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झूठे वादे न करें नेता, जनता के बीच बढ़ाएं विश्वसनीयता: हृदय नारायण दीक्षित

एक शख्स क्या पत्रकार, लेखक, कवि, आंदोलनकारी, शानदार वक्ता के साथ ऐसा राजनेता भी हो सकता है कि देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का हर विधायक उसके लिए मन में बहुत आदर रखता हो। यह बहुत दुर्लभ है, मगर जब बात हृदय नारायण दीक्षित की हो रही हो तो यह दुर्लभ नहीं सच लगता है। यूपी की विधानसभा गौरवशाली है कि उसे हृदय नारायण दीक्षित के रूप में एक ऐसा जननायक मिला है जिसने गांव के आंदोलन के साथ-साथ एक ऐसी राजनीतिक सोच पैदा की जो वर्तमान परिवेश में दुर्लभ है। नहर का पानी सूख जाने पर नहर के बीच खड़े होकर आंदोलन करने, पुलिस की लाठियां खाने से लेकर विधानसभा अध्यक्ष बनने तक का उनका सफर शानदार रहा है। उनके लिखे हजारों लेख देश के सभी बड़े अखबारों में छप चुके हैं। उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। 4पीएम/वीकएंड टाइम्स/नया लक्ष्य के संपादक संजय शर्मा से उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर चर्चा की। पेश है उसके अंश:-

वर्तमान में आप उत्तर प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। लोगों के मन में एक सहज सवाल आता है कि अब तक आपका पूरा जीवन लिखने, पढऩे और सामाजिक मुद्दों पर बोलने में लगा रहा। अभी आपकी जो जिम्मेदारी है बहुत महत्वपूर्ण है, अलग है। आपका मन नहीं करता कि आप फिर उसी दुनिया में लौट जाएं, जहां आप खुलकर बोल सकें, लिख सकें।
अखबारों में लेख और अखबारों के बाहर पुस्तकें लिखने के कारण ज्यादातर लोगों तक हमारा लिखना पढऩा और पत्रकारिता पहुंची है, लेकिन उसके पहले मैं लगातार महीने में कम से कम 7 या 8 जुलूस, आंदोलन, प्रदर्शन, धरना करता था। उन्नाव जिला मुख्य रूप से हमारा कार्यक्षेत्र रहा और उसमें भी मुख्य रूप से पूरवा तहसील। तो वह भाग आंदोलन का, संघर्षों का बहुत बड़ा रहा। जैसे मेरे 4-5 हजार आलेख छप चुके हैं। 25-26 पुस्तकें हैं। वैसे ही सैकड़ों आंदोलन हंै जहां पर ऐसे मौके भी आए हैं जहां 15 दिन तक लगातार हजारों लोगों को साथ लेकर मैं तहसील में जमीन पर सोता रहा। एक पक्ष जनसंगठन का, जन आंदोलन का, जन संघर्ष का, आम जनता के बीच जाने का और विशेष रूप से कमजोर वर्ग के बीच जाने का। अनेक प्रदर्शन ऐसे हुए हंै जिसमें शेड्यूल कास्ट से दस हजार, पंद्रह हजार, 20 हजार लोग इकट्ठा हुए हैं हमारे नेतृत्व में। एक पक्ष वो रहा और उसी पक्ष के सामांतर लिखने-पढऩे का भी रहा। आप देखते होंगे हमारे यहां भीड़ बहुत आती है। अगर मैं केवल पत्रकारिता और लेखन से ही जुड़ा होता तो हमारे पास केवल प्रतिष्ठित विद्वान और पढ़े-लिखे लोगों की संख्या ज्यादा होती। हमारा जो मूल जीवन है वो गरीबों के साथ आंदोलन करने में रहा हैं।

कोई यादगार आंदोलन, जो आपको आज भी रोमांंिचत करता है?
ऐसे तो बहुत सारे आंदोलन हंै जो आज भी जेहन में सुरक्षित हैं। लेकिन सिंचाई को लेकर हम लोगों ने एक आंदोलन किया था, वह भी नहर में खड़े होकर। नहर सूखी थी। हम लोगों ने उसी नहर में एक दिन का धरना दिया था।

