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क्या जनता की कीमत पर कमाया जा रहा है तेल से मुनाफा?

डीएमके नेता एम के स्टालिन ने रोज दाम बढ़ाने की व्यवस्था को वापस लेने की मांग की है। महाराष्ट्र में शिवसेना भी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन करने की योजना बना रही है। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से लेकर कई जगहों पर प्रदर्शन किए हैं। सरकार की तरफ से भी बयान आए हैं। केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री के जे आल्फोंस का बयान भी विचित्र किस्म का है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल खरीदने वाले भूखे तो नहीं मर रहे हैं। हम उन्हीं लोगों पर कर लगा रहे हैं जो कर अदा कर सकते हैं। जिनके पास कार है, बाइक है, निश्चित रूप से वह भूखे नहीं मर रहे हैं। जो चुका सकता है उसे चुकाना चाहिए। मंत्री जी का पैमाना बड़ा विचित्र है। कोई भूखे मर जाएगा तभी कहेंगे कि महंगाई है। उनके बयान से लग रहा है कि जो लोग भूखे मर रहे हैं उन्हें पेट्रोल सस्ता मिलेगा, जो नहीं मर रहे हैं उन्हें महंगा मिलेगा। उनका यह तर्क व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर चलाए जा रहे तर्कों से मेल खाता है जिसमें समझाया जा रहा है कि जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हैं। अगर ऐसा था तो वित्त मंत्री को बजट में ही इसकी घोषणा कर देनी चाहिए थी।

क्या अर्थशास्त्र की किताब से उस चैप्टर को हटा दिया गया है जिसमें पढ़ाया जाता था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढऩे से भारत या दुनिया के मुल्कों के घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं। आखिर पेट्रोल के दाम बढऩे पर अर्थशास्त्री से लेकर राजनेता तक क्यों चुप हैं। पेट्रोल के दाम इतने महंगे क्यों हैं, यह सवाल पूछो तो जवाब आता है कि विपक्ष कमजोर हो गया है, लेकिन पेट्रोल की कीमतों पर जवाब देने की जवाबदारी सरकार पर है या विपक्ष पर है। पेट्रोलियम और तेल मंत्रालय विपक्ष के पास है या सरकार के पास है। विपक्ष न भी हो तो भी क्या यह सवाल वाजिब नहीं है कि पेट्रोल के दाम 75 रुपये से लेकर 80 रुपये तक क्यों हो गए।
सितंबर 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमत 109.45 डॉलर प्रति बैरल थी। तब पेट्रोल के दाम दिल्ली में 76 रुपये 06 पैसे प्रति लीटर, कोलकाता में 83 रुपये 63 पैसे प्रति लीटर, मुंबई में 83 रुपये 62 पैसे हो गए थे। तब देश की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया था। सितंबर 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमत है 54.58 डॉलर प्रति बैरल। यानी सितंबर 2013 की तुलना में इस महीने 54.89 डॉलर प्रति बैरल सस्ता है। तो दिल्ली में 70 रुपये 58 पैसे, कोलकाता में 73 रुपये 25 पैसे, मुंबई में 79 रुपये 62 पैसे प्रति लीटर के भाव क्यों हैं। कच्चे तेल के दाम में पचास फीसदी से भी ज्यादा की कमी आ गई है मगर पेट्रोल के दाम में कमी क्यों नहीं आई है। मीडिया में महानगरों के तेल के दाम बताने का चलन है, लेकिन दूर दराज के शहरों के दाम देखेंगे तो दामों में काफी अंतर दिखेगा। जैसे 17 सितंबर के दिन महाराष्ट्र के 3 शहरों में पेट्रोल का रेट 81 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो गया था। मुंबई से भी ज्यादा महंगा, मुंबई में 79 रुपये 62 पैसे प्रति लीटर है। तीन ऐसे जिले हैं जहां पेट्रोल 81 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक है। ये तीनों जिले हैं परभणी – 81.31 प्रति लीटर, नांदेड़ में 81.19 प्रति लीटर, यवतमाल में 81.07 प्रति लीटर।
