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पहले सरकार तो गांव लौटे

देहरादून, उत्तराखंड राज्य का गठन किस लिए हुआ था, यह शायद कम लोगों को याद होगा। पहाड़ के लोगों के साथ मैदानी इलाकों में उपेक्षित बर्ताव, बेरोजगारी, इसके कारण खाली होते पहाड़, विकास की गति एकदम सुस्त होना नए राज्य के गठन का कारण बना था। उम्मीद थी कि राज्य बनेगा तो ये समस्याएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगीं। राज्य में खुशहाली आएगी। पहाड़ हरे-भरे ही नहीं होंगे बल्कि लोगों से भरे होंगे। किसी को रोजगार और विकास की चाह में अपना प्रिय पहाड़ छोडऩा नहीं पड़ेगा। ऐसा शुरू में होता नहीं दिखा तो लगा की वक्त के साथ यह परवान चढ़ेगा। इसकी बजाए हुआ यह कि पहाड़ से पलायन और तेज होता चला गया। गांव और घर खाली होते चले गए, घरों में जंगली जानवरों का डेरा बसने लगा। आज यह समस्या प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौतियों में शुमार हो चुकी है। 17 साल हो चुके हैं राज्य का गठन हुए। अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने महसूस किया कि इस दिशा में जल्दी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले सालों में यह नासूर बन जाएगा, जो प्रदेश के विकास की राह का रोड़ा और देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाएगी। सरकार को महसूस हो रहा है कि वन संपदाओं की भी रक्षा तभी मुमकिन है जब पहाड़ आबाद होंगे। इसको देखते हुए उन्होंने आखिरकार राज्य ग्रामीण विकास और पलायन आयोग का गठन कर दिया है। आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी पर पूर्व आईएफएस अफसर डॉ. एसएस नेगी को बिठाया गया है। आयोग इस मुश्किल लक्ष्य को कितना हासिल कर पाता है यह भविष्य का मामला है। असली सवाल यह है कि जिस प्रदेश में मुख्यमंत्री, मंत्री तथा विधायक पहाड़ और पुश्तैनी गांव को सिर्फ सियासत के लिए या फिर दिखावे के लिए ही इस्तेमाल कर रहे हों, वहां आयोग कैसे लोगों को पहाड़ न छोडऩे या फिर पहाड़ वापस लौटने के लिए प्रेरित कर पाता है।

