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कोमल भावनाओं की संवाहक थीं साहित्यकार महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा कवयित्री होने के साथ ही साथ कुशल चित्रकार, अनुवादक भी थीं। उन्हें हिंदी साहित्य के सभी पुरस्कार प्राप्त हुए। 1932 में उन्होंने महिला पत्रिका चांद का कार्यभार संभाला। 1930 में निहार, 1932 में रश्मि, 1934 में नीरजा, 1936 में सांध्यगीत नामक चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए।
दी साहित्य जगत की महान लेखिका महादेवी वर्मा का साहित्य जगत में उसी प्रकार से नाम है जैसे कि मुंशी प्रेमचंद व अन्य साहित्यकारों का। महादेवी वर्मा ने केवल साहित्य ही नहीं अपितु काव्य समालोचना, संस्मरण, संपादन तथा निबंध लेखन के क्षेत्र में प्रचुर कार्य किया है अपितु इसके साथ ही वे एक अप्रतिम रेखा चित्रकार भी थीं। उनका जन्म होली के दिन हुआ था। वह काफी हसमुंख स्वभाव की थीं। महादेवी जी पूजा पाठ के प्रति अत्यधिक आग्रही थीं। महादेवी जी को जीवन में अनेक विडम्बनाओं का सामना भी करना पड़ा। इनकी चर्चा उन्होंने अपने संस्मरण में की है। वह हिंदी की प्राध्यापक भी रहीं पर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य का भी अध्ययन किया। उनकी इच्छा वेद, पुराण आदि को मूलरूप से समझने की थी। इसके लिए वे कई विद्वानों से मिलीं लेकिन अब्राह्मण और महिला होने के कारण कोई उन्हें पढ़ाने को तैयार नहीं हुआ। काशी हिंदू विवि ने तो उन्हें प्रवेश देना भी उचित नहीं समझा। इसकी पीड़ा उनको हमेशा रही, लेकिन बाद में उनके जीवनकाल में एक ऐसा समय भी आ गया जब एक नहीं तीन विश्वविद्यालयों- विक्रम विश्वविद्यालय, कुंमाऊं विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विवि ने उन्हें डी. लिट की उपाधि प्रदान कीं।
महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य में छायावादी युग की चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्री होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। निराला ने उन्हें हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती भी कहा है। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार और रूदन को देखा, परखा और करूण होकर अंधकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। उन्होंने मन की पीड़ा को स्नेह और श्रृंगार से सजाया और काव्य संग्रह दीपशिखा में वह उनकी पीड़ा के रूप में स्थापित हुईं और उसने केवल पाठकों तक को ही नहीं अपितु समीक्षकों तक को झकझोरा और गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने हिंदी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल ब्रजभाषा में ही मानी जाती थी। महादेवी वर्मा कवयित्री होने के साथ ही साथ कुशल चित्रकार, अनुवादक भी थीं। उन्हें हिंदी साहित्य के सभी पुरस्कार प्राप्त हुए। 1932 में उन्होंने महिला पत्रिका चांद का कार्यभार संभाला। 1930 में निहार, 1932 में रश्मि, 1934 में नीरजा, 1936 में संध्यागीत नामक चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए। 1939 में इन चार काव्य संग्रहों को मिलाकर वृहदाकार में यामा शीर्षक से प्रकाशित किया गया। यामा के संकलन के लिए उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उनकी 18 और कृतियां हैं जिसमें गद्य और पद्य दोनों शामिल हैं। जिसमें मेरा परिवार, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी, श्रृंखला की कडिय़ां और अतीत के चलचित्र प्रमुख हैं। एक प्रकार से छायावादी काव्य की समृद्धि में महादेवी वर्मा का योगदान अप्रतिम है। उन्होंने निबंध भी लिखे जिसमें विवेचनात्मक गद्य, साहित्यकार की आस्था तथा कुछ अन्य निबंध व गद्य महत्वपूर्ण हैं। उनके संस्मरण भारतीय जीवन के संस्मरण चित्र हैं। उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित हिंदी सम्मेलन की अध्यक्षता भी की। 16 सितम्बर 1991 को जयशंकर प्रसाद के साथ उनका युगल डाक टिकट जारी किया गया।
महादेवी वर्मा कोमल भावनाओं की संवाहक थीं। सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने पहली कविता लिखी थी- आओ प्यारे, तारे आओ मेरे आंग में बिछ जाओ। उनका विवाह मात्र 9 वर्ष की अवस्था में हो गया था जबकि उनकी अभी और पढ़ाई करने की इच्छा थी। इसलिए उन्होंने ससुराल जाने की बजाय शिक्षा का मार्ग चुना। 1932 में उन्होंने प्रयाग विवि से संस्कृत में एमए किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहतीं थीं। परन्तु गांधी जी ने उन्हें नारी शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। अत: उन्होंने प्रयाग में ही महिला विद्यापीठ महाविद्यालय की स्थापना की जिसकी वे कुलपति भी बनीं।
महादेवी जी के मन पर गांधी जी का व्यापक प्रभाव था। बापू गुजराती और हिंदी बहुत अच्छी जानते थे फिर भी वे हिंदी में बोलते थे। महादेवी जी ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि हिंदी भारत की आत्मा को सहज ढंग से व्यक्त कर सकती है। तब से ही महादेवी वर्मा ने हिंदी को अपने जीवन का आधार बना लिया। वे महाप्राण निराला को अपना भाई मानकर उन्हें राखी बांधती थीं। उनके विशाल परिवार में गाय, हिरण, बिल्ली, गिलहरी, खरगोश, कुत्ते आदि के साथ लता और पुष्प भी थे। अपने संस्मरणों में उन्होंने इन सबकी चर्चा की है। उन्होंने साहित्यकारों के लिए साहित्यकार संसद बनाई। मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत होने के कारण वे प्राकृतिक आपदाओं से पीडि़त लोगों की खुले दिल से सहायता करती थीं।

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