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शर्मसार हुई महामना की बीएचयू

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखते समय पं. मदन मोहन मालवीय ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि उनके शिक्षा के मंदिर में छात्राएं अपनी आबरू बचाने के लिए गुहार लगाएंगी और बदले में उन्हें सुरक्षा न देकर उन पर लाठियां भांजी जायेगी। बीएचयू प्रशासन द्वारा छात्राओं के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया गया उससे बीएचयू की गरिमा कलंकित हुई है। देश-विदेश में अपनी अच्छी पढ़ाई-लिखाई और अच्छे वातावरण के लिए विख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पिछले दिनों छात्राओं पर लाठी चार्ज की वजह से सुर्खियों में रहा। यह मामला इतना भी तूल न पकड़ता यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने दो दिवसीय बनारस प्रवास के दौरान इन बेटियों की समस्या सुन लेते। बेटियों की गुहार को न तो कुलपति ने सुना और प्रधानमंत्री मोदी ने। और तो और बेटियों की आवाज दबाने का काम किया गया। जिस शिक्षा के मंदिर में बेटियों को आगे बढऩे का गुर सिखाया जाता है, उसी मंदिर में उन पर लाठिया भांजी गई। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली भाजपा सरकार ने इन बेटियों की समस्या को गंभीरता से लिया होता तो आज महामना की बीएचयू शर्मसार न होती। इतिहास गवाह है बेटियां तभी सडक़ पर उतरी है जब पानी उनके सिर से ऊपर हुआ है।नारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखते समय पं. मदन मोहन मालवीय ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि उनके शिक्षा के मंदिर में छात्राएं अपनी आबरू बचाने के लिए गुहार लगाएंगी और बदले में उन्हें सुरक्षा न देकर उन पर लाठियां भांजी जायेगी। बीएचयू प्रशासन द्वारा छात्राओं के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया गया उससे बीएचयू की गरिमा कलंकित हुई है। देश-विदेश में अपनी अच्छी पढ़ाई-लिखाई और अच्छे वातावरण के लिए विख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पिछले दिनों छात्राओं पर लाठी चार्ज की वजह से सुर्खियों में रहा। यह मामला इतना भी तूल न पकड़ता यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने दो दिवसीय बनारस प्रवास के दौरान इन बेटियों की समस्या सुन लेते। बेटियों की गुहार को न तो कुलपति ने सुना और प्रधानमंत्री मोदी ने। और तो और बेटियों की आवाज दबाने का काम किया गया। जिस शिक्षा के मंदिर में बेटियों को आगे बढऩे का गुर सिखाया जाता है, उसी मंदिर में उन पर लाठिया भांजी गई। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली भाजपा सरकार ने इन बेटियों की समस्या को गंभीरता से लिया होता तो आज महामना की बीएचयू शर्मसार न होती। इतिहास गवाह है बेटियां तभी सडक़ पर उतरी है जब पानी उनके सिर से ऊपर हुआ है।
 …यदि बीएचयू की छात्राएं सडक़ पर उतरने को मजबूर हुईं तो इसमें गलती किसकी है। ऐसे हालात के लिए सवाल उठना लाजिमी है। छात्राओं की समस्या को बीएचयू प्रशासन ने महत्व दिया होता तो शायद यह दिन न देखना पड़ा होता। शिक्षा के मंदिर में छात्राओं के साथ घटिया हरकत न हो रही होती। बेटियों की इज्जत और सम्मान की रक्षा करने में बीएचयू प्रशासन नाकाम रहा तभी उन्हें सडक़ पर अपने हक और स्वाभिमान के लिए उतरना पड़ा। यह प्रशासन की नाकामी ही है कि मनचले लडक़ों पर लगाम न लगाकर छात्राओं के लिए तुगलकी फरमान जारी कर दिया कि वे शाम छह बजे के बाद हॉस्टल से बाहर न निकले। आज के समय में इस तरह का फरमान समझ से परे है। ऐसे नियम लड़कियों के लिए  गांव और कस्बों में बनाए जाते हैं कि देर शाम बाहर मत निकलो, माहौल सही नहीं है। वहां ऐसा करने का कारण भी है क्योंकि मौके पर पुलिस नहीं होती, लेकिन बीएचयू कैंपस में तो सिक्योरिटी का पूरा इंतजाम है। तो क्या सिक्योरिटी के नाक के नीचे बेटियों के साथ छेडख़ानी की जा रही थी। बेटियों ने बार-बार सुरक्षा गार्ड से लेकर प्रॉक्टोरियल को अपने साथ होने वाली छेडख़ानी के बारे में अवगत कराया लेकिन प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। आखिर कब तक वह अपनी आबरू के साथ ऐसे खिलवाड़ बर्दाश्त करतीं।बीएचयू की आग ने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक की  सरकार के माथे पर बल डाल दिया था। पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने योगी से बात कर इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा था। यदि समय रहते सरकार ने कदम उठा लिया होता तो इतनी किरकिरी न होती। अब इस मामले में सरकार कितना भी लीपापोती कर ले, लेकिन राजनीतिक रूप से जितना नुकसान होना था हो चुका है। बनारस में खुद पीएम मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दो दिन तक मौजूद रहे लेकिन उन्होंने इस मामले का संज्ञान नहीं लिया। यदि उसी समय इन लोगों ने संज्ञान ले लिया होता तो आज हालात कुछ और ही होते। सरकार की प्रतिष्ठïा तो बढ़ती ही साथ ही मामला रफा-दफा हो जाता। देश की बेटियों को भी अच्छा महसूस होता कि उनके पीएम को उनकी परवाह है। वह सिर्फ नारा ही नहीं देते बल्कि उन्हें वाकई उनकी चिंता है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। आज भले ही छात्राओं से हॉस्टल खाली कराकर उन्हें अलग-थलग कर दिया गया हो लेकिन उनके भीतर का आक्रोश इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाला है। भले ही वीसी को दिल्ली तलब कर लिया गया हो, उन्हें उनके पद से हटा दिया जाए लेकिन छात्राएं 23 सिंतबर की मनहूस रात ताउम्र नहीं भूलेंगी। शरीर से भले ही लाठी के निशान मिट जाए लेकिन उनके मन पर अपमान की जो अमिट छाप पड़ी है वह उन्हें कभी नहीं भूलेंगी। कई छात्राओं ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए ऐसी बातें कहीं हैं।  बनारस कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में बीएचयू प्रशासन को जिम्मेदार माना है। अब देखना होगा कि सरकार कौन सा कदम उठाकर इस घटना से हुए नुकसान की भरपाई करती है। सरकार कुछ फेरबदल कर इस नुकसान की भरपाई करने की कोशिश करेगी लेकिन यह तो तय है कि इसकी आंच दूर तलक जायेगी। सवाल बेटियों का है। उनके सम्मान से जुड़ा है। आधी आबादी की चुनाव में क्या भूमिका होती है यह राजनीतिक पार्टियां बखूबी जानती है। उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के बाद पीएम मोदी को इस बात का अंदाजा बखूबी होगा।

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