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याद आई किसानों की

पहाड़ में बेहतर खेती पर कार्य करेंगे वैज्ञानिक

पंतनगर। राज्य के गठन के 17 साल बाद आखिर सरकार को किसानों और खास तौर पर पहाड़ में खेती कर बामुश्किल गुजर-बसर कर रहे किसानों की याद आ ही गई। किसानों के लिए खास तौर पर आयोजित मेले में शिरकत करते हुए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वैज्ञानिकों को किसानों के लिए और पहाड़ में खेती को अधिक बेहतर बनाने के लिए शोध कार्य करने पर अधिक जोर देने की अपील की। पन्त नगर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एलपी मिश्र ने भी वादा किया कि किसानों की कमाई दुगुनी करने और खेती की लागत कम करने के लिए वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।
उत्तराखंड बनने के बाद अगर किसी तबके की उपेक्षा हुई और क्षेत्र उपेक्षित रहा तो वह कृषि और किसान ही है। पहाड़ों में तो किसानों ने खेती छोड़ दूसरे धंधे अपनाने शुरू कर दिए या फिर मैदानी इलाकों में छोटे-मोटे रोजगार की खातिर चले गए। इससे पलायन बढ़ा और पहाड़ वीरान होते जा रहे हैं। सरकार अब जा के चेती है । इसके बावजूद इसकी गुंजाइश कम ही है कि पलायन रोकने के नतीजे जल्द हासिल होंगे। पहाड़ों में खेती छोड़ अन्य धंधा अपनाने और पलायन कर जाने की बड़ी वजह कम कमाई और अधिक लागत तथा मेहनत है। पहाड़ में प्रदूषण मुक्त उद्योग लगाने की कोशिशें भी की गईं, लेकिन इसका नतीजा भी सिफर ही निकला है। कोई भी उद्योग कोटद्वार और सितारगंज से उपर चढऩे को तैयार नहीं हुआ है। ऐसे में सरकार के पास एक बार फिर पहाड़ में रोजगार को बढ़ावा देने और उसको वीरान होने से बचाने के लिए खेती को ही प्रोत्साहित करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है। पंतनगर विश्वविद्यालय के हाल में 102वें अखिल भारतीय किसान मेले में मुख्यमंत्री का पहाड़ की इस भीषण समस्या को लेकर चिंता झलकी। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से गुजारिश की कि वे पहाड़ में खेती कैसी बेहतर हो और रोजगार के लिए लोग उसके प्रति आकृष्टï हों, उस पर कार्य करें।
त्रिवेंद्र ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आय और खेती दोनों बढ़ाना चाहते हैं। यह तभी मुमकिन है, जब खेती को लेकर लोगों में जागरूकता और उत्साह दोनों पैदा हो। ऐसा तभी होगा जब खेती मुनाफे का सौदा साबित होगा और मेहनत कम करनी पड़ेगी। दुर्भाग्य से अभी एकदम उल्टा चल रहा है। राज्य सरकार किसानों के उठान और विकास के लिए हर तरह की सुविधाएं मुहैया करा रही है, लेकिन नई प्रौद्योगिकी का विकास होते रहना होगा। इसमें वैज्ञानिकों की अहम भूमिका है। उन्होंने मेले में लगे उद्यान प्रदर्शनी को देखा और अलग-अलग जिलों से आए किसानों को उनके विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया। इनमें प्रदीप रस्तोगी (उधमसिंह नगर), सुनील कुमार (हरिद्वार), नरेंद्र गोबदी (पिथौरागढ़), खुशाल सिंह (चमोली), नरेंद्र सिंह माहरा (नैनीताल), प्रवीण कुमार (देहरादून), महेशचंद्र कांडपाल (अल्मोड़ा), पंकज तिवारी (चम्पावत), रंजना रावत (रुद्रप्रयाग) शामिल थे। कुललपति मिश्र ने भी इस मौके पर कहा कि सरकार की इच्छा के मुताबिक वैज्ञानिक किसानों की मेहनत कम करने और उपज में दुगुना इजाफा करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बाद में कहा कि किसानों के हक और सम्मान के लिए सरकार हमेशा उनके साथ खड़ी रहेगी। जितने भी बेहतर कदम वह उठा सकती है, उठा रही है और आगे भी उठाएगी । वह जानते हैं कि पहाड़ में पलायन रोकने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर खेती को बढ़ावा देना कितना जरूरी है। किसानों और पहाड़ का ख्याल आने का प्रमुख कारण लोकसभा चुनाव के करीब आते जाने और चीनी सरहद की तरफ से कुछ न कुछ विवादित और संवेदनशील हरकत होने को माना जा रहा है। उत्तराखंड का बड़ा हिस्सा चीनी सरहद से सटा हुआ है। खास तौर पर बाराहोती की तरफ का हिस्सा चीन अपना होने का दावा करता है, जबकि शुरू से ही वह भारत के पास है और उसके अधिकार क्षेत्र में है। चीन ने सीमा तक सडक़े बना ली हैं, जो युद्ध होने की सूरत में उसके लिए बेहतर परिवहन का माध्यम साबित होगा। इसके उलट कठिन जीवन शैली, आपदाओं और खेती से कुछ न मिलने और रोजगार के अन्य साधन न होने के कारण पहाड़ एक युवा बड़े मैदानी शहरों का रुख करने को विवश हैं। केंद्र सरकार की भी कोशिश है कि पहाड़ को रहने लायक बनाया ही न जाए बल्कि यहां लोगों को आने और रहने के लिए प्रेरित किया जाए। इससे सरहद की सुरक्षा के साथ ही वनों और वन्य जीवों की तस्करों के हाथों रक्षा भी हो जाएगी।
यह विडम्बना है कि अब तक जितनी भी सरकारें आईं, उनमें से कुछ वक्त के लिए सिर्फ एनडी तिवारी और खंडूरी सरकार ने ही थोड़ा बहुत पहाड़ में उद्योगों को स्थापित और प्रोत्साहित कर पलायन रोकने और रोजगार पैदा करने की कोशिश की जो जमीनी स्तर पर ढंग से कार्य न होने के कारण परवान नहीं चढ़ पाई। त्रिवेंद्र सरकार के लिए भी यह कार्य इतना आसान साबित नहीं होगा। भले उसने पलायन आयोग का गठन कर दिया हो।

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