यह किस सन की बात है और इसका नतीजा क्या निकला?
यह 1986-87 की बात है। उसके पहले पुलिस अत्याचार को लेकर सारे जो पूरवा तहसील के चार-पांच थाने हैं, वहां भी हम लोगों ने धरना दिया। एक-एक जगह मैं सोया हूं, बाकी जगह हमारे समर्थक। ऐसे अनेक आंदोलन हुए, तमाम बार जेल भी जाना हुआ उन आंदोलनों में। 1975 की इमरजेंसी में लंबा जेल जाना पड़ा, उसमें हमारे अधिकांश नेता जेल गए। उसके अलावा भी तमाम आंदोलन हुए। एक और वाकया है। उन्नाव जिले में असोहा थाना है। वहां थाने की बाउंड्री को पुलिस ने जबरदस्ती बढ़ा लिया था। उसको लेकर भी आंदोलन हुआ। उसमें कुछ शेड्यूल कास्ट के लोग भी थे। तहसीलदार ने कहा कि पुलिस वालों ने बाउन्ड्री बढ़ा ली है तो कैसे क्या होगा? मैंने कहा- बढ़ाया है तो बाउन्ड्री गिरेगी। 10 हजार आदमी लेकर हम लोग गये। वह नहीं माने तो यह आंदोलन आठ दिन तक चलता रहा। फिर बाउन्ड्री पुलिस ने स्वयं तोड़ी और इस तरह से खेत खाली हुआ।

एक दौर वो था आंदोलन का, एक दौर अब का है। आपकी भूमिका बहुत बड़ी हो गई है। पूरी जिंदगी आपकी संघर्षों से भरी पड़ी थी। कहीं न कहीं आपको लगता होगा कि अब आप दूसरी भूमिका में आ गए हैं। क्या उसकी याद आपको आती है। क्या फिर वो सब करने का मन करता है?
देखिए, आंदोलन तो अभी तक चल ही रहा था, मतलब एमएलए रहने तक। मैं चार बार एमएलए रहा हूं। एक बार बीच में चुनाव हार गया तो पार्टी नेतृत्व ने मुझे उत्तर प्रदेश विधान परिषद भेज दिया। 2010 से 2017 जुलाई तक मैं विधान परिषद में रहा। विधान परिषद में भाजपा दल का नेता होने के बावजूद मैं उन्नाव में धरना देता था। कहीं-कहीं तो ऐसी स्थिति होती थी कि गद्दा नहीं, दरी पर ही दिन-दिन का धरना हो जाता था। कभी-कभी टाइम बढ़ा दिया जाता था। एक काम जो अभी नया हुआ, ये वाकया मैं कहीं लिख नहीं पाया। दरअसल जो गांव के ग्रामीण युवक थे वह एफआईआर कैसे लिखी जायेगी, यह नहीं जानते थे। सामान्य कानूनों से कैसे लाभ उठाया जाए वह यह बात नहीं जानते थे। राजनीतिक दलों के क्या उद्देश्य हैं, गांव के आम लोग नहीं जानते थे। मैंने अपनी टीम के साथ उनके प्रशिक्षण की योजना बनाई। इसके लिए नदी किनारे स्थित क्षेत्र का चयन किया जाता था। प्राइमरी विद्यालय में शनिवार की शाम को सबको बुलाया जाता था। उनके खाने-पीने की व्यवस्था गांव के ही लोग करते थे। उस क्लास में लोगों को एफआईआर से लेकर कानून और राजनीतिक दलों के उद्देश्य बताये जाते थे। जिस विषय पर क्लास होती उससे जुड़े वक्ता बुलाए जाते थे। अंतिम क्लास मेरी होती थी, जहां युवक बिना झिझक किसी भी मुद्दे पर सवाल पूछते थे। पत्रकारिता से लेकर मनोरंजन जगत के सवाल पूछे जाते थे।

