You Are Here: Home » Front Page » कहानी खत्म या अभी बाकी

कहानी खत्म या अभी बाकी

देहरादून। बहुत उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल करेंगे तो उत्तराखंड को वाजिब तरजीह और जगह देंगे। पार्टी में कम से कम तीन नाम ऐसे थे, जिनकी आंखों में शायद कुछ दिन पहले से नींद उड़ी हुई थी। इनमें दो नाम भगत सिंह कोश्यारी और मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के थे, जिनमें एक वृद्ध तो दूजे को वृद्ध की श्रेणी में शामिल किया जाता है, लेकिन तीसरा नाम ऐसा था, जिसके साथ अनुभव के साथ ही उम्र भी थी। डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक। जब शपथ ग्रहण समारोह के लिए चंद घंटे रह गए तो साफ हो गया कि उत्तराखंड को सिर्फ तकरीबन बिना मंत्रालय सरीखे चल रहे राज्य मंत्री अजय टम्टा से ही संतुष्ट होना पड़ेगा। उत्तराखंड को केंद्र सरकार में वाजिब और सम्मानजनक जगह नहीं मिली, यह बात अलग है। अहम बात यह है कि मंत्रिमंडल फेरबदल में कोश्यारी, खंडूड़ी की एक बार फिर उपेक्षा क्या यह संकेत है कि दोनों दिग्गज, जिनकी निजी छवि और प्रतिष्ठा बहुत अच्छी है, सियासत में अपनी आखिरी पारी खेल चुके हैं? और अगर नहीं खेले हैं तो फिर उनका सियासत में बने रहने का क्या फायदा राज्य और संसदीय क्षेत्र की जनता को होना है, जब वे मंत्री के लायक नहीं रह गए हैं।

