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 …तो क्या 2019 बनेगा मोदी के लिए चुनौती

राजनीति का कितना ही मझा खिलाड़ी क्यों न हो, जरूरी नहीं है कि राजनीति की बिसात पर उसे हमेशा शह ही मिले। राजनीति में हर पल बदलते माहौल से कई बार राजनीतिक पंडित भी हैरान हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ वर्तमान परिदृश्य में दिख रहा है। दो महीने पहले राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि पीएम मोदी को 2019 में हराने का बूता किसी सियासी दल में नहीं है, लेकिन अभी जो हालात बने हैं उसने राजनीतिक  पंडितों के साथ-साथ आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा के खेमे में भी चिंता पैदा कर दी है। पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा सीट पर भाजपा की हार और गुजरात में भाजपा की खराब हालत से भाजपा की चिंता बढऩा स्वाभाविक है। नोटबंदी, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और देश की गिरती अर्थव्यस्था ने मोदी सरकार की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। मोदी के समक्ष बढ़ती चुनौतियां को देखकर विपक्ष खुश है तो मोदी-शाह की बेचैनी बढ़ गई है। राजनीति का कितना ही मझा खिलाड़ी क्यों न हो, जरूरी नहीं है कि राजनीति की बिसात पर उसे हमेशा शह ही मिले। राजनीति में हर पल बदलते माहौल से कई बार राजनीतिक पंडित भी हैरान हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ वर्तमान परिदृश्य में दिख रहा है। दो महीने पहले राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि पीएम मोदी को 2019 में हराने का बूता किसी सियासी दल में नहीं है, लेकिन अभी जो हालात बने हैं उसने राजनीतिक  पंडितों के साथ-साथ आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा के खेमे में भी चिंता पैदा कर दी है। पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा सीट पर भाजपा की हार और गुजरात में भाजपा की खराब हालत से भाजपा की चिंता बढऩा स्वाभाविक है। नोटबंदी, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें और देश की गिरती अर्थव्यस्था ने मोदी सरकार की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। मोदी के समक्ष बढ़ती चुनौतियां को देखकर विपक्ष खुश है तो मोदी-शाह की बेचैनी बढ़ गई है। 

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी को तीन अलग-अलग राज्यों से एक ही दिन में तीन बुरी खबरें मिलीं। सबसे खराब खबर पंजाब से मिली जहां गुरदासपुर लोकसभा सीट उसके हाथ से निकल गई। यहां कांग्रेस प्रत्याशी सुनील जाखड़ ने जीत दर्ज की है। दूसरी बुरी खबर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मिली, जहां छात्रसंघ चुनाव में पांच शीर्ष सीटों में से चार पर सपा ने जीत दर्ज की। तीसरी खबर केरल की वांगेर विधानसभा सीट से मिली, जहां अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के दौरे के बावजूद पार्टी प्रत्याशी उतने वोट भी नहीं पा सका जितने पिछले चुनाव में मिले थे। यह खबरें भाजपा की चिंता बढ़ाने के लिए काफी है। गुरुदासपुर सीट पर बुरी तरह से पराजय के बाद पार्टी यूपी की गोरखपुर और फूलपुर सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव को लेकर खासी सतर्क हो गई है। इन सीटों के उपचुनाव भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। पिछले कुछ महीनों में भाजपा के समक्ष अनेक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इन चुनौतियों से जूझ पाना मोदी सरकार के लिए आसान नहीं है क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव है। नवंबर 2016 में सरकार के नोटबंदी के मार से लोग हलकान ही थे कि जुलाई 2017 में जीएसटी ने लोगों को समस्या को बढ़ा दिया। जीएसटी से सबसे ज्यादा परेशान छोटे व्यापारी हैं जो दशकों से भाजपा के कट्टïर समर्थक रहे हैं। तो क्या 2019 में ये व्यापारी मोदी से किनारा कर सकते हैं, ऐसे बहुत से सवाल राजनीतिक पंडितों के जेहन में आ रहे हैं। हालांकि उनका यह भी कहना है कि सब अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। यदि मोदी अगले कुछ महीनों में मंदी दूर कर पाते हैं तो फिर से हवा का रुख उनके पक्ष में हो सकता है और अगर मंदी रहती है और बेरोजगारी बढ़ती है, तो वे हार भी सकते हैं।  भाजपा के खिलाफ जो विपरीत माहौल बन रहा है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अंजान नहीं है। उन्हें इसका पूरा अंदाजा है कि परिस्थितियां बदल रही है, मोदी की लोकप्रियता घट रही है। यदि ऐसा न होता तो गुजरात, जो मोदी का गढ़ है एक महीने में चार बार न जाना पड़ता। गुजरात चुनाव मोदी की प्रतिष्ठïा से जुड़ा है। 15 साल से वहां भाजपा सत्ता में हैं। गुजरात मॉडल के नाम पर बीजेपी देश के अन्य राज्यों में वोट मांगती आयी है। यदि गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी अच्छा नहीं कर पाती तो इसका खामियाजा उसे लोकसभा चुनाव 2019 में भी भुगतना पड़ सकता हैं। राजनीतिज्ञ गुजरात के चुनाव को खासतौर पर लोकसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट मान रहे हैं। गुजरात के अलावा हिमाचल प्रदेश समेत अन्य कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है। विधानसभा चुनाव के नतीजे काफी हद तक लोकसभा चुनाव की तस्वीर साफ कर देंगे।  जाहिर है भाजपा के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं है। नोटबंदी और जीएसटी की मार से आहत जनता को फिर से भाजपा को अपने पक्ष में लाना है। आर्थिक मंदी दूर करनी है। अर्थव्यवस्था के मोर्चें पर केन्द्र सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं लेकिन वह सब कुछ कितनी जल्दी सामान्य कर पायेंगे यह देखना दिलचस्प होगा। पीएम मोदी अपनी सरकार के योजनाओं का चाहे कितना गुणगान कर लें लेकिन आने वाला समय उनके लिए और न ही भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किए थे। उसमें काला धन वापस लाना, गरीबों के खाते में 15 लाख रुपए जैसे कई बड़े वादे उनका आज भी पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। जाहिर है विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर भाजपा को घेरने की कोशिश करेगा। 

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