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सियासत के केन्द्र बने ‘पटेल’ 

जिस तरह राजनीतिक दलों में भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को लेकर घमासान मचा है वह काफी दिलचस्प है। पटेल से राजनीतिक पार्टियों का प्रेम ऐसे ही नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में काफी बदलाव आया है। उस बदलाव में देश की महान विभूतियों के सहारे राजनीति भी करना शामिल है। सत्ता में आने के बाद से जिस तरह से भाजपा ने अंबेडकर और सरदार पटेल को अपने पाले में कर उनके गुणगान कर रही है उससे अन्य राजनीतिक दल भी उस राह पर चलने को मजबूर हो गए है इसीलिए महान विभूतियों पर राजनीति तेज हो गई है। और तो और पटेल पर सियायत कर कुर्मी वोट बैंक की चाहत में राजनीतिक दलों को यह भी याद नहीं कि आखिर पटेल की राजनीतिक पृष्ठïभूमि क्या थी? हो भी  क्यों? आज की राजनीति में शुचिता की जगह ही कहां बची है। दलों को सिर्फ और सिर्फ अपने वोट से सरोकार है।  स तरह राजनीतिक दलों में भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को लेकर घमासान मचा है वह काफी दिलचस्प है। पटेल से राजनीतिक पार्टियों का प्रेम ऐसे ही नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में काफी बदलाव आया है। उस बदलाव में देश की महान विभूतियों के सहारे राजनीति भी करना शामिल है। सत्ता में आने के बाद से जिस तरह से भाजपा ने अंबेडकर और सरदार पटेल को अपने पाले में कर उनके गुणगान कर रही है उससे अन्य राजनीतिक दल भी उस राह पर चलने को मजबूर हो गए है इसीलिए महान विभूतियों पर राजनीति तेज हो गई है। और तो और पटेल पर सियायत कर कुर्मी वोट बैंक की चाहत में राजनीतिक दलों को यह भी याद नहीं कि आखिर पटेल की राजनीतिक पृष्ठïभूमि क्या थी? हो भी  क्यों? आज की राजनीति में शुचिता की जगह ही कहां बची है। दलों को सिर्फ और सिर्फ अपने वोट से सरोकार है।  

देश में विरासत पर सियासत का नया चलन शुरू हो गया है। सभी राजनीतिक दल किसी न किसी महापुरुष को केन्द्र में रखकर सियासत करने में जुटे हुए हैं। कांगे्रस गांधी-नेहरू परिवार को केन्द्र बिंदु में रखे हुए है तो भाजपा दीनदयाल उपाध्याय को लेकर चल रही है। समाजवादी पार्टी जय प्रकाश नारायण और डा. राम मनोहर लोहिया के नाम को भुना रही है तो बसपा डा. भीम राव अंबेडकर को। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राजनीति में महापुरुषों को अपने पाले में करने की होड़ मची हुई है। कोई अपनी विरासत नहीं समेट पा रहा है तो कोई विरासत को छीन रहा है। कांगे्रेस लौह पुरुषसरदार वल्लभभाई पटेल को अपना बताती है लेकिन भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने उनकी उपेक्षा की। अब हालत यह हो गई है कि पटेल सियासत का केंद्र बिंदु बन गए हैं। कांग्रेस और भाजपा के  बीच अक्सर पटेल को लेकर जुबानी युद्ध होता रहता है। इसकी शुरुआत लोकसभा चुनाव से पहले ही हुई थी।  पिछले दिनों पटेल की जयंती के मौके पर भाजपा ने पूरे देश में ‘रन फॉन यूनिटी’ कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। पूरे देश में इस मौके पर जिस तरह से बढ़-चढक़र कार्यक्रम हुए उससे कांग्रेस खेमे की चिंता बढ़ गई। वहीं इस बार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी बड़े स्तर पर लौह पुरुष की जयंती मनायी। इस मौके पर कांग्रेस के नेताओं ने भी उन्हें याद किया लेकिन सबसे ज्यादा याद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया। इस पर राजनीतिक पंडितों का कहना है कि महापुरुषों के नाम पर सियासत सिर्फ और सिर्फ वोट के लिए हो रहा है। सरदार वल्लभ भाई पटेल देश के पहले गृहमंत्री के साथ-साथ अपने कई कामों के लिए जाने जाते हैं। जाहिर है जो उनका सम्मान करेगा उनके चाहने वाले लोग उधर ही जायेंगे। देश में महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने या उनके नाम पर स्मारक बनाने के चलन से राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हो गई है। राजनीतिक दल बढ़-चढक़र महापुरुषों के अनुयायी बनने के प्रयास में लगे हुए  हैं। अच्छा यह होता कि राजनीतिक दल महापुरुषों के विचारों को आत्मसात कर उनके आचरण को जीवन में उतारते तो शायद यह उन महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होती, किन्तु देश के समूचे राजनैतिक परिदृश्य में ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा है ?  भारत की राजनीति में महापुरुषों को वोट जुटाने का साधन बनाकर सियासी दल जिस तरह का खेल खेल रहे हैं, उसे उचित नहीं कहा जा सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान कर उन्हें सियासत के केन्द्र बिंदु में ला दिया था। उसके बाद से लगातार मोदी पटेल को राजनीतिक बहस के केन्द्र बिंदु में लाने में लगे हुए हैं। हालांकि वह अपनी इस योजना में कामयाब होते दिख रहे हैं। मोदी ने जब सरदार पटेल की मूर्ति बनाने की घोषणा की थी तो कांग्रेस विरोध में उतर पड़ी थी। कांग्रेस ने कहा था कि पटेल ने ही सबसे पहले आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था, इसलिए संघ, भाजपा या मोदी उन्हें अपना कैसे बता सकते हैं। दोनों ओर से वाकयुद्ध चला था। फिर भी सच तो यही है कि कांग्रेस या अन्य भाजपा विरोधी दल पटेल को चाहे कितना ही भाजपा या संघ की विचारधारा का विरोधी साबित करने की कोशिश करें लेकिन मोदी अपने समर्थकों ही नहीं विरोधियों तक को यह सन्देश देने में सफल रहे हैं कि कांग्रेस ने पटेल को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वह हकदार थे।    इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वाधीनता के बाद सारा देश सरदार पटेल को ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था लेकिन पंडित नेहरू की महत्वाकांक्षा के सामने गांधीजी मजबूर हो गए थे और उनकी इच्छा के चलते पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए। ऐतिहासिक तत्थ्यों के अनुसार 29 अप्रैल 1946 को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन में देश की कुल 15 प्रांतीय और क्षेत्रीय इकाइयों में से 12 ने गांधीजी की इच्छा के विरुद्ध सरदार पटेल के नाम पर अपनी सहमति व्यक्त की थी। बाद में गांधीजी के कहने पर ही पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया था।  यदि ऐसा न हुआ होता तो निश्चित तौर पर लौह पुरुष  ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते और शायद तब देश की तस्वीर भी कुछ अलग तरह की होती।      

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