इसके अलावा 18 ऐसे जिले हैं जहां पेट्रोल के दाम 80 या 80 रुपये से अधिक हैं। गढ़चिरौली 80.88, जालना 80.80, अमरावती 80.75, औरंगाबाद 80.72, चांदगढ़, कोल्हापुर 80.66, नंदूरबार 80.64, रत्नागिरि 80।62, कुदाल, सिंधुदुर्ग 80.52, जलगांव 80.52, गोंदिया 80.47, अकोला 80.36, बीड़ 80.35, लातूर 80.32, अमरावती ओएमएल 80.28, सतारा 80.13, नाशिक 80.05, नागपुर 80.05, भंडारा 80.04।
इसी तरह हमने कुछ ऐसी जगहों की सूची बनाई जहां पेट्रोल के भाव 75 रुपये से अधिक हैं यानी दिल्ली से भी ज्यादा। मध्य प्रदेश के विदिशा में 77.43 प्रति लीटर है। भोपाल में 76.94 रुपये प्रति लीटर है। ग्वालियर में 76.84 रुपये प्रति लीटर, मुंगावली में 76 रुपये प्रति लीटर। यूपी के बरेली में 75.03 प्रति लीटर, बहराइच 75.19। बिहार के मोतीहारी 75.11 रुपये प्रति लीटर, बेतिया में 75.49 प्रति लीटर, मुजफ्फरपुर में 75.15 प्रति लीटर, दरभंगा 75.15 प्रति लीटर, हाजीपुर में 74.96 प्रति लीटर, गोपालगंज में 75.56 प्रति लीटर, जालंधर में 75.54 रुपये प्रति लीटर है, हल्द्वानी- 72.72 प्रति लीटर, देहरादून- 73.07 प्रति लीटर, पिथौरागढ़- 74.19 प्रति लीटर।
उड़ीसा में तेल की बढ़ती कीमतों के विरोध में बीजू जनता दल ने कुछ घंटे के बंद का आहवान किया था। मगर यहां ज्यादातर जगहों में पेट्रोल की कीमतें 70 रुपये से कम हैं। भुवनेश्वर 69.38 रुपये प्रति लीटर और कटक में 69.56 प्रति लीटर हैं। डीएमके नेता एम के स्टालिन ने रोज दाम बढ़ाने की व्यवस्था को वापस लेने की मांग की है। महाराष्ट्र में शिवसेना भी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन करने की योजना बना रही है। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से लेकर कई जगहों पर प्रदर्शन किए हैं। सरकार की तरफ से भी बयान आए हैं। केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री के जे आल्फोंस का बयान भी विचित्र किस्म का है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल खरीदने वाले भूखे तो नहीं मर रहे हैं। हम उन्हीं लोगों पर कर लगा रहे हैं जो कर अदा कर सकते हैं। जिनके पास कार है, बाइक है, निश्चित रूप से वह भूखे नहीं मर रहे हैं। जो चुका सकता है उसे चुकाना चाहिए।
मंत्री जी का पैमाना बड़ा विचित्र है। कोई भूखे मर जाएगा तभी कहेंगे कि महंगाई है। उनके बयान से लग रहा है कि जो लोग भूखे मर रहे हैं उन्हें पेट्रोल सस्ता मिलेगा, जो नहीं मर रहे हैं उन्हें महंगा मिलेगा। उनका यह तर्क व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर चलाए जा रहे तर्कों से मेल खाता है जिसमें समझाया जा रहा है कि जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हैं। अगर ऐसा था तो वित्त मंत्री को बजट में ही इसकी घोषणा कर देनी चाहिए थी। क्या परभणी के लोगों को मालूम है कि वे 81 रुपये 31 पैसे प्रति लीटर पेट्रोल खरीद कर देश की योजनाओं को सपोर्ट कर रहे हैं? हम पहले से कृषि कल्याण उपकर और स्वच्छ भारत उपकर दे ही तो रहे थे, ये कौन सा नया टैक्स है जो वसूला जा रहा है। डीजल के कारण किसानों पर क्या बीत रही है किसी किसान से पूछ लीजिए।
