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रायवाला में प्रशासन की नाकामी से उपद्रव

साम्प्रदायिक रंग देना चाहते थे दंगाई

देहरादून। देहरादून का छोटा सा इलाका लेकिन देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश को जोडऩे वाले रायवाला में तब हिंसा भडक़ उठी, जब एक समुदाय के युवक का क्षत विक्षत शव रेलवे ट्रैक पर मिला। हालांकि, भडक़े उपद्रव में किसी की जान नहीं गई लेकिन दो दिनों तक दंगा होने के कारण एक समुदाय के लोगों के प्राण हलक में फंसे हुए हैं। इस दौरान लगा जैसे प्रशासन और सरकार नाम की चीज नहीं है। दंगाई खुलकर आगजनी और तोड़ फोड़ को अंजाम देते रहे। पुलिस को न जाने किसका आदेश था कि वह सब कुछ देखते हुए भी सब कुछ होने देते रही। अब पुलिस के साथ ही सरकार पर भी इस उपद्रव के कारण ऊंगली उठ रही है। शुक्र है कि इस उपद्रव को साम्प्रदायिक रंग नहीं मिल सका क्योंकि दोनों समुदाय के लोगों ने इस मामले में बहुत समझदारी और परिपक्वता दिखाई।
मामले ने रंग तब दिखाया जब एक युवक का कटा-फटा शव रायवाला में ही रेलवे पटरी पर पड़ा मिला। धीरे-धीरे मामले का खुलासा हुआ तो पाया गया कि युवक विवाहित था और अन्य समुदाय की लडक़ी से मोहब्बत करता था। लडक़ी के घरवालों को जब यह पता चला तो उसकी शादी किसी और से करने की तैयारी शुरु कर दी। युवक लडक़ी के घर भी पहुंच गया और झगड़ा हुआ। इसके बाद लडक़ी के घरवालों के हाथों उसकी मौत हो गई, ऐसा पुलिस का कहना है। लडक़े की मौत के बाद उसको हादसा दिखाने के लिए लडक़ी के पिता और भाई ने उसका शव रेलवे पटरी पर रख दिया। इसमें सच्चाई कितनी है, यह पुलिस जांच से ही पता चल पाएगा, लेकिन धर्म विशेष के लोगों की इसकी बाद शामत आ गई। युवक के समुदाय के लोगों ने समूह बना कर रायवाला में दंगा मचा डाला। उन्होंने अन्य समुदाय के लोगों की दुकानों और घरों पर हमला बोल डाला। उनको तोड़ा और आग के हवाले कर दिया।
पुलिस पीछे-पीछे चलती रही, लेकिन दंगाइयों को रोकने से बचती रही। इस दौरान दूसरे समुदाय के लोग ऊपर वाले और तकदीर के भरोसे रहे। दो दिन बाद जब मीडिया में मामला बहुत ज्यादा उछला तब जाकर पुलिस ने हरकत दिखाई और मामले पर नियंत्रण हुआ। यह दंगा भले दोनों समुदायों के लोगों के बीच आग की तरह नहीं भडक़ा तो इसलिए कि दूसरा समुदाय खामोशी के साथ रहा । साथ ही दोनों समुदाय के परिपक्व लोगों ने इसको न तो समर्थन दिया न ही इसको बढ़ावा देने की कोशिश ही की। यह मामला इसलिए भी बहुत संवेदनशील था कि जिस इलाके में उपद्रव हुआ, उसके करीब दोनों ही धर्मों के लोगों की अच्छी-खासी आबादी है। उनकी भावनाएं भडक़ जाती तो कुछ भी हो सकता था।
इस मामले में पुलिस, प्रशासन और खुफिया विभाग या तो पूरी तरह नाकाम साबित हुआ या फिर उसने घटना को नजर अंदाज किया। ऐसा कैसे मुमकिन है कि एक समुदाय के युवक की हत्या हो जाए और दूसरे समुदाय के लोगों का नाम आने के बावजूद कुछ भी होने की आशंका ही न हो।
होना तो यह चाहिए था कि घटना का पता चलते ही पुलिस, प्रशासन और खुफिया विभाग को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए था। तीनों की लापरवाही के साथ ही उच्च स्तर पर भी सरकार ने कोई सख्त फौरी कदम तुरंत नहीं उठा। यह हैरान करने वाली बात है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हालांकि, दंगा भडक़ जाने के बाद मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि मामले पर पैनी नजर रखी जाए और कोई भी भडक़ाऊ कार्रवाई आगे न हो। इस बीच इस मामले को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने मारे गए युवक के परिवार को मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से पांच लाख रूपये दिलाने का ऐलान किया। अग्रवाल का घर और विधानसभा क्षेत्र रायवाला से सटा हुआ है। कांग्रेस नेता आजाद ने अग्रवाल के फैसले पर तुरंत कहा कि उनको यह भी याद रखना चाहिए कि दूसरे समुदाय के निर्दोष लोगों का बहुत नुकसान दंगे में हुआ। साथ ही स्पीकर को इस तरह की राजनीति से दूर रहना चाहिए।

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