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क्या भ्रष्टाचार बन चुकी है देवभूमि की नियति

(पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य के हालात पर खुला खत लिखा है। वीक एंड टाइम्स उसे जस का तस छाप रहा है)

उत्तराखंड में घोटालों की कहानी हरिकथा के तर्ज पर अनंत है। राज्य बनने के साथ ही यह सिलसिला प्रारंभ हुआ। अभी तक निर्बाध चला आ रहा है। अपने मूल प्रदेश से हमने भूल से कुछ बड़े चर्चित गुण ग्रहण किए, उनमें एक घोटालेबाज होना भी है। यह सिलसिला अंतरिम सरकारों के दौर से प्रारंभ हुआ और रावत राज तक घोटालों के आरोपों से विभूषित हुए हैं। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि हम अपने किस गुण के लिए आने वाले समय में अधिक पहचाने जाएंगे। ईमानदार, कर्मनिष्ठ, सरल, सद्चरित्र,भगवत, मिस उत्तराखंडी के रूप में या घोटालेबाजों के रूप में। अभी तक आठ, नौ मुख्यमंत्री और सरकारें राज्य में बनी हैं। इन सरकारों के मुख्य लोगों में कुछ तो ऐसा रहा होगा कि इस पद तक पहुंचे मगर काजल की कोठरी में कितना ही सयाना जाए, उसके हिस्से में घोटाले की कालिख ही आएगी। कुछ लोग बड़े नाम और काम के साथ आए मगर यहां से विदा हुए। विशुद्ध उत्तराखंडी तर्ज पर हुए घोटालेबाज के रूप में चर्चित होकर।
विशेषकर झारखंड़, छत्तीसगढ़ सरीखे नवोदित राज्यों के आर्थिक परिदृश्य पर नजर डालिए। प्राकृतिक सम्पदा की कमी के बावजूद उत्तराखंड आर्थिक विकास के मानकों के इंडेक्स में इन राज्यों से अच्छे मुकाम पर खरा है। जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय से लेकर मानवीय सूचकांकों में राज्य में अपने पूर्व राज्य अर्थात उत्तर प्रदेश से बहुत अच्छा किया है। झारखंड के पास प्रचुर खनिज के साथ-साथ पहले से विकसित रांची शहर व एयरपोर्ट सहित विकसित उद्योग सब कुछ था। यही स्थिति छत्तीसगढ़ की भी थी। देश की सभी पूर्वोत्तर रेल मार्ग इन्हीं राज्यों से जाते हैं अर्थात दोनों राज्य पृथक राज्य के सम्मान के लिए पूर्णत: परिपक्वथे। इनकी तुलना में उत्तराखंड के पास खनिज सम्पदा नाम मात्र को है। जल व जंगल की संपदा का दोहन पर्यावरणीय कारणों से बड़ी सीमा तक प्रतिबंधित है। उद्योग नाममात्र के थे। उर्जा के लिए वाह्य स्रोतों पर निर्भर थे। विषम भौगोलिक स्थितियां विकास के लिए बड़ी योजनायें चाहती थी। हवाई व रेल सुविधा भी आंशिक थी। उत्तराखंड को वर्तमान स्थिति तक आने में बहुत कठिन प्रयास करने पड़े। आज हमारे पास एक परिपक्व न्यायपालिका, प्रौढ़ होता हुआ प्रेस व विधायिका है। कार्य करने को उत्सुक ब्यूरोके्रसी है। हम एक उत्साह से भरपूर रहे हैं। वर्ष 2013 में आई राज्यव्यापी भयंकर त्रासदी से उत्तराखंड जिस तरह बहुत कम समय में उभरा वह इसका उदाहरण है।
भुज में आए भूकंप से उबरने में उस क्षेत्र को पांच वर्ष लगे। लातूर में आए भूकंप से उबरने में उस क्षेत्र को चार वर्ष से ज्यादा लगे। परन्तु उत्तराखंड मात्र दो वर्षों में आपदा के घाव भर कर विकास की दौड़ दौडऩे लगा। आज हमारे पास अच्छी क्षमतायुक्त मानव शक्ति है। जिसे थोड़े से सहारे व मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इस सबके बावजूद क्या कारण है है कि हम अपने ही बनाए नेतृत्व पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। हम व्यक्तित्व गढ़ नहीं रहे हैं। विध्वंस कर रहे हैं। राज्य का कौन सा नेता है जिसे सत्ता प्राप्त हुई और उस भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए गए।
