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न सीबीआई जांच हो रही न एसआईटी में दम

देहरादून। केंद्र की मोदी सरकार पर अब आंच आने लगी है। उसकी भ्रष्टाचार को लेकर जीरो सहनशीलता सिर्फ कोरा दावा नजर आने लगा है। छोटे-मोटे मामलों में कई बार आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों पर सीबीआई जांच और छापे डलवाने वाली केंद्र सरकार जिस तरह अरबों रुपये के एनएच-74 घोटाले को दफन करने में जुटी है, उससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्र के साथ ही राज्य में भी सरकार चला रही बीजेपी की मंशा पर नकारात्मक तरीके से ऊंगली उठाती है। जिस घोटाले को लेकर प्रदेश उबला हुआ हो और खुद राज्य सरकार भी चाहती हो कि सीबीआई जांच हो, उसको आखिर दबाने के पीछे केंद्र सरकार की कोई तो मंशा रही होगी। ऐसी राय अब उभर कर सामने आ रही है। इसका नुकसान मोदी और बीजेपी दोनों की छवि और प्रतिष्ठा को हो रहा है। सीबीआई जांच होने तक राज्य सरकार ने दो जांच अपने स्तर पर कराई। पहली जांच कुमायूं के आयुक्त रहने के दौरान सेंथिल पांडियन से कराई। उन्होंने जांच में पूरा घोटाला अपने स्तर पर उधेड़ कर साबित कर दिया कि इसमें बहुत बड़ा खेल हुआ है और बड़ी साजिश छिपी है। इसकी जांच किसी एजेंसी से कराया जाना उचित होगा। उनको हालांकि, सरकार ने रिपोर्ट सामने आने के बाद आयुक्त की कुर्सी से अचंभित करने वाले तरीके से हटा दिया, लेकिन विशेष जांच दल का गठन भी कर दिया। साथ ही सीबीआई से जांच की सिफारिश भी केंद्र सरकार को कर दी। इसके बावजूद कई लोगों को लग रहा है कि सरकार इस घोटाले का खुलासा करने के लिए बहुत उत्सुक नहीं है। इसकी वजह है जांच दल में भूमि से जुड़े विशेषज्ञों का न होना। हैरान करने वाली बात यह है कि जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उसमें पीसीएस अफसर डीपी सिंह की भूमिका सरकार का पैसा बचाने वाले के तौर पर सामने आई है। यह बात अलग है कि निलंबित छह डिप्टी कलेक्टरों में वह भी शामिल हैं। हो सकता है कि उनकी नकारात्मक छवि इस मामले में उनके खिलाफ चली गई।

तकरीबन 500 करोड़ रुपये से जुड़ा यह मामला इतना बड़ा घोटाला साबित हो सकता है कि इसमें कुछ आईएएस ही नहीं बल्कि ऐसे राजनेता भी फंस सकते हैं जिनमें कुछ आज सरकार में बड़ी कुर्सियों पर हैं। जांच सही तरीके से तभी हो सकती है जब कम से कम सीबीआई इसकी जांच को अपने हाथों में ले। राज्य सरकार की विशेष जांच दल, जिसकी कमान पुलिस उपाधीक्षक के हाथों में है, से उम्मीद नहीं की जा रही है कि वह शक के दायरे में आने वाले नौकरशाहों और शक्तिशाली राजनेताओं से पूछताछ और जांच करने की हिम्मत भी जुटा सके। हकीकत तो यह है कि जांच दल पर आरोप लगने लगे हैं। उस पर ऊंगली उठ रही है कि जांच के नाम पर वह किसानों का उत्पीडऩ कर रही है। अभी तक उसने राष्ट्रीय राजमार्ग के अफसरों से पूछताछ करीने से नहीं की है। शक जताया जा रहा है कि इस घोटाले में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अफसरों और उनसे भी ऊपर के लोगों का हाथ हो सकता है। यह घोटाला कृषि भूमि को अकृषि दर्शा कर अरबों रुपये बतौर मुआवजा लुटा डालने में जुटा है।
