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केदार बाबा के दर पर मोदी का होने का मतलब !

देहरादून। दिवाली मनाने में उत्तराखंड के नौकरशाह, जिनमें आईएएस और आईपीएस ही नहीं बल्कि अन्य काडर के अफसर भी, जो परस्पर काफी घुले-मिले होते हैं, बिल्कुल भी पीछे नहीं रहते हैं। उनका साथ देने वालों में कुछ विधायक भी होते हैं, जो उनके लिए राजनेता कम और मित्र ज्यादा होते हैं। दिवाली का मतलब अगर आप आतिशबाजी, पटाखे छोडऩा और मिलजुल कर पूजा करना समझ रहे हैं, तो गलतफहमी पाले हुए हैं। नौकरशाहों की एक बड़ी जमात के लिए हर साल दिवाली का मतलब होता है, जमकर रात भर तीन पत्तियां खेलना। यह खेल दिवाली से कई दिन पहले शुरू हो जाता है और फिर दिवाली तक जम कर चलता है। इस खेल और जुए को लेकर नौकरशाहों में खूब रुझान रहता है। इस बार इनमें से कइयों की उम्मीदों और रोमांच पर पानी फिर गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक केदारनाथ दर्शन का कार्यक्रम बनाया और ज्यादातर अफसर, जिनमें छोटे से लेकर बड़े तक शामिल थे, के साथ मंत्री व विधायक तक इसमें उलझ कर रह गए। किसी की समझ में नहीं आया कि आखिर प्रधानमंत्री के मन में ऐसा क्या आया कि दिवाली के अगले दिन ही केदारबाबा के दर्शन करने आ गए। एक नौकरशाह जो लगातार प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की ड्यूटी पर रहे, ने कहा, हमारी दिवाली तो काली हो गई और हमने बर्फीले पहाड़ में दिवाली की रात गुजारी।