इसका असर जुताई, सिंचाई, कटाई और छंटनी पर पड़ रहा है। ज्यादातर जगहों में किसान खेती के लिए डीजल पर ही निर्भर होते हैं। करनाल के किसान ने बताया कि गेहूं की बुवाई के लिए ट्रैक्टर में बीजाई करने की मशीन लगी होती है जिसे केरा करना कहते हैं, उसका रेट बढ़ गया है। पिछले साल एक एकड़ के लिए 1000 रुपये था जो इस साल बढक़र 1400 रुपये हो गया। सिर्फ बुवाई की लागत में 400 रुपये की वृद्धि हो गई। पटियाला में किसान ने बताया कि इसी जून में धान की बुवाई के लिए पौने पांच बीघे की एक जुताई का रेट 1800 रुपये था, जो अब गेहूं के समय 2130 रुपये हो गई है। आप जानते हैं कि खेत को अच्छा बनाने के लिए तीन-तीन बार जोतना पड़ता है। इस तरह किसानों की लागत काफी बढ़ गई है। सिर्फ बुवाई और जुताई की नहीं, बल्कि धान की कटाई के लिए कंबाइन मशीन का किराया भी काफी बढ़ गया है। करनाल के किसान ने बताया कि पिछले साल एक एकड़ खेत में धान की कटाई के लिए कंबाइन हारवेस्टर ने 1000 रुपये लिये थे जो अब 2000 मांग रहा है। सरकार इस अनुपात में लागत मूल्य नहीं बढ़ाती है। बिहार के बगहा में किसानों ने बताया कि पहले एक बीघा खेत जोतने के लिए पांच सौ रुपये में ट्रैक्टर मिल जाता था जो इस साल 1000 मांग रहा है। सिर्फ जुताई में लागत डबल है। सोचिए किसानों पर क्या बीतेगी। आगरा के आलू किसान ने बताया कि डीजल के दाम बढऩे से ट्रक भाड़े में तीस से चालीस रुपये प्रति क्विंटल का अतिरिक्त भार पड़ गया है। इससे वे इतने ही घाटे में चले गए हैं क्योंकि आलू के रेट बढ़ नहीं रहे हैं। महाराष्ट्र तक भेजने का खर्चा, आढ़त का खर्चा और कोल्ड स्टोरेज का किराया अगर जोड़ ले तो यह आलू के भाव से ज्यादा हो जाता है। किसानों का कहना है कि पता ही नहीं चला कि दाम बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे मीठी छुरी हमारी गर्दन पर चलती रही। तकलीफ का यही पैमाना नहीं हो सकता कि लोग सडक़ पर नहीं उतरे हैं। आप किसानों की सोचिए। डीजल के कारण जो लागत बढ़ी है क्या उस अनुपात में एस एस पी बढ़ेगी। कभी नहीं। आम तौर पर एमएसपी 50 से 60 रुपये प्रति क्विंटल भी नहीं बढ़ती है मगर खेती की लागत में कई गुना वृद्धि हो गई जिसका असर कर्ज चुकाने की क्षमता पर भी पड़ेगा। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बयानों को भी देखिए, क्या पेट्रोल डीजल के दाम बढऩे के कारण संतोषजनक हैं।
मिंट अखबार में उनका बयान छपा है कि सरकार तेल कंपनियों के काम में दखल नहीं देती है, उपभोक्ताओं की आकांक्षा और विकास के साथ भी हमें संतुलन बनाकर चलना है। हाईवे, रोड, रेलवे, ग्रामीण स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पैसा देना है। इसलिए टैक्स में कटौती नहीं हो सकती है। अमरीका में आए इरमा और हार्वी तूफान के कारण रिफाइनिंग क्षमता में 13 प्रतिशत की कमी आई है, इसलिए भी दाम बढ़े हैं। भारत के ग्राहकों के हित में ये डायनेमिक सिस्टम पारदर्शी और भरोसे की व्यवस्था है। आने वाले दिनों में कीमत कम भी हो सकती है।
पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाने से दाम में कमी हो सकती है। पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया था कि राज्य सरकारों ने पेट्रो उत्पादों पर वैट बढ़ा दिया है इससे भी दाम बढ़े हैं। लेकिन हिन्दू अखबार के संवाददाता अनिल कुमार शास्त्री की रिपोर्ट बताती है कि केंद्र ने ज्यादा वसूली की है। 2014-15 की तुलना में 2016-17 में पेट्रो उत्पादों से होने वाली कमाई दुगनी हुई है। 1 लाख 72 हजार करोड़ से बढक़र 3 लाख 34 हजार करोड़ हो गई। साफ है कि सेंटर ने ज्यादा शुल्क बढ़ाए हैं। पेट्रोलियम उत्पादों से राज्यों को होने वाली आय में 29-30 हजार करोड़ की ही वृद्धि हुई है।

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