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त्रिवेंद्र की बल्ले-बल्ले

से यह सब अविश्वसनीय सा था लेकिन अचानक चर्चाएं तेज होने लगी थीं कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के दिन पूरे भी हो सकते हैं। ऐसी अफवाह किस्म की कानाफूसियों को बीजेपी के ही असंतुष्ट किस्म के वे लोग हवा दे रहे थे, जिनकी दाल इन दिनों ढंग से नहीं गल रही या बिलकुल भी नहीं गल पा रही है। ऐसा नहीं कि उनको भीतर की हकीकत का पता न हो लेकिन यह भी सच है कि वे बदलाव की चर्चा को फूंकनी से हवा तो दे ही रहे थे। पत्रकारों को यह कहते हुए उकसाने में उनको असीम संतोष मिल रहा था कि और सरकार कैसी चल रही है? उनको यह सुनना ज्यादा अच्छा लगता है कि मीडिया से जुड़ा व्यक्ति सरकार की कमी और खामियां निकाले। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के देहरादून दौरे से पहले त्रिवेंद्र विरोधी गुट की कोशिशें न सिर्फ तेज हो गई थीं बल्कि उनको उम्मीद थी कि शाह कुछ ऐसा बोलकर चले जाएंगे, जिससे त्रिवेंद्र के लिए आने वाले दिनों में हालात कुछ दुरूह और चुनौती पूर्ण हो जाएंगे। शाह जो सियासत की दुनिया में उम्र के हिसाब से भले बहुत घिसे हुए नहीं हैं, लेकिन उनसे बड़ा सियासी उस्ताद देश में शायद आज कोई नहीं है। उन्होंने पूरी मीडिया और पार्टी के प्रमुख लोगों के सामने न सिर्फ घूम फिर कर पूछे गए नेतृत्व परिवर्तन सम्बन्धी सवाल को यह कहते हुए फीका कर दिया कि उत्तराखंड में स्थिर सरकार के लिए जनादेश मिला है, बल्कि त्रिवेंद्र की तारीफ भी लगे हाथों यह कहते हुए कर डाली कि सरकार सफल भी है और तेजी से कार्य कर रही है। इसके बाद अब त्रिवेंद्र विरोधियों के लिए खामोशी के साथ काम करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है।