पलायन आयोग आखिर क्या योजना अपनाता है। अभी इसका गठन ही हुआ है। वैसे आयोग भले गठित हो गया लेकिन पलायन को थाम पाना और इससे भी मुश्किल लोगों को गांव लौटने के लिए बाध्य कर पाना है। पलायन दो वजह से होता है। एक-विकास की बुनियादी सुविधाएं अगर अपने क्षेत्र में उपलब्ध न हो तो लोग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए विकसित मैदानी इलाकों का रुख करते हैं। दो-रोजगार की अनुपलब्धता, आम तौर पर इन कारणों से ही लोग अपने प्रिय गांव को भरे आंखों से छोड़ते हैं। उत्तराखंड में इसके साथ ही एक और बड़ा कारण है, जो पलायन को बढ़ावा दे रहा है। यह कारण सिर्फ राजनेताओं को भा रहा है। यह है सियासत के लिए आसान और प्रिय क्षेत्र हासिल करना। ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो मूल रूप से भले पहाड़ के हैं लेकिन वे राजनीति मैदान की कर रहे हैं। इनमें मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर के राजनेता शामिल रहे हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इसकी अकेली मिसाल नहीं हैं, जो पौड़ी के खैरसैन से हैं। वे अब देहरादून में डिफेंस कॉलोनी में अपना घर बना चुके हैं। चुनाव भी देहरादून की डोईवाला और राजपुर सीट से लड़ते रहे हैं। आने वाले सालों में भी वह यहीं से लड़ेंगे तय है।
उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत को ही लें। वह अल्मोड़ा के बस नाम मात्र के लिए रह गए हैं। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से जब तक लोक सभा सीट से लड़े, तभी तक वहां जाते रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद देहरादून उनका स्थाई आशियाना बन चुका है। पिछले विधानसभा चुनाव में वह पहाड़ की सीट से नहीं लड़े। उन्होंने उधमसिंह नगर की किच्छा और हरिद्वार (ग्रामीण) सीट से लडऩा पसंद किया। तकदीर के मारे कहें या अति आत्मविश्वास, दोनों सीटों से वह चित हो कर बाहर हो गए। रमेश पोखरियाल निशंक भी पौड़ी जिले के पिनानी गांव से हैं। उत्तर प्रदेश के दिनों में जब वह मंत्री थे, तब कर्णप्रयाग से विधायक होते थे। उत्तराखंड बनने के बाद उनको देहरादून के डोईवाला की सीट पसंद आ गई। फिर हरिद्वार सीट से लोकसभा चुनाव लड़े और जीत कर सांसद पहुंच गए। अब कहीं से नहीं लगता कि वह कभी पहाड़ जा के लड़ेंगे। कांग्रेस की पहली सरकार के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी भले अल्मोड़ा के निवासी मूल रूप से थे, लेकिन जब उनको मुख्यमंत्री बनने के बाद उप चुनाव लडऩा पड़ा तो रामनगर जैसे आसान और तराई सीट से लडऩा पसंद किया। मंत्रियों में ऐसे नामों की कमी नहीं है जो भले चुनाव पहाड़ों में लड़ते हैं, लेकिन घर बार देहरादून में हैं। कुमायूं के कई बड़े राजनेताओं के घर हल्द्वानी और रुद्रपुर में हैं। भले उनका बसोबास और कार्य क्षेत्र पहाड़ माना जाता हो। मौजूदा सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रकाश पन्त, सुबोध उनियाल, राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत, डॉ. हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष अजय भट्ट कहने को भले पहाड़ से नाता रखते हैं, लेकिन उनके निजी घर या तो देहरादून में हैं या फिर रहते ही यहीं हैं। कांग्रेस के भी प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, जो दो बार कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं, देहरादून में ही रहते हैं। यह सभी सिर्फ चुनाव लडऩे के लिए पहाड़ का रुख करते हैं। यही हाल नौकरशाहों का है। कई किराए पर या फिर विधायक हॉस्टल में रहते हैं, लेकिन उनके साथ उनका परिवार है। नौकरशाहों की भी कमी नहीं, जिन्होंने पहाड़ की मिट्टी से नाता तोड़ लिया और अब देहरादून तथा अन्य मैदानी इलाकों में रहते हैं। जब सक्षम लोग सिर्फ अपने निजी हित के लिए पहाड़ छोड़ रहे हैं, जबकि वे कई तरह से सक्षम हैं, तो फिर कमजोर तबके को कैसे पहाड़ छोडऩे के लिए रोक सकते हैं। पहाड़ में आज तीन हजार गांव वीरान हो चुके हैं। पिछली जनगणना को देखे तो ढाई लाख घरों में ताला लग चुका है। अपने बेहतर कल की इच्छा सभी की होती है। यह लोग अपने घरों और पहाड़ी गांव में ही रहते देख सके, इसकी व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सरकार की है। वह ऐसा नहीं कर पाई है।
17 सालों के बाद पहाड़ों में स्थिति बदतर ही हुई है। गांव में स्कूल नहीं हैं तो उनमें मास्टर नहीं हैं। मास्टर नियुक्त हैं तो वे आते नहीं हैं। यही हाल स्वास्थ्य सुविधाओं की है। न अस्पताल पर्याप्त तादाद में हैं न ही थोड़े बहुत उपलब्ध डॉक्टर ही ड्यूटी पर आते हैं। आए दिन पहाड़ों में सडक़ हादसे होते रहते हैं। बरसात के दिनों में भू-स्खलन और लोगों के मारे जाने की घटनाएं आम रहती हैं। आयोग क्या कर सकता है? वह ज्यादा से ज्यादा कारण बता सकता है। उसके उपाय बता सकता है। सरकार को पलायन का कारण और उपाय पता न हो, ऐसा नहीं है। वह सब जानती है, लेकिन उसके लिए पलायन रोकना संभव नहीं है। आयोग का गठन सिर्फ राजनीतिक स्कोर करने की खातिर किया गया, कह सकते हैं। पलायन रोकना है तो सबसे पहले बड़े राजनेताओं को अपने मूल पहाड़ की ओर पहले लौट कर लोगों को प्रेरित करना होगा। मैदान की सभी सुविधायें लोगों को पहाड़ में ही मुहैया कराने की कोशिश करनी होगी। यह कोई नामुमकिन लक्ष्य नहीं है। विकसित पहाड़ी देशों का अध्ययन कर के और देश के पहाड़ी राज्यों में टीम भेज कर हालात का जायजा लेकर समाधान तलाशना भर है। यह कार्य सरकार कर सकती है। इसमें खतरा सिर्फ यह है कि इस बहाने सिर्फ देश-विदेश का मुफ्त सैर सपाटा और ऐश न शुरू हो जाए। पलायन आयोग भर के गठन से कुछ नहीं होने वाले है। इससे लोगों को गुमराह किया जा सकता है, समाधान नहीं निकल सकता। समाधान के लिए सरकार की ईमानदारी जरूरी है। त्रिवेंद्र सरकार इस पैमाने पर कितना खरा उतरती है, देखने वाली बात है। जो अफसर मंडल मुख्यालय पौड़ी होने के बावजूद वहां नहीं बैठते, सबसे पहले उनको ही वहां बैठने के लिए मजूबर करे सरकार। अगर सारी सुविधाओं के बावजूद इतने बड़े नौकरशाह पहाड़ नहीं जाना चाहते तो छोटे कर्मचारियों और लोगों से क्यों उम्मीद की जाए। सरकार ने पलायन आयोग का मुख्यालय पौड़ी रखा है और देखने वाली बात होगी कि क्या आयोग सचमुच वहीं से कार्य करेगा। ऐसा न हो कि कुछ महीने बाद एक शिविर कार्यालय देहरादून में खुल जाए। इन्तजार कीजिए।

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