इतना लंबा अनुभव हो गया आपका विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए। एक-एक विधायक को आप जान गये हैं। ये जो शार्टकट तरीका राजनीति में आया, मूल आदमी तक जाना नहीं, लोकतांत्रिक बात नहीं करना, शार्टकट तरीके से राजनीति करना। पहले वाली परंपरा राजनीति में दोबारा कैसे आयेगी। मैं देखता हूं विधायकों को आप लगातार समझाते रहते हैं।
राजनीति का जो मूल काम है, जनता का लोक शिक्षण करना। पार्टी के प्रति, जिस पार्टी में हैं, संविधान के प्रति जो हमारा सबका है, जो प्रशासन है उसके प्रति, तो लगातार लोक शिक्षण होता रहे। आपको याद होगा कि डॉक्टर लोहिया के समय सोशलिस्ट पार्टी स्टडी सर्किल चलाती थी। पार्टी से जुड़े लडक़े आते थे और उन्हें पढ़ाया जाता था। समाजवाद क्या है माक्र्सवाद क्या है, लेनिन वाद क्या है, विचारधाराओं का टकराव कैसे होता है। भारतीय जनसंघ के समय में भी हमारे यहां क्लास चलती थी, हमारे यहांं भाजपा के समय क्लास चले इसके लिए हमने पाठ्यक्रम बनाए और मैंने स्वयं क्लास लिया है। विचारधारा के आधार पर समाज को गढऩा, ये प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
क्तकाफी समय बाद इतनी लंबी विधानसभा चली। आपके मन में क्या भाव था कि विधानसभा लगातार चलनी चाहिए, कहीं जनता से आपका जुड़ाव तो कारण नहीं था?
विधानसभा का ठीक से चलना ये सामूहिक प्रयत्नों का परिणाम है। इसका श्रेय मुझे नहीं दिया जाना चाहिए। हम उम्र में और विधानसभा में रहते हुए वरिष्ठ हैं। विधान परिषद में भी रहे। इसलिए हमारे विधायकों के द्वारा मुझे आदर प्राप्त है। इस आदर का मैंने सदुपयोग किया। कोई खड़ा हुआ और बोल रहा है और मैंने इशारा किया तो बैठ गए। अकेले हमारे दम पर विधानसभा चली ऐसा मैं नहीं मानता। सत्तापक्ष का, प्रतिपक्ष का, सभी राजनीतिक दलों का, निर्दल विधायकों का समन्वित सहयोग मिला। हां, इधर काफी दिन से सत्रों में ऐसा नहीं हुआ था। पहले छोटा सा जो सत्र चला था उसमें 74 सदस्यों ने चर्चा में हिस्सा लिया था। ये जो 74 सदस्य हैं, ये प्रश्नोत्तर वालों के अलावा हैं। मैं आपके संस्थान के माध्यम से विधायकों को बधाई देना चाहता हूं कि अबकी बार विधानसभा में एक भी ऐसा अवसर नहीं आया, जब विधायकों की संख्या 300 से कम हुई हो। सदन बिल्कुल भरा रहा।

क्त आपको अपने अब तक के कार्यकाल में कुछ ऐसा लगा कि विधायकों को ये चीज अवश्य सीखनी चाहिए है?
मैं ऐसा तंत्र विकसित कर रहा हूं, जिसमें प्रदेश स्तर के, राष्ट्रीय स्तर के बड़े मुद्दे आते हैं उन मुद्दों पर विधायकों के साथ विशेषज्ञ लोग बैठक कर बात कर सकें। ऐसा मैं विधानसभा से अलग जीएसटी पर पहले भी करा चुका हूं। इसके अलावा हमारी विधानसभा की लाइबे्ररी में शोध अधिकारी होते हैं, वो प्रतिदिन के अखबारों में छपने वाले आर्टिकल्स की कटिंग रखते हैं,। आर्थिक से लेकर मनोरंजन से संबंधित विषय की कटिंग अलग-अलग रखी जाती है। यदि विधायक वहां जाता है तो शोध अधिकारी उनसे पूछते हैं कि किस विषय पर पढऩा चाहते हैं। उनके कहने पर वह उससे संबंधित सामग्री उपलब्ध कराते हैं। मेरा मानना है कि विधायकों को जनता से जुड़ी चीजों के बारे में अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि हम जनता के सामने हाथ-जोडक़र विधायक बनते हैं। विधायक की कोशिश होनी चाहिए कि वह विधानसभा में प्रभावी विधायक बनें। प्रभावी विधायक बनने का आनंद मैं जातना हूं, मैं कभी किसी मंत्री के दफ्तर नहीं गया, सन 1985 में विधायक बनकर आया था।