प्राधिकरण के खुर्राट और अनुभवी अफसरों को यह खेल पता ही नहीं चल रहा था, ऐसा सोचना या उनकी ऐसी सफाई को मानना सिर्फ मजाक हो सकता है। मुआवजा राशि प्राधिकरण को ही देना था। प्राधिकरण जब तक खुद संतुष्ट नहीं हो जाता, मुआवजा बांटा नहीं जा सकता है अगर किसी अफसर ने मुआवजा राशि खेल कर बढ़ा डाली थी तो क्या एक भी मामले में प्राधिकरण के अफसरों को शक नहीं हुआ? क्यों नहीं वे आर्बिट्रेशन में नहीं गए? पूरा खेल मिलीभगत का है। यह साफ दिखता है। अपनी जान और जेल जाने से बचने के लिए अब भले वे कुछ भी कहते फिरें। अगर सीबीआई जांच हो जाए तो प्राधिकरण के अफसरों पर आंच आना स्वाभाविक है। सीबीआई जांच क्यों नहीं हो रही? इसको लेकर सबसे बड़ी दलील अंदरखाने यही दी जा रही है कि राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ऐसा नहीं चाहते हैं। जांच की सूरत में न सिर्फ उनके चहेतों पर आंच आ सकती है बल्कि उनके मंत्रालय और खुद उन पर भी दाग लग जाए तो अप्रत्याशित नहीं होगा। ऐसा हुआ तो सियासी तौर पर भी उनको भारी नुकसान पहुंच सकता है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण की सियासी डोर ऐसे ही भ्रष्टाचार के मामले में ऐसी टूटी थी कि फिर पतंग कट कर कहां गिरी पता भी नहीं चला। बीजेपी में अंदरूनी स्तर पर सियासत खूब है। ऐसे में गडकरी कभी नहीं चाहेंगे कि एनएच-74 घोटाले की सीबीआई जांच हो। सीबीआई जांच हो तो राज्य सरकार और प्राधिकरण के अफसरों और राजनेताओं की मिली जुली साजिश का यह घोटाला बेहतरीन उदाहरण साबित हो सकता है। राज्य सरकार ने अपने अफसरों को निलंबित तो किया, लेकिन प्राधिकरण ने तो यह भी नहीं किया। जिन पीसीएस अफसरों को सरकार ने निलंबित किया, उन पर भूमि धारा-143 के अंतर्गत कृषि भूमि को गैर कृषि घोषित करने के आरोप हैं। यह अधिकार सिर्फ बंदोबस्त अधिकारी/चकबंदी अधिकारी को होता है। वह कृषि और गैर कृषि भूमि को अन्य प्रयोजन या व्यावसायिक प्रयोजन के लिए भूमि की प्रकृति बदल सकता है। यह घोटाला उधमसिंह नगर से जुड़ा है। चौड़ीकरण प्रक्रिया में बाजपुर, गदरपुर और किच्छा के तहसील आए थे। इनमें कनौरी, कनौरा महेशपुरा, ताली, केलाखेड़ा, मुंडिया मनी, बिचपुरी, हरलालपुर, टांडा आजम, मडैयारत्ना, भावंगाला, किच्छा और बिग्वाड़ा में उप जिलाधिकारियों ने अधिकार न होने के बावजूद विधि विरुद्ध 143 के अंतर्गत कार्रवाई की। इसके चलते ही अरबों रूपये का घोटाला अस्तित्व में आया। आज भी ऐसे कई उप जिलाधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है, जिनके दामन में घोटाले के दाग लगे हैं।
