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मोदी के निशाने पर देवभूमि

देहरादून। इस बार की दिवाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केदारनाथ यात्रा के कारण मुख्यमंत्री, मंत्रियों और नेताओं के साथ ही नौकरशाहों की पूरी तरह फीकी हो गई थी। मोदी दिवाली के अगले ही दिन सुबह-सुबह केदारनाथ धाम पर पूजा अर्चना के लिए पहुंचे थे और इस यात्रा के लिए सरकार को हफ्ते भर पहले से केदारनाथ में जुटना पड़ा था, जिससे कोई कमी प्रधानमंत्री के दौरे में न रह जाए। यह बात अलग है कि मोदी की यात्रा कई बातों के चलते विवादित हो गई, जिसमें धूप का चश्मा पहन कर पूजा करना और धाम स्थल पर जनसभा करना या फिर धाम की तरफ पीठ दिखा कर लोगों को संबोधित करना। खैर अभी मोदी दिल्ली पहुंचे ही थे कि फिर खबर आ गई कि वह मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री भारतीय प्रशासनिक अकादमी में आएंगे और रात्रि विश्राम भी करेंगे। मोदी आए और इस बार उन्होंने भले जनसभा नहीं की, लेकिन सूत्रों का कहना है कि राज्य की अंदरूनी सियासत और हालात का उन्होंने न सिर्फ पूरा जायजा तरीके से लिया बल्कि सरकार और पार्टी में लगातार बेहतर कदम उठाए जाते रहने संबंधी निर्देश मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष अजय भट्ट को दिए। अब सवाल यह उठ रहा है कि हफ्ते भर में मोदी की दो यात्रा के पीछे कोई सियासी मकसद था या फिर यह महज संयोग भर था?

