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आस्था की आड़ में अपराध

डेरा सच्चा सौदा की वेबसाइट पर इस संगठन को च्आध्यात्मिकज् बताया गया है। क्या खट्टर सरकार भी इस संगठन को आध्यात्मिक ही मान बैठी थी? ऐसे सवालों का जवाब नहीं मिलने वाला, लेकिन यह साफ है कि खट्टर सरकार की एक और शर्मनाक नाकामी ने केंद्र सरकार के साथ पूरी पार्टी की छवि पर बहुत बुरा असर डाला है। अगर भाजपा अब भी चेतती नहीं तो उसे बुरे परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। आखिर खट्टर सरकार की एक और नाकामी के बाद भी भाजपा की ओर से यह कहने का क्या मतलब कि वे अपने पद पर बने रहेंगे? क्या पार्टी को लोकलाज की परवाह नहीं?
डेरा सच्चा सौदा के मुखिया बाबा गुरमीत के खिलाफ दुष्कर्म के मामले में फैसला आने के मात्र २४ घंटे पहले हरियाणा के शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा ने मीडिया को बताया च्दंड प्रकिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा १४४ डेरा के अनुयाइयों पर लागू नहीं होती। वे तो हमारी सरकार के अतिथि हैं जिनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था हमारा दायित्व है। ये तो इतने शांतिप्रिय लोग हैं कि एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते।ज् मंत्री को मालूम होना चाहिए कि २०१४ में हुए विधानसभा चुनाव में जीत के बाद अपने शपथ ग्रहण में उन्होंने कहा था कि च्मैं भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा व निष्ठा रखूंगा।ज् और साथ ही यह भी कि १५६ साल पुरानी इस धारा में च्किसी भी व्यक्तिज् (अर्थात किसी को छूट नहीं) लिखा है और राज्य सरकार चाह कर भी केंद्र के इस कानून में कोई संशोधन नहीं कर सकती है। यहां आपको यह भी बताता चलूं कि इस मंत्री सहित राज्य के अन्य तीन मंत्रियों ने डेरा को कुल एक करोड़ रुपये का अनुदान दिया है जिसमें इस मंत्री द्वारा पिछले माह दिया गया ५० लाख रुपये का अनुदान भी शामिल है। दरअसल प्रजातंत्र का दुर्भाग्य यह है कि अदालत द्वारा बाबा को दुष्कर्मी करार देने के फैसले से गुस्साए लाखों च्शांतिप्रिय अनुयाइयोंज् द्वारा की गई हिंसा रोकने में असफलता के आरोप में इन जनप्रतिनिधियों के बजाय पंचकूला के पुलिस उपाधीक्षक को निलंबित होना पड़ा है।
हरियाणा में जब पिछला विधानसभा का चुनाव हो रहा था तो उस दौरान भाजपा ने इस आधुनिक बाबा से मदद मांगी और बाबा ने सार्वजनिक रूप से आशीर्वाद के रूप में समर्थन की घोषणा की। इसके पहले कांग्रेस और इनेलो जैसी पार्टियां रात के अंधेरे में यह सब करती थीं और बाबा भी गुपचुप रूप से अनुयाइयों को आदेश देते थे। यह पहली बार हुआ कि किसी राजनीतिक दल ने सार्वजानिक रूप से इस डेरा सच्चा सौदे से मदद मांगी और दुष्कर्मी और हत्या के आरोपी इस आधुनिक बाबा ने उतने ही सार्वजनिक रूप से मदद का ऐलान भी किया। इसके बाद पार्टी के एक केंद्रीय नेता के साथ ४४ पार्टी प्रत्याशी बाबा के यहां मदद की औपचारिक याचना के लिए गए। जीतने वाले ४४ प्रत्याशियों में १९ बाबा की मदद के बगैर शायद न जीत पाते। लिहाजा ये सभी सार्वजानिक रूप से बाबा के यहां सजदा करने जाने लगे। इनमें पार्टी के राज्य इकाई के अध्यक्ष भी शामिल हैं। सत्ता में आने के बाद मंत्रियों में होड़ मच गई कि इस आधुनिक बाबा को कौन कितना ज्यादा अनुदान दे सकता है। इसकी परिणति मंत्री के इस बयान से हुई कि बाबा के अनुयाइयों पर धारा १४४ लागू ही नहीं होती। जाहिर है यह दफा निष्प्रभावी रही और हजारों लोग (अनुयाई) पंचकूला में हिंसा का तांडव करने में सफल रहे। उन्हें मालूम था बाबा के हाथ लंबे हैं। देश के३६ वीआइपी लोगों में राम रहीम भी शामिल है जिसे च्जेडज् कैटेगरी की सुरक्षा हमारे-आपके पैसों से दी गई थी।
