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खंडूड़ी, कोश्यारी, महारानीे, निशंक को मिलेगा टिकट!

देहरादून। बीजेपी में कुछ नेता ऐसे हैं जिनके बगैर कुछ वक्त पहले तक पार्टी की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वे अभी भी हैं लेकिन पार्टी के लगातार पेशेवर होने और केन्द्रीय नेतृत्व में असर कम होते जाने के कारण ये नेता अब किनारे लगने की हालत में पहुंचते दिखने लगे हैं। इन नेताओं को भी इसका अहसास होने लगा है। इसके बावजूद पार्टी में टिके रहना उनकी मजबूरी है। ताज्जुब इस बात का है कि कुछ तो अभी सियासी तौर पर उम्र के परिपक्व होने की दहलीज पर हैं और उनकी पिछले कुछ समय की दशा देख कर लगने लगा है कि वे अंतिम पारी और मैच समाप्ति से कुछ समय पहले की बल्लेबाजी हांफते हुए कर रहे हैं। पार्टी में उनको वह सम्मान और तरजीह कतई मिलती नहीं दिख रही है, जिसके वे हकदार हैं। तस्वीर का यह पहलू देख कुछ लोग उनकी कुर्सी पर नजर गड़ाने लगे हैं, जबकि सियासी विश्लेषक यह अंदाज लगाने में जुट चुके हैं कि आगे की राजनीति में कौन से नाम उनकी जिम्मेदारियों को संभालने का दम रखते हैं या केंद्र किनको उनका उत्तरदायित्व सौंपता है।