सियासी विश्लेषकों के साथ ही मीडिया में सियासत पर कड़ी नजर रखने वाले पत्रकारों का मानना है कि बेहद व्यस्त रहने वाले और गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बावजूद मोदी का देहरादून और उत्तराखंड आना यूं ही नहीं है। वह निजी तौर पर यहां आकर न सिर्फ पार्टी के कुछ प्रमुख लोगों से मिले बल्कि उनसे सरकार और पार्टी के हाल के बारे में भी जानकारी ली। गुजरात और हिमाचल में तो अब जो होना है, वह होकर रहेगा, लेकिन मोदी कभी नहीं चाहेंगे कि उत्तराखंड में जहां, उनकी पार्टी की सरकार है और पांचों लोकसभा सीट उनके पास है, में डेढ़ साल बाद होने वाले लोक सभा चुनाव में एक भी सीट झोली से बाहर जा गिरे। एक भी सीट का खोना उनकी प्रतिष्ठा पर चोट और हार होगी। वह इस सच्चाई को समझते हैं। इसीलिए वह अचानक ही उत्तराखंड की सियासत और सरकार चलाने के तरीके पर भी करीबी नजर रखने लगे हैं और पूरी दिलचस्पी इस छोटे से राज्य में ले रहे हैं। यह महज संयोग भर नहीं हो सकता कि मोदी के केदारनाथ के विवादित दौरे के तुरंत बाद ही राज्य के मुख्य सचिव और कुछ चर्चित नौकरशाहों की छुट्टी चौंकाने वाले अंदाज में कर दी जाए। कहा जा रहा है कि अपनी यात्रा के दौरान हुए विवादों, जिसमें योजनाओं से सम्बंधित शिलापट्ट पर कुछ मंत्रियों के नामों का छूट जाना भी शामिल है, को लेकर प्रधानमंत्री खुश नहीं थे। यह मुमकिन बताने वाले कई हैं जिनका मानना है कि मोदी के इशारे पर ही मुख्य सचिव रामास्वामी और पर्यटन तथा धर्मस्व सचिव मीनाक्षी सुन्दरम की आकस्मिक विदाई हुई। इतना ही नहीं मसूरी देहरा विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की कुर्सी से विनय शंकर पाण्डेय को चलता करने के पीछे भी शीर्ष स्तर पर ही खेल हुआ। विनय भले पीसीएस से आईएएस बने हों, लेकिन कार्य शैली के मामले में उनकी छवि नियमित सेवा वाले आईएएस अफसरों की तरह ही है। बीजेपी में कई बिल्डरों की पहुंच अच्छी-खासी है। पाण्डेय ने बिल्डर लॉबी को कसकर रखा हुआ था। इसके चलते बिल्डर उनको हटवाना चाहते थे। जिसमें वे सफल हुए।
सूत्रों के मुताबिक यह तो अभी ट्रेलर है। मोदी उत्तराखंड के बारे में हर छोटी-छोटी जानकारी रख रहे हैं और जरूरत पडऩे पर कदम भी उठा रहे हैं और उठाएंगे। मोदी के लिए उत्तराखंड की कितनी अहमियत है, यह इससे समझा जा सकता है कि सेना, रॉ, सैन्य ऑपरेशन, कोस्टगार्ड और सीबीआई के मुखिया की कुर्सी पर इस वक्त इस छोटे से किशोर पहाड़ी राज्य की प्रतिभाएं काबिज हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल तो उनकी आंख-नाक, कान और मुख्य सलाहकार तो हैं ही। यह उत्तराखंड का सुनहरा दौर या युग भी कहा जा सकता है। ऐसा नहीं कि उत्तराखंड में प्रतिभाओं की पहले कमी रही, लेकिन मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने उत्तराखंड की प्रतिभाओं को पहचाना और उनको उनकी काबिलियत के मुताबिक जिम्मेदारी सौंपी। यह साबित करता है कि मोदी के लिए उत्तराखंड बहुत अहम है। यहां वह किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करने वाले हैं और लगातार पैनी निगाह यहां रख रहे हैं।
वह मंत्रियों के कामकाज पर भी लगातार रिपोर्ट ले रहे हैं। बेहतर और प्रभावशाली कार्य करने वाले मंत्रियों को वह तवज्जो भी दे रहे हैं। केदारनाथ दौरे पर उन्होंने ढेरों मंत्रियों की उपलब्धता के बावजूद उस डॉ. धन सिंह रावत को दौरे का प्रभारी बनाना पसंद किया, जो अभी राज्यमंत्री हैं और सरकार में उनका अनुभव पहला है। अहम बात करने के लिए भी उन्होंने कुछ मौकों पर धन सिंह को ही चुना। इससे धन सिंह का कद अचानक ही बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह बात अलग है कि छोटे कद के इस राज्यमंत्री का लोहा पार्टी सालों से मानती आ रही है। यह भी समझा जाता है कि धन सिंह जब चाहेंगे तब कैबिनेट मंत्री बन जाएंगे। वह खुद ही अभी राज्यमंत्री रहना चाहते हैं। वैसे भी उनको स्वतंत्र प्रभार मिला हुआ है। कहा तो यह भी जा रहा है कि नए मुख्य सचिव के तौर पर उत्पल को भेजने के पीछे भी प्रधानमंत्री सचिवालय की अहम भूमिका है। वह सरकार के अगर कामकाज पर नजर भी रखेंगे और पीएमओ को अपडेट भी देते रहेंगे। अगर यह सच्चाई है तो उत्पल के तौर पर उत्तराखंड को अब तक का सबसे शक्तिशाली मुख्य सचिव भी मिल गया है, जो मोदी की पसंद का है। हालांकि, इस तथ्य की अभी पुष्टि होनी है। सूत्रों के मुताबिक मोदी उत्तराखंड पर इस कदर दिलचस्पी दिखा रहे हैं कि त्रिवेंद्र सरकार को एक साल पूरा होते-होते अगर वह मंत्रिपरिषद में कुछ फेरबदल के लिए त्रिवेंद्र को निर्देश दे दें तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। खास तौर पर कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों पर बीजेपी हाई कमान और केंद्र सरकार की ज्यादा निगाह है। उत्तराखंड पर मोदी सिर्फ नजर ही नहीं रख रहे हैं बल्कि वह आने वाले महीनों में और भी दौरे उत्तराखंड के कर सकते हैं, ऐसा माना जा रहा है। हो सकता है कि अगली बार वह कुमायूं की ओर रुख करके वहां का भी सियासी जायजा ले।

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