एक नाम और है राज्य के पांच सांसदों में। श्रीमती माला राज्यलक्ष्मी, जो पूर्व टिहरी रियासत के महाराजा की पत्नी हैं, लेकिन उनका भी सफर लगता है कि भविष्य में भी सांसद से आगे शायद ही बढ़ेगा। उनकी न सिर्फ पूरी तरह अनदेखी की गई, बल्कि उनको मंत्री परिषद या मंत्री मंडल में शुमार किए जाने के लिए कभी गंभीर दावेदार नहीं माना जाता है। आगे भी यही स्थिति रहेगी, यह तय सी दिख रही है। अलबत्ता, उनको टिकट न देने का जोखिम लेने की सूरत में बीजेपी नहीं है। टिहरी रियासत का टिहरी लोकसभा सीट पर जबरदस्त असर है और महाराजा को भगवान का दर्जा हासिल होने की वजह से उनके वोटों की गिनती एक लाख से शुरू होती है, ऐसा समीक्षक और लोग मानते हैं। अब यह गिनती कितने से शुरू होती है, यह तो कोई नहीं जानता है लेकिन यह सभी मानते हैं कि टिहरी रियासत से जुड़े लोगों का तगड़ा निजी वोट बैंक है। बात कोश्यारी और खंडूड़ी को लेकर हो रही है। कोश्यारी को उत्तराखंड का सबसे बड़ा भाजपाई जन नेता कहा जाए तो गलत नहीं होगा। उनकी सादगी, साफगोई और आम आदमी से जुड़ी राजनीति करने के अंदाज के सभी कायल हैं।
वह मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक रहे लेकिन उनके खाते में साल 2002 के विधानसभा चुनाव की हार है। जो न सिर्फ बेहद अप्रत्याशित थी, बल्कि उनके कट्टर विरोधियों के लिए आज तक ऑक्सीजन का काम करती रही है। बीजेपी ने तब उत्तराखंड राज्य बना कर दिया ही था और यह राज्य का पहला विधानसभा चुनाव था। खुद कांग्रेस और सभी मान कर चल रहे थे कि यह चुनाव तो बिना किसी संघर्ष या चुनौती के बीजेपी के नाम रहेगा। उनको पांच साल बाद होने वाले चुनाव की तैयारी करनी होगी। उस चुनाव में शून्य में पहुंची कांग्रेस ने बीजेपी को पटखनी दे दी थी। तभी से कोश्यारी का सियासी ग्राफ ऐसा गिरा कि लगातार कोशिशों के बावजूद उठने को राजी नहीं है। बीच में उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की कोशिश खूब की, लेकिन खंडूड़ी,निशंक और बाद में अपने ही शिष्य त्रिवेंद्र सिंह रावत (मौजूदा मुख्यमंत्री) से वह पार नहीं पा पाए। इसके बाद उनकी उम्मीद केंद्र में मंत्री बनने की दिख रही थी। पहले तो 75 साल के करीब बता कर पार्टी नेतृत्व ने उनकी राह नामुमकिन सी कर दी थी। फिर जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि उम्र की कोई सीमा मंत्री बनने के लिए नहीं है तो कोश्यारी और खंडूड़ी दोनों की उम्मीदों के दिए जल उठे थे। यह विडंबना है कि दोनों में से किसी को एक बार फिर से मंत्री मंडल के करीब फटकने तक नहीं दिया गया।
खंडूड़ी अब 85 के करीब हैं और कोश्यारी 75 के। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या दोनों के लिए सियासत में बने रहने के अब कोई मायने रह भी गए हैं या नहीं। मुख्यमंत्री या केंद्र में मंत्री बनाया ही नहीं जाना है तो फिर आखिर उनके इलाके के लोग भला क्यों अगले चुनाव में उनको वोट करेंगे। यह तस्वीर राज्य के लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं को नहीं भा रही है। कहां तो डबल इंजन की बात मोदी कर गए थे और कहां पूरा इंजन भी देने को तैयार नहीं दिख रहे अब प्रधानमंत्री। हो सकता है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में एक बार फिर दोनों उपेक्षितों को टिकट देने के लिए पार्टी राजी हो जाए क्योंकि दोनों में सीट निकालने की नायाब क्षमता है। खंडूड़ी जब मुख्यमंत्री थे तो उनके सचिव प्रभात कुमार सारंगी सबके निशाने पर रहते थे और खुद खंडूड़ी पर इसके चलते कई आरोप लगे, इसके बावजूद इसमें शक नहीं कि खंडूड़ी को सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री अब तक का कहा जाता है। भले उनके राज में भी घपले और घोटालों का अम्बार लगा था। आस लगाने में कोई हर्ज नहीं है और इसके चलते एक बार फिर वे यह टकटकी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की कुर्सी पर लगाए बैठ सकते हैं कि हो सकता है लोकसभा चुनाव, जो पौने दो साल बाद होने हैं से पहले एक और अंतिम फेरबदल हो। तब उसमें शायद मौका मिल जाए।
अगर कुछ महीने बाद बीजेपी नेतृत्व और मोदी महसूस करेंगे कि जिस उत्तराखंड में उनके पास सौ फीसदी सीटें हैं वहां अगले लोकसभा चुनाव में इस बार हालात बदले हुए हो सकते हैं तो हो सकता है कोश्यारी, खंडूड़ी और निशंक में से किसी को मंत्रिमंडल में सीट मिल जाए। भले कुछ ही अरसे के लिए। कोश्यारी और खंडूड़ी का भले ही सियासी कैरियर समाप्ति पर माना जा रहा हो, लेकिन निशंक का ऐसा नहीं है। वह एकदम चतुर और स्मार्ट हैं। अभी वह खामोश बैठे हैं तो सिर्फ इसलिए कि मौजूदा हालात में यही सबसे बेहतर तरीका है, हाई कमान को किसी तरह अपने प्रति आकृष्ट करने के लिए। इस वक्त ज्यादा दौड़-धूप और तीन-पांच करने वालों की सियासी जिंदगी को पार्टी नेतृत्व नौ-दो ग्यारह कर दे रही है। निशंक जानते हैं कि केन्द्रीय नेतृत्व का विश्वास जीत लिया तो फिर रास्ता उनके लिए आसान है। उनके दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी कोश्यारी और खंडूड़ी अगले लोकसभा चुनाव तक अपना भविष्य जान चुके होंगे, जो समाप्ति की ओर है। त्रिवेंद्र और राज्य में कैबिनेट मंत्री प्रकाश पन्त ही उनके असली प्रतिद्वंद्वी रह जाएंगे यानि लड़ाई काफी हद तक सिकुड़ जायेगी और आसान हो जाएगी। वैसे आज की तारीख में त्रिवेंद्र को हिला पाने की ताकत अच्छे-अच्छों में नहीं दिखती है। उनके पास मोदी, शाह और संघ त्रिमूर्ति का आशीर्वाद है। उनको बीच में मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने की गुंजाइश भी नहीं दिखती है। ऐसा होता है तो यह तीनों की हार होगी। तीनों की पसंद हैं त्रिवेंद्र। जिस तरह उत्तर प्रदेश में शुरू में टॉप गेयर में भाग रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अब फ्लॉप और फेल कहना शुरू हो गया है, उस तरह के शब्द त्रिवेंद्र के लिए इस्तेमाल नहीं हो रहे हैं। उनको सरकार चलाने में बेहद सतर्क और धीमा ही कहा जा रहा है। फेल नहीं। कुछ नियुक्तियों और तबादलों को लेकर जरूर उन पर निशाना लग रहा है। उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी को इन सब चीजों से कोई खतरा नहीं है। ऐसे में त्रिवेंद्र फिलहाल तो राज्य की राजनीति में ही रहेंगे। निशंक के पास अगले विधानसभा चुनाव और पौने दो साल बाद होने वाले लोक सभा चुनाव के बाद ही सियासी जिंदगी का अंदाज लेने का अवसर रहेगा। उनके लिए संतोष की बात यह है कि वह राज्य और केंद्र की सियासत की दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं और उम्र हमसफर है।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.