त्रिवेंद्र पर दो आरोप प्रमुखता से लग रहे हैं। एक-नौकरशाही, खास कर विवादित नामों को तवज्जो, दूसरा कामकाज में सुस्ती। इसमें कोई शक नहीं है कि विवादित अफसरों की इस सरकार में न सिर्फ मौज चल रही है बल्कि उनको काफी ताकत भी दे दी गई हैं। वे इस कदर निरंकुश और बेलगाम हो चुके हैं की सत्ताधारी पार्टी के लोग ही बेहद नाखुश हैं। आईएएस जिन कुर्सियों पर बरसों की नौकरी के बाद बैठ पाते हैं, उनमें मास्टर को बिठा दिया जाना सबको अचंभित कर रहा है। अहम कुर्सियों पर बदनाम किस्म के लोगों को बिठाये जाने के कारण त्रिवेंद्र सरकार पर पार्टी के भीतर और बाहर से हमले बढ़ गए हैं। मुख्यमंत्री से पार्टी के लोग भी अगर नाराज चल रहे हैं तो उसकी एक और वजह है। मंत्री परिषद में दो कुर्सियां खाली हैं। उनको कब भरा जाएगा या फिर भरा भी जाएगा या नहीं, किसी को भनक तक नहीं लग रही है। इससे विधायकों में बेचैनी के साथ ही नाराजगी बढ़ी है। मुख्यमंत्री से जब भी इस बारे में पूछा गया, उन्होंने इससे जुड़े सवाल को एक किस्म से टाल दिया।
सरकार मजबूत होने और कार्यकर्ताओं की उम्मीदों का सागर हिलोरे मारने के बावजूद मुख्यमंत्री ने कभी भी सरकारी विभागों में उनको दायित्व देकर ऐश कराने की मंशा नहीं दिखाई। इससे सरकार का करोड़ों रुपये का गैर जरूरी खर्च जरूर बच रहा है लेकिन इससे पार्टी में कार्यकर्ता बेकरार भी दिख रहे हैं। वे जल्द से जल्द दायित्व चाहते हैं। दूसरी तरफ दबावों से बेपरवाह रहने वाले त्रिवेंद्र अपने ही अंदाज में काम करते रहे। यह देखते हुए पार्टी में कुछ लोगों को लगने लगा था कि शाह के देहरादून में दो दिन रुकने के दौरान कुछ ऐसा हो जाए, जिससे त्रिवेंद्र के लिए दिक्कत या परेशानी पैदा हो जाए। ऐसा कुछ नहीं हुआ। शाह ने साफ कहा-उत्तराखंड में स्थिर सरकार के लिए लोगों ने बीजेपी को वोट दिया है। बीजेपी स्थिर सरकार ही देगी। इससे पहले बीजेपी की सरकार में कोई भी मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है।
चाहे वह अंतरिम सरकार के नित्यानंद स्वामी (अब दिवंगत) हो या फिर बीसी खंडूड़ी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक। दोनों को बीच में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया गया था। पार्टी के रिकॉर्ड को देखते हुए ही त्रिवेंद्र विरोधियों को लगता था कि अगर शाह के सामने सरकार और त्रिवेंद्र की छवि पर प्रहार किया जाए तो उनकी उम्मीदों के दरवाजे खुल सकते हैं। देखा जाए तो शाह ने एकदम उल्टा किया। उन्होंने त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज की भरपूर तारीफ तो की ही, साथ ही पार्टी के अन्य सूरमाओं को बिलकुल भी गैर जरूरी तवज्जो नहीं दी। जो लोग खुद को पार्टी में मजबूत खूंटा मान कर चल रहे थे, उनको शाह ने सीधी दिशा में चलने की चेतावनी दी और संकेत दिए। पार्टी के बहुत मजबूत पदाधिकारी संजय कुमार, जिनके पास प्रदेश महामंत्री (संगठन) का जिम्मा है, को भी उनकी झिडक़ी सबके सामने सुननी पड़ी। प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ही ऐसे रहे, जिनको मुख्यमंत्री के अलावा कुछ अहमियत देहरादून दौरे में शाह ने दी। बाकी मंत्रियों और सांसदों को उन्होंने किनारे ही रखा। कांग्रेस से आए विधायकों और मंत्रियों को भी उन्होंने भाव नहीं दिया। हालात ऐसे थे कि खंडूड़ी तो दूसरे दिन के कार्यक्रमों में नजर ही नहीं आए। बताया गया कि उन्होंने शाह से न आने के लिए माफी मांग ली थी। सच्चाई यह भी बताई जा रही कि जिस तरह उनको पहले दिन सभा स्थल (मधुबन होटल) में कुर्सी तक नहीं मिली, उससे उनका मन बहुत खिन्न था। शाह के साथ अगर कोई साए की तरह साथ था तो वह त्रिवेंद्र ही थे। वैसे त्रिवेंद्र को शाह की पसंद ही माना जाता है।
त्रिवेंद्र को इतनी जल्दी खारिज कर नेतृत्व परिवर्तन की बात करना सियासी समीक्षकों के भी गले नहीं उतर रहा है। उनका कहना है कि किसी सरकार या मुख्यमंत्री को काम करने के लिए कम से कम डेढ़-दो साल का वक्त तो दिया ही जाना चाहिए। तभी उसके कामकाज के बारे में टिप्पणी की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सवा तीन साल हो गए हैं, लेकिन उनसे लोग आज भी नतीजा नहीं मांग रहे हैं। ऐसे में त्रिवेंद्र के कार्यकाल का पोस्ट मार्टम इतनी जल्दी करना ज्यादती होगी। खास तौर पर यह देखते हुए कि त्रिवेंद्र सरकार को नाकाम नहीं बताया जा सकता है। उसको धीमा जरूर कहा जा सकता है, लेकिन यह किसी मुख्यमंत्री के कार्य करने की शैली का हिस्सा हो सकता है। बहरहाल, इतना कहा जा सकता है कि शाह का दौरा त्रिवेंद्र के लिए बहुत बढिय़ा रहा। उनका खूंटा फिलहाल तो वहां तक गड़ा लग रहा है,जहां से उसको खींच कर निकालना इतना आसान तो नहीं है।

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