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सचिन की मेहनत बेकार ढेहलिया ध्वस्त

दुर्भाग्यपूर्ण है भारत रत्न का विवादों में फंसना
इस साल सर्दियों में शायद ही मसूरी आएंगे

देहरादून। मसूरी में पिछले कुछ सालों से भारत रत्न सचिन तेंदुलकर अपनी पत्नी अंजलि और दोनों बच्चों अर्जुन तथा सारा के साथ आने के आदत डाल चुके हैं। वह भले दुनिया के सभी खूबसूरत देशों और पर्यटन स्थलों को देख चुके हैं और उनके लिए कहीं भी जाना सिर्फ इच्छा की बात है लेकिन उनको उत्तराखंड के देहरादून में स्थित यह छोटा सा हिल स्टेशन शायद दिल में उतर चुका है। सचिन के मसूरी आने से उनको और उनके परिवार को सुकून मिलता हो या फिर लुत्फ उठाते हों, लेकिन हकीकत यह भी है कि इससे उत्तराखंड और मसूरी की ब्रांडिंग भी खूब हुई है। हर साल स्थानीय कारोबारी और लोग मसूरी में सचिन के परिवार के आने का बेसब्री से इन्तजार करते रहे हैं, जो सर्दियों में आते रहे हैं। अब वे भी निराश दिखते हैं। उनको संशय है कि इस साल सचिन आएंगे या नहीं। इसकी वजह है उस ढेहलिया बैंक भवन का ध्वस्त हो जाना, जो उनके कथित मित्र और बड़े कारोबारी संजय नारंग का है। सुप्रीम कोर्ट ने भी जब इस भवन को अवैध निर्माण मान लिया तो कैंट बोर्ड ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मदद से उसको जीसीबी और मजदूर लगा कर जमींदोज कर डाला। कोई शक नहीं कि देश के लाडले बड़े और विदेशों में भी अपनी बल्लेबाजी प्रतिभा से ऊंची छाप छोड़ चुके भारत रत्न सचिन के निजी और सार्वजनिक जीवन में भी इस मामले से धब्बा लगा है।
सचिन का इस मामले में नाम आना वाकई बुरा और दुर्भाग्यपूर्ण है। सचिन के खजाने में भारत रत्न, राजीव गांधी खेल रत्न और पद्म पुरस्कार समेत अनेक सम्मान भरे हुए हैं। भारत रत्न तो इतना बड़ा सम्मान है कि हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले दिवंगत मेजर ध्यानचंद को तमाम बड़े लोगों के समर्थन के बावजूद यह सम्मान नहीं मिला है। सचिन के समर्थक यह कह सकते हैं कि ढेहलिया बैंक विवाद से सचिन का नाम जोडऩा उचित नहीं है। भवन का स्वामित्व नारंग के पास है। वह तो सिर्फ चंद दिनों के लिए रहने भर को आते हैं। यह बेतुकी दलील से ज्यादा कुछ नहीं कही जा सकती है। सचिन को पता होना चाहिए कि वह जिस भवन में रुक रहे हैं या जिन सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनकी वास्तविकता क्या है। वैसे नारंग के वह इस कदर करीबी हैं कि इस पर यकीन करने का जी किसी का नहीं करेगा कि पूर्व मास्टर ब्लास्टर को इस मामले में हकीकत के बारे में कुछ भी पता नहीं था।
सचिन के बारे में यह बात सामने आ चुकी है कि उन्होंने इस भवन को ध्वस्त होने से बचाने के लिए मनोहर पर्रीकर से तब बात की थी, जब वह रक्षा मंत्री थे। ईमानदार और सख्त पर्रीकर ने न सिर्फ सचिन की बात मानने से इनकार किया बल्कि अवैध निर्माण मामले में कार्रवाई को जारी रखने के निर्देश रक्षा मंत्रालय के अफसरों को दिए। नारंग को नीचे से लेकर ऊपर सुप्रीम कोर्ट तक में राहत नहीं मिली। इससे साबित होता है कि कितना बड़ा अवैध निर्माण, जो तकरीबन 26,000 वर्ग फीट का बताया जाता है, नारंग ने किया हुआ था। अहम बात यह है कि नारंग ने भवन परिसर में टेनिस कोर्ट के निर्माण की मंजूरी छावनी परिषद से ली तो थी, लेकिन कोर्ट छोड़ के सारे अवैध निर्माण कर डाले।
छावनी क्षेत्र में भवन निर्माण से जुड़े मानचित्रों को मंजूरी छावनी प्रशासन ही देता है। इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्निकल मैनेजमेंट, जो रक्षा मंत्रालय के आधीन आता है, के एकदम करीब ढेहलिया बैंक भवन के निर्माण को सुरक्षा कारणों से मंजूरी नहीं मिल सकती थी, फिर भी उस वक्त भी निर्माण कार्य चलता रहा, जब मामला कोर्ट में चल रहा था। इससे अहसास होता है कि या तो नारंग को कोर्ट का भी भय नहीं था, या फिर उनको कोर्ट में अपने जीत जाने की उम्मीद थी। नारंग तो कारोबारी है, और उनकी छवि ऊपर-नीचे होती रहे तो खास फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन सचिन के साथ ऐसा नहीं है। देश का एक बड़ा वर्ग उनका प्रशंसक है और खेल जीवन के दौरान वह कभी भी किसी विवाद में नहीं पड़े। पहली बार विवाद तभी हुआ था, जब उनको भारत रत्न देने का एलान हुआ। इस पर बहुत ऊंगली उठी कि देश में कई बड़े नामों और वरिष्ठों की, जिनका योगदान देश के लिए बहुत रहा है, को छोड़ कर देश के बजाय निजी बीसीसीआई कंपनी के लिए खेलने वाले पेशेवर क्रिकेटर को भला इतना बड़ा सम्मान वह भी इतनी जल्दी कैसे दिया जा सकता है। अगर किसी खिलाड़ी को ही देना था तो पहले ध्यानचंद को फिर सुनील गावस्कर थे। ढेहलिया बैंक भवन के बारे में यह भी बात उठती रही है कि इसके स्वामित्व में सचिन का भी अंश है या फिर परदे के पीछे वही इसके स्वामी हैं। बहरहाल, इस ढेहलिया बैंक भवन ध्वस्त होने से लिटिल मास्टर की छवि का बड़ा नुकसान तो हुआ ही है।

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