हम एक-दूसरे को घोटालों के आरोपों से महिमा मंडित करते आ रहे हैं। जनता भ्रष्टाचार की सारंगी सुन-सुन कर परेशान हो रही है। 16 साल बीत गए। आरोप लगे पर अपराध सिद्ध होने की प्रक्रिया भी प्रारंभ नहीं हुई। कई चर्चित मामले अखबारों की सुर्खियां बने। विधानसभा स्थगन का कारण बने। प्रदर्शन, धरने भी बहुत हुए। राज्यपाल व राष्ट्रपति तक भी मामले पहुंचे। आयोग व एसआईटी गठित हुई। सरकारें भी बदली। मगर आरोप केवल राजनैतिक शिष्टाचार आदान-प्रदान तक सीमित रहे या कभी अखबारों व मैगजीनों के स्तम्भ के रूप में चर्चित हुए। राज्य की पहली निर्वाचित सरकार पर 56 घोटालों के आरोप चस्पा हुए। जिन लोगों पर आरोप लगे, वे सब लोग आज भी सार्वजनिक जीवन में अहम् पदों पर हैं। फिर दूसरी निर्वाचित सरकार में दो व्यक्ति मुख्यमंत्री बने, उन पर 100 से अधिक बड़े-बड़े घोटालों के आरोप चस्पा हुए। आरोप चस्पा करने वाले लोग आज उन्हीं की पार्टी के नेता हैं। जिन पर गंभीर आरोप लगाए थे, उनकी जय बोल रहे हैं। मगर घोटालों के आरोप जस के तस खड़े हैं। फिर तीसरी निर्वाचित विधानसभा ने दो मुख्यमंत्रियों को नवाजा। फिर कई गंभीर आरोप लगे। नए-नए क्लासिकल लययुक्त नारों से विधानसभा गुंजायमान हुई।
अब चौथी निर्वाचित विधानसभा में भी पलायन, गरीबी, क्षेत्रीय असंतुलन, कुपोषण, स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाओं में गिरावट के बजाए भ्रष्टाचार का ही जयकारा लग रहा है। क्या यही हमारी नियति है? भारत के कई राज्य राजनीतिक स्थिरता के साथ सरपट आगे बढ़ रहे हैं। हम भ्रष्टाचार की खुजली को खुजला-खुजला कर आनंदित हो रहे हैं। मैंने प्रयास किए कि विधानसभा के कुछ गंभीर बहसों और भाषणों का अध्ययन करूं ताकि राज्य की भावी दशा व दिशा का सूचकांक ढूंढा जा सके। अभी मेरी खोज जारी है। हमारे पास अच्छी समझ व अध्ययन वाले शानदार वक्ता विधायक है मगर भ्रष्टाचार के कुहासे में उनकी प्रतिभा उभर नहीं हो पा रही है। यह कुहासा है। केदार आपदा घोटाले, शराब, बजरी घोटाले, कुम्भ घोटाले, सिटूर्जिया, आम बाड़, सेलाकुई आईटी पार्क भूमि घोटाला, लघु जल विद्युत परियोजना आवंटन घोटाला, ढेंचा बीज घोटाला, पोली हाउस घोटाला, एनएच-74 घोटाला, चावल घोटाला, सिडकुल, स्टाम्प, ओनिडा जांच घोटाला, बलवीर सिंह व अन्गेलिया घोटाला, पहली विधानसभा निर्माण के लिए खरीद घोटाला, परिसंपत्ति घोटाला, घोटाला-घोटाला-घोटाला, सैकड़ों घोटाले। प्रश्न है क्या इन घोटालों का यह कुहासा कभी छटेगा भी। क्या हम में से कई लोग इन घोटालों के आरोपों के साथ दुनिया से विदा होंगे। मुझे आश्चर्य होता है कि कल तक मुझ पर शराब व बजरी घोटाले के आरोप लग रहे थे। अब वही आरोप और बड़े-बड़े होकर वर्तमान सरकार पर चिपक रहे हैं। मुझ पर डेनिस ब्रांड उत्तराखंड में बिकवाने के आरोप लगे। अब वही डेनिस अपने सहोदर दबंग के साथ बढ़े हुए मूल्य पर शराब प्रेमियों को आनंदित कर रहा है।
मेरे कार्यकाल में बजरी 50 रूपये कुंतल बिक रही थी तो उस पर हरदा टैक्स वसूला जा रहा था। अब वही बजरी 120 रूपये कुंतल बिक रही है। अब भ्रष्टाचार शिष्टाचार हो गया है। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार केवल आरोप प्रत्यारोप है। समाचार पत्रों में सप्रमाण एक मंत्री के पति द्वारा की गई जमीन की हेराफेरी के समाचार छप रहे हैं। गांवों की भूमि बड़ी मात्रा में मुख्यमंत्रियों ने अपनों से जुड़ी संस्थानों को आवंटित कर दी। अब मौन रह गए। 15 साल पहले जो लोग रिक्शे व साइकिल पर चलते थे, उनके पास आज तीन सितारा होटल और रिसॉर्ट्स है। कोठियां हैं। जितनी तेजी से उत्तराखंड बढ़ा, उससे ज्यादा तेजी से नेताओं की पूँजी बढ़ी। ऐसे लोगों की जनता में भी स्वीकार्यता है। तो क्या भ्रष्टाचार होली के रंग जैसा है, जो पड़ता है और जल्द धुल जाता है। मगर एक बात सत्य है कि इन आरोपों प्रत्यारोपों से राज्य की छवि के साथ आम उत्तराखंडी का मनोबल गिर रहा है।
भविष्य में कुहासा और गहरा हो इससे पहले यह छांटना चाहिए। शायद लोकायुक्त भी यह कार्य नहीं कर पाएगा। अभी तो उसका आना ही प्रतीक्षित है। आयोग व सीबीआई मात्र राजनैतिक कलाबाजियां हैं। ऐसी स्थिति में एक मात्र आशा राज्य का हाईकोर्ट नजर आता है। विधानसभा मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करे कि हाईकोर्ट के दो जजों की बेंच को इनमें से चुनींदा घोटालों की जांच सौंप दें और उनके नियंत्रणाधीन एक टीम गठित की जाए जो सभी आरोप विभूषित नेताओं की संपत्ति कि जांच करे, जिससे यह साफ हो सके की उनकी कमाई वैध है या अवैध।

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