बाबा जब अपनी गुफा में किसी च्साध्वीज् से दुष्कर्म करता था और वह विरोध करती थी तो बाबा अपने प्रभाव से डराता था। यह बात उस साध्वी ने अदालत को बताई। जाहिर है अगर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री बाबा के यहां जाकर मत्था टेकेंगे तो उस बाबा को यह बात बताने की जरूरत भी नहीं है। राज्य और जिले का प्रशासन घास खाए नहीं बैठा रहता है। उसे मालूम होता है कि नए माहौल में कानून के नहीं बाबा के हाथ लंबे हैं और उन हाथों की पहुंच ऊपर तक है। आरोप लगाने की हिम्मत करने वाली वह साध्वी क्यों नहीं समझ पाई इस बात को जो बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस ही नहीं, बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री सरकार बदलने के २४ घंटों में ही समझ गए? शायद उस साध्वी को वह च्ज्ञानज् नहीं था जो अन्यों को था। लिहाजा उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और हाईकोर्ट को एक गुमनाम चिट्ठी लिख कर बाबा द्वारा दुष्कर्म की बात बताई। हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया और पहले जिला जज से जांच कराई जिसमें बाबा की इन हरकतों की तरफ काफी संकेत थे। हाईकोर्ट ने उस रिपोर्ट के बाद सीबीआई जांच के आदेश दिए, लेकिन कांग्रेस और इनेलो की सरकार के समय अगले पांच साल यानी २००७ तक सीबीआई को केस की जांच करने से रोके रखा गया। अदालत का फिर दबाव आया और तब सीबीआई के जिस अधिकारी को यह केस दिया गया उनका कहना है कि जैसे ही उन्हें केस सौंपा गया एक अधिकारी मेरे पास आ कर बोले च्यह केस तुम्हें इसलिए दिया जा रहा कि तुम क्लोजर रिपोर्ट लगा दो।ज् अर्थात बाबा को क्लीनचिट दे दो। यही दबाव कई राजनेताओं की तरफ से भी आया। अधिकारी ईमानदार था, लिहाजा उसने अगले दो सालों में जबर्दस्त छानबीन करके इस केस को अंजाम तक पहुंचाया। इस बीच बाबा पर इस बात का भी मुकदमा चलने लगा कि उसके गुर्गों ने अपने मैनेजर को, जो मुख्य गवाह था,
मरवा दिया है।
बाबा के दुष्कर्म की शिकार दो आरोपी महिला भक्तों ने अदालत में अपने बयान में कहा कि च्बाबा की गुफाज् की खुफिया दुनिया में औरतें ही सुरक्षा गार्ड होती हैं और बाबा के दुष्कर्म को उस दुनिया में च्पिताजी की माफीज् कही जाती है। भुक्तभोगी साध्वी के साथ तीन दिन च्पिताजी की माफीज् चलती रही और चलते-चलते बाबा ने अपने प्रभाव की धमकी भी दी और साथ ही अपने को भगवान बताया। बाद में इस ५० वर्षीय आधुनिक जीवन और फिल्म बनाने के शौकीन बाबा ने अदालत में आरोप को निराधार बताते हुए कहा कि वह नपुंसक है। हालांकि वह शादीशुदा है और उसकी दो बेटियां हैं। आखिर ऐसे बाबा के सामने राजनेता क्यों शरणागत हुए?
डेरा सच्चा सौदा की वेबसाइट पर इस संगठन को च्आध्यात्मिकज् बताया गया है। क्या खट्टर सरकार भी इस संगठन को आध्यात्मिक ही मान बैठी थी? ऐसे सवालों का जवाब नहीं मिलने वाला, लेकिन यह साफ है कि खट्टर सरकार की एक और शर्मनाक नाकामी ने केंद्र सरकार के साथ पूरी पार्टी की छवि पर बहुत बुरा असर डाला है। अगर भाजपा अब भी चेतती नहीं तो उसे बुरे परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। आखिर खट्टर सरकार की एक और नाकामी के बाद भी भाजपा की ओर से यह कहने का क्या मतलब कि वे अपने पद पर बने रहेंगे? क्या पार्टी को लोकलाज की परवाह नहीं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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