को अहमियत देना मोदी की सियासी मजबूरी भी थी। योगी भी सत्ता में काबिज होने के बाद आक्रामक मूड में दिखे। अपने ताबड़़तोड़ फैसलों की वजह से एक महीने में ही मोदी को लोकप्रियता के मामले में पीछे छोड़ दिए। लोग उन्हें भावी प्रधानमंत्री तक कहना शुरु कर दिए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी से आगे निकलने की खबरों ने सीएम योगी के भविष्य के लिए खतरा पैदा कर दिया और कहीं न कहीं उसके बाद दिल्ली दरबार से उनके कामकाज में अडंग़ा लगाने की शुरुआत हुई।

दरअसल उत्तर प्रदेश में कमान संभालने के बाद सीएम योगी ने जो तेजी दिखाई थी उसने राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया था। योगी के कुछ फैसलों की चर्चा देश ही नहीं विदेशों में भी सराही गई थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद योगी की आक्रामकता गायब हो गई। राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरु हो गई थी कि केन्द्र को योगी सरकार की कार्यप्रणाली रास नहीं आ रही है। योगी को खुले हाथ से काम करने नहीं दिया जा रहा है। नौकरशाही के चयन से लेकर कई बड़े फैसलों में उन्हें दिल्ली दरबार की हरी झंडी लेनी पड़ती है। शिव प्रताप शुक्ल के राज्यमंत्री बन जाने से यह तो पुष्टï हो गया कि लखनऊ और दिल्ली के बीच सब कुछ सहज नहीं चल रहा है। यह बात भले ही साबित न हो पर नौकरशाही में यह चर्चा आम है कि सीएम योगी को अपने मन पसंदीदा नौकरशाहों को चुनने का मौका नहीं दिया गया और नतीजा यह हुआ कि यूपी की ब्यूरोक्रेसी सीएम योगी के हाथों से धीरे-धीरे निकलती चली गई। एक के बाद एक, कई घटनाओं से दिल्ली दरबार का दखल बढ़ता चला गया और सीएम योगी चाह कर भी कुछ नहीं कर पाये। योगी सरकार के साढ़े पांच माह के कार्यकाल में कई ऐसी बड़ी घटनाएं हुई जिसकी वजह से सरकार की खूब किरकिरी हुई। सहारनपुर में जातिगत विवाद से लेकर , रायबरेली में पांच ब्राह्मïणों की हत्या और गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से मरतेबच्चों की खबरों ने केन्द्र को भी चिंतित कर दिया। सबसे ज्यादा योगी सरकार की किरकिरी गोरखपुर कांड पर हुई। गोरखपुर कांड पर जिस तरह पूरी दुनिया में चिंता व्यक्त की गई, अमेरिका से लेकर लंदन तक के अखबारों ने गोरखपुर कांड की खबरों को हवा दी, उससे केन्द्र की त्यौरी चढ़ गई और कहीं न कहीं योगी सरकार के लिए भी केन्द्र की तरफ से कड़ा संदेश सामने आया। इसके बाद से ही यह चर्चा शुरु होने लगी थी कि आखिर केन्द्र और यूपी के बीच सामंजस्य कब बेहतर हो पायेगा। राजनीतिक पंडितों की मानें तो योगी आदित्यनाथ बीजेपी शीर्ष नेतृत्व से कई बार कुछ महीनों के लिए फ्री होकर काम करने की अनुमति मांग चुके हैं लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने उनकी बात को तवज्जो नहीं दिया। इतना ही नहीं सीएम योगी और उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य के बीच पहले दिन से जो शीत युद्ध चल रहा था वह आज तक खत्म नहीं हो पाया। पिछले दिनों राजनीतिक गलियारों में ऐसी खबरें उड़ी थीं कि योगी के कहने पर केशव मौर्य को दिल्ली बुलाया जा रहा है। उन्हें केन्द्र में मंत्री बनाया जायेगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। केशव ने यूपी छोडक़र जाने से साफ मना कर दिया था। केशव की बात को प्राथमिकता मिलने से स्पष्टï है कि उनको दिल्ली दरबार का समर्थन प्राप्त है। केशव को न बुलाकर केन्द्र ने योगी की राह मुश्किल कर दी गई। अभी तक केन्द्र सरकार योगी के कामकाज में दखल देती थी लेकिन शिव प्रताप शुक्ल का कद ऊंचा कर मोदी ने सीधे-सीधे योगी के कार्यक्षेत्र में दखलंंदाजी की है। शिव प्रताप शुक्ल के बहाने योगी को गोरखपुर से कमजोर करने की कोशिश की गई है। योगी और शिव प्रताप शुक्ल की लड़ाई तब शुरु हुई, जब लगातार चार बार गोरखपुर से विधायक रहे शिव प्रताप को टिकट देने का योगी ने विरोध कर दिया और कहा कि यहां से राधा मोहन अग्रवाल को टिकट दिया जाए। भाजपा ऐसा करने को तैयार नहीं हुई तो योगी ने राधा मोहन को हिंदू महासभा से चुनाव लड़वा कर जितवा भी दिया। यहीं से दोनों के बीच राजनीतिक अदावत शुरू हुई थी। आलम यह हो गया था कि योगी ने शिव प्रताप शुक्ल की पूरी सियासत खत्म कर दी थी। वह बीजेपी में साइड लाइन कर दिए गए थे, लेकिन पार्टी के प्रति उनकी वफादारी खत्म नहीं हुई और इसी के दम पर उनकी दोबारा राजनीति में वापसी हुई। 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो शिव प्रताप शुक्ल का 14 साल का वनवास खत्म हुआ और उनका सियासी पुनरुद्धार हुआ।

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