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यूपी में नगर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण पर टिकीं दावेदारों की निगाहें

जिलों से वार्डों के आरक्षण का प्रस्ताव न मिलने से अध्यक्ष पद के लिए सूची लटकी
तेज हुईं निकाय चुनाव की सरगर्मियां, लिस्ट जारी होने के बाद दिखेगा चुनावी घमासान

वीकएंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क
लखनऊ। स्थानीय नगर निकाय चुनाव की हलचल बढ़ गई है। निकाय चुनाव में भाग्य आजमाने के इच्छुक लोगों की निगाहें फिलहाल आरक्षण की स्थिति पर टिकी हुई हैं। सभी नगर निगम और जनपदों से वार्डों के आरक्षण के प्रस्ताव शासन को न मिलने के कारण फिलहाल आरक्षण की सूची जारी होने में देरी हो रही है। आरक्षण की स्थिति साफ होने के बाद ही चुनाव की सरगर्मियां तेजी के साथ बढ़ेंगी।
नगर विकास विभाग ने चुनाव को लेकर हाईकोर्ट में जो कार्यक्रम दिया था उसके अनुसार 12 सितंबर तक आरक्षण का काम पूरा करना था और 27 सितंबर तक अधिसूचना जारी करने की बात कही गई थी। नगर विकास विभाग निर्धारित समय पर आरक्षण का कार्य पूरा नहीं कर सका है। सोमवार तक शासन को नौ नगर निगमों और 25 जनपदों से वार्डों के आरक्षण के प्रस्ताव प्राप्त नहीं हो सके थे। नगर निगम, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों से वार्डों के आरक्षण के प्रस्ताव न मिलने के कारण शासन स्तर से महापौर, नगरपालिका अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष के आरक्षण की सूची जारी होने में देरी होने के आसार पैदा हो गए हैं।
नगर विकास विभाग के सूत्रों के मुताबिक नगर निगम कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, गाजियाबाद, अलीगढ़, अयोध्या, मथुरा-वृंदावन और फीरोजाबाद से आरक्षण के प्रस्ताव नहीं मिले हैं। इसके अलावा बस्ती, लखीमपुर, रायबरेली, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, भदोही, सिद्धार्थनगर, देवरिया, एटा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़, संभल, मथुरा और औरैया आदि जिलों से वार्डों के आरक्षण के प्रस्ताव शासन को नहीं मिले हैं। हालांकि शासन स्तर से लगातार जिलाधिकारियों को इस संबंध में पत्र भेजे जा रहे हैं।

सीटें बदलने के लिए हो रही सेटिंग
धीरे-धीरे आरक्षण की स्थिति साफ होने पर मौजूदा पार्षदों व सभासदों में खलबली मच गई है। जिन वार्डों का आरक्षण बदल रहा है वहां के पार्षद दूसरे वार्ड से चुनाव लडऩे के लिए जोड़तोड़ में जुट गए हैं। इसके अलावा जिन वार्डों से पुरुष पार्षद हैं और इस बार वार्ड महिला आरक्षित होने पर मौजूदा पार्षद पत्नियों को आगे बढ़ा रहे हैं। कई वार्डों में तो पार्षदों ने पत्नियों के लिए चुनाव प्रचार शुरू भी कर दिया है। लखनऊ नगर निगम के कार्यवाहक महापौर सुरेश अवस्थी जिस वार्ड से पार्षद हैं, इस बार वह अपने लिए प्रचार नहीं कर रहे बल्कि पत्नी गीता अवस्थी के लिए प्रचार कर रहे हैं।

गति नहीं पकड़ रहा चुनाव प्रचार
आरक्षण की स्थिति साफ न होनेे के कारण निकाय चुनाव के लिए चुनाव प्रचार गति नहीं पकड़ रहा है। चुनाव लडऩे वाले ज्यादातर लोगों को आरक्षण में बदलाव की आशंका है, इसलिए उनकी निगाह आरक्षण की स्थिति पर है और एक बार आरक्षण की स्थिति साफ होने के बाद ही वह चुनाव प्रचार में उतरने का मन बनाए हैं। बरेली नगर निगम से महापौर का चुनाव लडऩे के इच्छुक एक नेता का कहना है कि चुनाव प्रचार कैसे शुरू करें, पहले आरक्षण की स्थिति सामने आए तभी तो चुनाव प्रचार किया जाए। बदायूं नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए दावा कर रहे एक वकील साहब आरक्षण जानने के लिए लगातार शासन स्तर पर संपर्क बनाए हुए हैं।
पहले जून में होने थे चुनाव
नगर निकाय चुनाव पहले जून 2017 में होने थे। बताते हैं मतदाता सूची और परिसीमन का कार्य न होने के कारण सरकार ने छह महीने के लिए चुनाव टाल दिया था। अब यह चुनाव नवंबर में होंगे। इसके लिए आरक्षण व अन्य सभी कार्य अक्टूबर में पूरे कर लिए जाएंगे। 25 अक्टूबर के आसपास चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाएगी और मतदान नवंबर में कराया जाएगा। मतदान कितने चरण में होगा, अभी यह तय नहीं है। राज्य निर्वाचन आयोग इसके लिए तैयारी में जुटा है।

सोशल मीडिया में सीटों का आरक्षण भ्रामक
सोशल मीडिया पर सीटों का दिखाया जा रहा आरक्षण भ्रामक है। नगर विकास विभाग ने इसे पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा है कि जब तक सभी जनपदों और नगर निगमों से वार्डों के आरक्षण का प्रस्ताव प्राप्त नहीं हो जाता, अध्यक्ष पद के लिए आरक्षण की सूची जारी नहीं होगी। नगर विकास विभाग ने सोशल मीडिया पर दिखाए जा रहे आरक्षण को गलत बताया है।

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