अब यह आरोप भी लगने लगा लगा है कि जिन किसानों को मुआवजा मिला,अब उनसे जांच में फंसाने या फंसने से बचाने के नाम पर वसूली की कोशिश की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक किसानों और लाभार्थियों को डराया जा रहा है कि उनको जेल भेजा जा सकता है, जिन लोगों की जमीन का मुआवजा सही मिला है, उनको भी प्रताडि़त करने की बात सामने आ रही है। यह हालत देखकर आगे किसान इस परियोजना के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। ऐसा हुआ तो परियोजना अधूरी भी रह जाने की आशंका है। इतना ही नहीं जांच दल से भी एकदम सही रिपोर्ट मिलने और सही जांच होने की उम्मीद कम है। इसकी एक वजह यह है कि जमीन एक उलझा हुआ विषय होता है। जांच दल में इसके विशेषज्ञ ही नहीं हैं। यह जानकारी अधूरी होने का नतीजा है कि जांच दल विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी के 3जी में पारित और उप जिलाधिकारी के धारा-143 में पारित मुआवजा निर्धारित फैसले की भी जांच कर रहा है। एक आईएएस अफसर के अनुसार यह फैसले क्वासी जुडिशियल आदेश हैं। ऐसे मामलों में संबंधित अफसर के खिलाफ आपराधिक मामलों में कार्रवाई नहीं की जा सकती है। इन अफसरों के आदेश के खिलाफ सक्षम न्यायालय में अपील की जा सकती थी। ऐसे में उनके खिलाफ एफआईआर नहीं हो सकती थी। ऐसे तो भविष्य में कोई अफसर फैसला देने के बजाय उसको लटकाने में ज्यादा रूचि लेगा। सरकार को इसके बजाय विधिक आयोग का गठन करना चाहिए। बहरहाल, लोगों को इन्तजार है कि केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ वाकई जंग लड़ रही है तो कब तक इस घोटाले की सीबीआई जांच कराती है। राज्य सरकार इसकी सिफारिश करने के साथ ही रिमाइंडर भी भेज चुकी है। अब ऐसा लग रहा है कि राज्य सरकार भी इस मामले में ज्यादा उत्साहित नहीं दिखना चाहती है। इसके पीछे कारण जो भी हो।
डीपी ने बचाए 200 करोड़
देहरादून। एनएच-74 भूमि घोटाले में मुअत्तल डीपी सिंह प्रदेश के चर्चित पीसीएस अफसरों में शुमार हैं। अगर उनको सबसे चर्चित कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। कई तरह के निजी मामलों में चर्चाओं और विवादों में रहने के बाद उनको पिछली कांग्रेस सरकार ने उधम सिंह नगर में तैनाती दी थी। वहां उनको विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी बनाया गया था। जब घोटाला सामने आया तो सिंह भी बाकी पांच अन्य पीसीएस अफसरों के साथ निपटा दिए गए। इस मामले में दस्तावेजी परीक्षण हुआ तो ताजुब करने वाला तथ्य सामने आ रहा है। सूत्रों के अनुसार इन दस्तावेजों के मुताबिक सिंह की भूमिका ऐसे अफसर के तौर पर रही, जिन्होंने भूमि की प्रकृति संबंधी मामलों से जुड़ी कई फाइलें न सिर्फ लौटा दी बल्कि उनको पूरी तरह रिजेक्ट भी कर दिया था और यह मामले छोटे-मोटे नहीं थे। पूरा हिसाब लगाया जाए तो यह 200 करोड़ रुपये से ज्यादा के मामले हैं अगर इन फाइलों को मंजूरी दे दी जाती तो इतना पैसा घोटाले की भेंट और चढ़ जाता। यह बात अलग है कि इस पहलू पर शायद अभी सरकार और जांच दल की निगाह पड़ी नहीं है। समझा जा रहा है कि डीपी सिर्फ अपनी नकारात्मक छवि और सरकार में बैठे कुछ लोगों की आंख का कांटा हैं। इसके चलते उनको नुकसान झेलना पड़ रहा है। ऐसे कई दस्तावेज वीकैंड टाइम्स के पास भी हैं।

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