उत्तराखंड राज्य का गठन जब हुआ था तो मुख्यमंत्री के लिए जिन नामों की चर्चा बीजेपी की अंतरिम सरकार के लिए हुई थी, उनमें बीसी खंडूड़ी का नाम सबसे आगे था। उनके साथ ही भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक का नाम भी खूब उछल रहा था। पार्टी हाई कमान ने सबको चौंकाते हुए नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बना डाला था। उस वक्त पीछे छूट गए तीनों नामों ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर मुख्यमंत्री बनने के लिए नहीं छोड़ी। इसका लाभ भी तीनों को मिला। तीनों बारी-बारी से बाद में मुख्यमंत्री बने। जब स्वामी को अंतरिम सरकार के दौरान ही हटना पड़ा तो कोश्यारी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। कोश्यारी दोबारा भी मुख्यमंत्री बन जाते, लेकिन पार्टी प्रदेश के पहले ही विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड राज्य देने के बावजूद कांग्रेस के हाथों शिकस्त का वरण कर बैठी।
कोश्यारी को इसका नुकसान बाद में होता रहा। 2007 में जब बीजेपी फिर से सरकार में आई तो कोश्यारी के नाम पर खंडूड़ी को तरजीह दी गई। उस वक्त मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत कोश्यारी के मरजीवड़ों में शुमार होते थे। पैसिफिक होटल में जब मुख्यमंत्री के नाम के लिए खंडूड़ी का नाम सामने आया तो त्रिवेंद्र और खटीमा विधायक पुष्कर सिंह धामी उन लोगों में शुमार हुए थे, जिन्होंने खंडूड़ी की कार पर गुस्से में लात मारी थी। आज भले कोश्यारी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन त्रिवेंद्र उनकी राह में आ गए। कोश्यारी आज नैनीताल से सांसद हैं, और खंडूड़ी पौड़ी से। दोनों मुख्यमंत्री बनने की चाह रखते हैं लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने उनके भविष्य को लेकर फैसला कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भले यह कह दिया है कि अहम सरकारी पदों के लिए 75 साल की आयु सीमा वाली बंदिश नहीं है पर अघोषित तौर पर यह या तो है या फिर नहीं भी है तो खंडूड़ी और कोश्यारी फिलहाल पार्टी की प्राथमिकता सूची से बाहर हैं। खंडूड़ी को जिस तरह शाह के दौरे में स्थानीय नेताओं ने ही सीट न देकर अपमानजनक दोराहे पर खड़ा कर दिया था, वहीं, शाह ने भी किसी को इसके लिए न डांट कर खंडूड़ी को सन्देश दे दिया है कि वह अपना पौने दो साल का हनीमून पीरियड गुजार लें। फिर उनका नंबर चुनाव लडऩे के लिए आ पाना मुश्किल दिखता है।
खंडूड़़ी नहीं तो फिर कौन उनकी जगह पौड़ी से लड़ेगा? यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इसमें शक नहीं कि पौड़ी सीट पर आज की तारीख में खंडूड़ी से बड़ा प्रत्याशी पार्टी के पास नहीं है। यह बात अलग है कि केन्द्रीय नेतृत्व इस तथ्य को कितना मानता है। उसके लिए तो हर सीट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण मिली। प्रत्याशियों का कोई असर ही नहीं था। एक फीसदी यह मान लिया जाए कि खंडूड़ी का टिकट अगले लोकसभा चुनाव में कट जाएगा तो फिर उनके विकल्प के तौर पर किसी पूर्व सैन्याधिकरी को ही मैदान पर उतारना होगा। आज के सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत राजनीति में उतरेंगे या नहीं कोई नहीं जानता, लेकिन पौड़ी के रहने वाले बिपिन चुनाव तक रिटायर हो चुके होंगे। ऐसे में उनको बीजेपी मैदान में उतार दे तो आश्चर्य नहीं होगा। अपने आक्रामक बयानों के कारण जनरल रावत देश में लोकप्रिय भी हैं। साथ ही उनका मिलनसार स्वभाव सियासत में उनको सफल बना सकता है। अभी देहरादून दौरे पर उनकी निशंक के साथ काफी देर मुलाकात हुई थी। हालांकि, दोनों एक स्कूल के समारोह में मिले थे, लेकिन लम्बी मुलाकात को अन्य अर्थों से भी देखा गया।
इतना जरूर है कि खंडूड़ी अभी भी पहाड़ की सियासत में बहुत बड़ा नाम है। उनको इस कदर आसानी से किनारे लगा पाना हिम्मत का फैसला होगा। यही हाल कोश्यारी के मामले में है। सियासी सांझ देख रहे कोश्यारी को केंद्र सरकार में मंत्री न बनाकर मोदी ने यह सन्देश तो दे दिया कि उनकी निगाहों में कोश्यारी की अहमियत खास नहीं रह गई है। कोश्यारी आज भी पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं। उनको नाराज करने से पार्टी को नुकसान ही हो सकता है। इसके कारण नेतृत्व के लिए उनके बारे में अभी से अंतिम फैसला करना आसान नहीं होगा। उनकी जगह कौन लेगा, यह भी बड़ा सवाल है। इतना जरूर है कि कोश्यारी को अपने भविष्य का आभास हो चुका है। शाह के दौरे के दौरान वह उनके रात्रिभोज और बैठक में आए भी नहीं थे। खंडूड़ी भी नहीं आए थे। दोनों की नाराजगी को इसके पीछे देखा गया था। निशंक को युवा और प्रतिभावान समझा जाता है और उनके मुख्यमंत्रित्वकाल को खराब भी नहीं कहा जाता है। उनकी छवि पार्टी में ही कुछ लोगों ने आपसी सियासत के चलते इस कदर खराब कर दी है कि निशंक के लिए लोकसभा चुनाव में फिर से टिकट हासिल करना तक सरल नहीं रह गया है। पिछले चुनाव में बाबा रामदेव का नाम उनको टिकट दिलाने में आया था। रामदेव की कितनी चलती है मोदी के आगे, अगले चुनाव में टिकट के लिए, यह निशंक को टिकट मिलने या न मिलने से पता चल जाएगा।
निशंक की कुर्सी पर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक की नजर बताई जाती है। कौशिक पहले भी लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए बहुत हाथ-पैर मारते रहे हैं। निशंक को अगर हरिद्वार सीट पर टिकट के लिए कोई कड़ी टक्कर दे रहा है तो कौशिक ही वह शख्स है। इसके चलते भी दोनों नेताओं में परस्पर खास बनती नहीं है। टिहरी सीट से सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी, जो टिहरी राज घराने से हैं, इस वक्त प्रदेश के पांच सांसदों में सबसे कम लोकप्रिय हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह सिर्फ चुनावों में दिखाई देती हैं। फिर गायब हो जाती हैं। उनको लेकर पार्टी में भी बहुत नाराजगी है। उनका टिकट काटा जाता है तो विकासनगर से विधायक मुन्ना सिंह चौहान टिकट के लिए लाइन पर हैं। चौहान को काबिल नेताओं में शुमार किया जाता है। वह लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए बहुत इच्छुक रहते हैं। महारानी राज्यलक्ष्मी को इस बात का फायदा मिलता है कि टिहरी के महाराजा का बहुत सम्मान है। उनको भगवान बदरीनाथ का अवतार माना जाता है। ऐसे में उनको बिना किसी मेहनत के पडऩे वाले वोटों का बहुत सहारा चुनाव जीतने में मिलता है। अगर किसी के टिकट को लेकर कोई संशय नहीं दिखता है तो वह केन्द्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा हैं। वह अल्मोड़ा से सांसद हैं। बाकी चार नामों को धक्का मारने के लिए पार्टी में ही बहुत लोग मौजूद है। इतना तो आला कमान ने इन चारों में से किसी को भी केंद्र सरकार में मंत्री न बना कर जतला दिया कि उसके लिए इन पर दांव लगाना फायदे का सौदा कहीं से नहीं है। दूसरी पीढ़ी को यह सन्देश समझ में आ चुका है, इसलिए वे अंदरखाने चारों को धक्का दे कर मैदान से बाहर करने लगे हैं।

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