पिछले दस सालों में प्रदेश की नौकरशाही में काफी परिवर्तन देखने को मिला है। आपने काफी आन्दोलन किए आप तो समझते ही होंगे कि नौकरशाही की एक मानसिकता ऐसी बन गयी है कि जैसे वो इस समाज के नहीं हैं, वो कहीं अलग से आए हैं। खासतौर पर आईएएस अधिकारी तो गरीब आदमी से मिलना जुलना बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। तो इस खाईं को कैसे भरा जा सकता है? ये इस समाज की बेहद गंभीर और बड़ी समस्या है?
आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूं। संविधान ने नौकरशाही को नियंत्रित करने के लिए एक नियम बनाया था। नौकरशाही पर विधायी नियंत्रण होगा, उस पर सदन का नियंत्रण होगा, ब्रिटेन में भी ऐसा ही है। वहां की लोकसभा नौकरशाही को नियंत्रित रखती है। लेकिन पिछले एक लम्बे कालखंड में उत्तर प्रदेश विधानसभा में चाहें जिसकी सरकार रही हो, बहस नहीं हुई, सत्र नहीं हुए। विधानसभा में शोर-शराबा ज्यादा हुआ। यदि विधानसभा में एक स्वस्थ बहस नहीं होगी, सत्र नहीं चलेंगे तो ये नौकरशाही ऐसे ही बेलगाम होती चली जाएगी। विधानसभा में भी इस बात पर चर्चा हुई थी और मैं भी यह मानता हूं विधायिका ही नौकरशाही को कंट्रोल कर सकती है। धीरे-धीरे चीजें कंट्रोल हो रही हैं।

इस बार भी प्रदेश में बाढ़ का काफी प्रकोप है। यह बात समझ में नहीं आती जब प्रशासन को पता होता है कि इस इलाके में बाढ़ आती है तो सारी तैयारियां पहले से ही क्यों नहीं की जाती हैं? बाढ़ आने के कुछ दिन पूर्व ही तैयारियां क्यों की जाती हैं? ये सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है?
बाढ़ की सामान्य परिपाटी यह रही है कि पहले से तैयारियां पूर्र्ण कर ली जाती हैं। मैंने बाढ़ के मुद्दे पर सदन में चर्चा भी कराई थी। तब किसी विपक्षी नेता ने कहा था कि अभी तो बाढ़ नहीं आई है, लेकिन फिर भी हमने इस पर चर्चा कराई थी। इस बार शायद नेपाल के पानी से बाढ़ ने कुछ ज्यादा ही तबाही मचा दी है। सरकार इस मद्दे का स्थाई समाधान खोजने में जुटी है।
क्तराजनीति में अभी भी अपराधियों का चलन रुक नहीं रहा है। आम लोगों में भी इस बात की चर्चा रहती है। जनता उन्हें परिस्थितिवश वोट करती है और वह कहते हैं कि जनता ने हमें चुनकर भेजा है। ऐसे में राजनीति में अपराधियों का आना कैसे रुक सकता है?
इसका एक विकल्प तो यह है कि कोई कानून बनाया जाए और कानून के जरिए राजनीति में अपराधियों का आना रोका जाए। लेकिन कानून बनाने में एक बड़ी अड़चन यह होगी कि अपराधी की परिभाषा क्या हो? जैसे किसी पर मुकदमा हो गया तो क्या वो अपराधी है, या किसी पर आरोप लग जाए या किसी मामले की सुनवाई चल रही है तो क्या वो अपराधी है। इसलिए अपराधी की परिभाषा तय करना ही शायद इस कानून के लिए बड़ी चुनौती होगी और शायद हमेशा से यही रहा होगा। एक तो ऐसे लोग हैं जो वास्तव में अपराधी हैं, वे हत्या, लूटजैसे मामलों में वांछित है, दूसरा जिनके ऊपर राजनैतिक आंदोलन के चलते मुकदमे लगा दिए जाते हैं। इनमें भेद करना ही मुश्किल काम है। खैर मैं काफी आशावादी हूं, उम्मीद करता हूं कि ऐसी चीजें रुकेंगी।