अफसरों और नेताओं में दिवाली के दौरान ताश का जुआ किस कदर छाया रहता है, इसकी एक मिसाल यह है कि पिछले साल एक विधायक ने खुद बताया कि वह पिछली रात 25 लाख रुपये हार गए। उनको उस दिन कहीं जाना था,लेकिन जो हार गया उसकी वसूली के लिए कार्यक्रम स्थगित कर अगले दिन फिर जुए में बैठे। उनके साथ बैठने वालों में अफसर राजनेता सभी थे। जुआ अफसरों के घरों में ही खेला जाता है, ऐसा खुद उन्होंने बताया। घरों में पीने-पिलाने और खाने का पक्का बंदोबस्त रहता है। इस पल का इन्तजार सभी बेसब्री से करते हैं। यही वजह है कि अफसरों को मोदी के आने से अपने दिवाली और छुट्टियां खराब होने का बहुत दर्द सालता दिखा। यह बात वाकई समझ से बाहर की रही कि ऐसे वक्त पर जब, केदारनाथ में लोग ही नहीं बल्कि पुजारी और कारोबारी वगैरह भी चले जाते हैं, आखिर प्रधानमंत्री क्यों अचानक आए? मोदी आए और उन्होंने धाम में ही जनसभा भी कर डाली, जो पूरी तरह राजनीतिक रही। उन्होंने अनेक विकास संबंधी घोषणाएं कर डालीं। लगे हाथों पिछली कांग्रेस सरकार को विकास न होने का कसूरवार ठहराने में भी हमेशा की तरह बिलकुल नहीं चूके।
मोदी के केदारनाथ दर्शन को पार्टी के लोग महज धार्मिक और निजी करार दे रहे हैं, लेकिन कहीं से भी नहीं लगा कि यह निजी आयोजन था। होता तो प्रधानमंत्री ने जनसभा क्यों की? विकास की घोषणाएं क्यों करते। उन्होंने हर वह घोषणा करने की कोशिश की, जो खास धर्म के लोगों को प्रभावित कर सकती हैं। आदि शंकराचार्य की समाधि चार साल पहले आई विध्वंसकारी बारिश में तबाह हो गई थी। मोदी ने उसका पुनर्निर्माण करने का ऐलान तो किया ही, साथ ही पूरे धाम का पुनर्निर्माण भी कराने का वादा किया। यह बात अलग है कि पुनर्निर्माण का काम पहले ही शुरू हो चुका था। मोदी राज में ही इस पर रोक लग गई थी। पुरोहितों के लिए बिजली कटौती रहित मकान देना और सडक़ों का निर्माण करना भी उनकी घोषणाओं में शुमार रहा। क्या प्रधानमंत्री के लिए निजी दौरे में यह सब घोषणाएं करना जरूरी या उचित था? उनका दौरा राजनीतिक स्पर्श लिए हुए था। इसकी मिसाल यह भी है कि मोदी की धाम में मौजूदगी और दर्शन के दौरान बद्री-केदार विकास परिषद के अध्यक्ष गणेश गोदियाल को निमंत्रित ही नहीं किया गया। कांग्रेस राज में अध्यक्ष बने पूर्व कांग्रेस विधायक गोदियाल मुंबई में थे। उन्होंने पूछने पर बताया कि उनको मुख्य कार्यकारी अधिकारी का अनौपचारिक फोन आया था कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम है। यह सूचना भर थी। मुझे बुलाया ही नहीं गया। यह अजीब बात है कि सरकार ने परिषद के अध्यक्ष को बुलाना उचित नहीं समझा।
मोदी का यह दौरा सरकार के साथ ही बीजेपी के बड़े नेताओं के लिए भी मुसीबत पैदा कर गया था। उनके लिए जनसभा में लोगों को खींचकर लाना चुनौतीपूर्ण लक्ष्य हो गया था। अफसरों, जिनमें मंडलायुक्तदिलीप जावलकर और डीआइजी पुष्पक ज्योति थे, का दूसरा घर रुद्रप्रयाग हो गया। बीजेपी के प्रमुख नेताओं को डेरा डालना पड़ा। इतना ही नहीं मोदी के कार्यक्रम को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए सरकार और पार्टी के पास वक्त भी हफ्ते भर का ही था। किसी भी बीजेपी नेता के पास इस बात का सटीक जवाब नहीं था कि ऐसी अफरा-तफरी में मोदी क्यों आ रहे हैं। अनाधिकृत तौर पर जरूर पार्टी के लोग यह अंदाज लगाने से नहीं चूके कि पौने दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव और नोटबंदी तथा जीएसटी के कारण देश भर में बीजेपी और केंद्र सरकार को लेकर बदले हालात को देखते हुए मोदी अब कोई भी जोखिम चुनाव को लेकर नहीं लेना चाहते हैं। वह हर राज्य में लगातार ऐसी जगह जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनको ज्यादा प्रचार और पार्टी को फायदा मिले। केदारनाथ दर्शन का ज्यादातर टीवी चैनलों ने जिस तरह लाइव प्रसारण दिखाया, उसको देख कर लगा भी कि इससे मोदी और बीजेपी को फायदा मिले न मिले, लेकिन उनकी कोशिश कुछ ऐसी ही है।
मोदी इसी साल मई में भी केदारनाथ के दर्शन के लिए आए थे। इतनी जल्दी-जल्दी प्रधानमंत्री का एक ही धाम में आना कोई संयोग भर नहीं कहा जा सकता है। सियासी विश्लेषक और मीडिया का मानना है कि मोदी ने उत्तराखंड में अपना सियासी अभियान चालू कर दिया है। अगले लोकसभा चुनाव में वह पांच में से एक भी सीट गंवाने का जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। उत्तराखंड उनका आना-जाना अब लगा रहेगा। आने वाले दिनों में वह उत्तराखंड के लिए कई बड़ी घोषणाएं कर दें तो अचम्भा नहीं होगा। अभी पांचों सीटें बीजेपी के पास हैं। जिस तरह मोदी उत्तराखंड को अचानक ही तवज्जो देने लगे हैं, उसके पीछे उनके सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को भी माना जा रहा है, जो पौड़ी के हैं। यह कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री के असली सलाहकार डोभाल ही हैं। वह रक्षा के साथ ही प्रशासनिक मामलों में भी मोदी के प्रमुख सलाहकार समझे जाते हैं। दिल्ली के गलियारों में यही हल्ला है। उनकी राय से ही मोदी उत्तराखंड को पूरी तवज्जो दे रहे हैं। हल्ले में सच्चाई इसलिए भी लगती है कि इसी सरकार में सेना प्रमुख, रॉ प्रमुख, कोस्टगार्ड प्रमुख, महानिदेशक (सैन्य ऑपरेशन) सरीखे अहम् कुर्सियां उत्तराखंडियों को मिलीं। उत्तराखंड के लोग पहले से ही प्रतिभावान और क्षमतावान रहे हैं। उनको कभी उनका हक नहीं मिला। सिर्फ इसी सरकार में उनकी योग्यता सामने आ रही है। डोभाल को मोदी और बीजेपी प्रमुख अमित शाह के बाद तीसरे नंबर का समझा जाता है। अंडमान और निकोबार के उपराज्यपाल की कुर्सी पर पूर्व नौसेना प्रमुख देवेन्द्र कुमार जोशी की ताजपोशी के पीछे भी डोभाल की ही भूमिका देखी जा रही है। ये मिसालें बताती हैं कि मोदी सरकार के लिए उत्तराखंड को नजरअंदाज करना आसान नहीं रह गया है। भले पैसे के मामले में केंद्र से राज्य को उतनी मदद नहीं मिल रही जितनी कि उम्मीद की जा रही थी और अहम पदों पर नियुक्तियों, देहरादून को कांग्रेस राज में स्मार्ट सिटी का दर्जा देने में लटकाए रखकर बाद में बीजेपी सरकार आने पर स्मार्ट सिटी बना देने, पहाड़ों में रेलगाड़ी पहुंचाने की योजना बनाने और बार-बार केदारनाथ बाबा के प्रधानमंत्री के दर्शन इंगित कर रहे हैं कि मोदी अगले लोकसभा चुनावों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त तो कतई नहीं हैं। इसके चलते आने वाले दिनों में उत्तराखंड को और भी कई विकास योजनाओं का तोहफा मिल जाए तो ताज्जुब नहीं होगा।

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