एक आखिरी सवाल, आम आदमी के मन में कभी-कभी निराशा होती है राजनेताओं के प्रति, राजनीति के प्रति, वो कैसे खत्म कर सकते हैं या वो विश्वास आम आदमी के मन में कैसे वापस आ सकता है?
आपका पक्ष सही है कि आम आदमी निराश होता है। उसके दो कारण मैं मानता हूं। एक कारण तो यह है कि विधायक और सांसद के काम संविधान में परिभाषित नहीं हंै। दरअसल चुनाव में उम्मीदवार एक पार्टी का घोषणा पत्र लेकर जाता है और दूसरा वह खुद जनता से वादा करता है। ऐसा कई बार होता है कि नेता जनता से कई ऐसे वादे कर देता है जो पूरा कर पाना आसान नहीं है। चूंकि जनता नेता को वोट देकर जिताती है तो उसकी उम्मीदें बढऩा स्वाभाविक है। जबकि विधायकों के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह आदेश देकर काम करा लें। उन्हें 10 किमी सडक़ भी बनवानी है तो उसे किसी से कहना पड़ेगा। मैं भी विधायक हूं। इस बात को जानता हूं। सरकार, प्रशासन कितनी भी गति से विकास कार्य कराए जनता की आशा और इच्छा के आगे कम ही रहती है। गांधी जी ने भी कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता को नहीं बोलना सीखना चाहिए। इसलिए नेता जनता को झूठी उम्मीद न दें। आपके प्रतिष्ठिïत अखबार के माध्यम से मैं अपील करता हूं कि राजनीतिक दलतंत्र जनता के बीच विश्वसनीयता को बढ़ाए।

आपने अखबार भी निकाला। इस अखबार को निकालने का ख्याल आपको कैसे आया?
जब मैं 25-26 साल का था तो उस समय खूब आंदोलन होते थे, लेकिन बड़े अखबारों में ऐसी खबरों को जगह नहीं मिलती थी। मुझे लिखने का भी मन था। मैं लिखता था लेकिन अखबारों में जगह नहीं मिलती थी। इसलिए मैंने अपना साप्ताहिक अखबार निकाला। अखबार का नाम कार्यचिंतन था। पहले आठ पेज का था, बाद में 12 पेज का किया गया। मैं ही अखबार का मालिक था, संवाददाता था और चपरासी भी।

क्तऐसा क्या किया जाए कि नौकरशाही आम आदमी के लिए संवेदनशील बन जाए। इस बात को आपसे अच्छा शायद कोई समझ पाए। लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिसमें नौकरशाही की असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा पार हो जाती है?
इस पर भी मैं आपसे सौ प्रतिशत सहमत हूं। नौकरशाही नीतिगत आधार पर सरकार से जुड़ी होती है और मंत्रिमंडल के माध्यम से सदन के प्रति जवाबदेह होती है। मैंने तो पहले ही कहा कि यदि सदन के काम की क्वालिटी ठीक हो तो नौकरशाही पर नियंत्रण रहता है। फिलहाल सरकार पहले से ही काफी संवेदनशील है और सजग है। आप देख ही रहे हैं कि हर एक बड़ी घटना का मुख्यमंत्री स्वयं संज्ञान लेते हैं, वहां जाते हैं, अन्य मंत्री भी निरीक्षण करते रहते हैं। इसलिए उम्मीद है कि धीरे-धीरे नौकरशाही भी ठीक होगी।

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