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शक्तिशाली होते जा रहे पॉकेट हरक्युलिस

मोदी और शाह के सबसे भरोसेमंद हो कर उभरे धन सिंह

देहरादून। अपनी बिना लाग लपेट के बात कहने और सख्ती तथा अनुशासन को लागू करने की आदत के लिए जाने जाने वाले राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत गुजरते वक्त के साथ शक्तिशाली होते जा रहे हैं। उनकी ताकत का लोहा अब सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि संगठन के लोग भी मानने लगे हैं। आज आलम यह है कि उनके मुख से निकली कोई भी बात आदेश की शक्ल ले रही है और उस पर अमल भी हो रहा है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के उत्तराखंड दौरों में पॉकेट हरक्युलिस कहे जाने वाले धन सिंह को भरपूर तवज्जो दी गई, उससे यह साफ हो गया कि वह केन्द्रीय नेतृत्व के खासमखास हैं। मोदी के केदारनाथ दौरे ने उनकी मजबूती को और बढ़ाया है।
मोदी के केदारनाथ दौरे के दौरान जिस तरह परियोजनाओं से संबंधित शिलापट्ट लगाए जाने के दौरान संबंधित महकमों के मंत्रियों के साथ ही स्थानीय सांसद बीसी खंडूड़ी भी न सिर्फ गायब रहे बल्कि उनके नाम तक शिलापट्ट में नहीं उकेरे गए, उससे जम कर विवाद खड़ा हुआ है और मीडिया में इसकी खूब चर्चा हो रही है। हैरत की बात है कि इससे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि इन शिलापट्टों पर राज्यमंत्री (हालांकि, स्वतंत्र प्रभार है) धन सिंह का नाम हैं। धन सिंह के विभागों से एक भी परियोजना का शिलापट्ट केदारनाथ में नहीं लगा। यह बात अलग है कि राजनीतिक किस्म का कार्यक्रम होने के बावजूद राज्यपाल केके पॉल भी मौके पर थे और शिलापट्ट पर उनका नाम भी अंकित है। धन सिंह की अहमियत के बारे में शायद केन्द्रीय नेतृत्व और खास तौर पर मोदी और शाह ज्यादा जानते हैं। यही वजह है कि केदारनाथ में मोदी को धन सिंह के साथ खास तौर पर कानाफूसी करते भी देखा गया। उनकी कुर्सी मोदी के बगल में लगाई गई थी। सतपाल महाराज पर्यटन और धर्मस्व मंत्री होने के बावजूद इस कार्यक्रम और मोदी के दौरे से दूर रखे गए।
धन सिंह को जुबान बंद रखने वाले नेताओं में शुमार किया जाता है। उनका हाजमा बहुत मजबूत किस्म का है इसलिए जब उनसे मीडिया ने पूछा कि केदारनाथ में प्रधानमंत्री उनके कान में क्या कह रहे थे, तो उन्होंने जवाब को मुस्कुराकर टाल दिया। वह जब बीजेपी के प्रदेश सह महामंत्री (संगठन) होते थे, और महामंत्री (संगठन) नरेश बंसल थे, तब भी संगठन उनके ही इशारे पर नाचता था। जो वह कहते थे, वही होता था। किसी की मजाल नहीं थी जो उनकी बात काट दे। बंसल और प्रदेश अध्यक्ष (तब बिशन सिंह चुफाल) भी वही करते थे, जो धन सिंह कहते थे, इसलिए उनको बाद में महामंत्री (संगठन) भी बनाया गया। पार्टी और सरकार में ऐसा कहने वालों की कमी नहीं जो यह कहते हैं कि धन सिंह अपनी मर्जी से राज्यमंत्री हैं। जिस दिन चाहेंगे,उस दिन कैबिनेट मंत्री बन जाएंगे। इस बात में कितनी सच्चाई है यह हालांकि, कोई नहीं जानता।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक उनकी क्षमता और काबिलियत देख कर ही केदारनाथ में मोदी के दौरे का पूरा जिम्मा इस पॉकेट हरक्युलिस को सौंप दिया गया था। जिस तरह बहुत कम समय और नोटिस के बावजूद मोदी का कार्यक्रम केदारनाथ में सफल रहा उसके पीछे उनका ही हाथ देखा जा रहा है। मोदी की जनसभा के लिए केदारनाथ धाम में भीड़ जुटाना आसान लक्ष्य नहीं था। खास तौर पर यह देखते हुए कि यह आयोजन और दौरा दिवाली के बिल्कुल अगले दिन था। धन सिंह ने डेरा जमा कर इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया।
इससे पहले जब पार्टी अध्यक्ष शाह देहरादून आए तो धन सिंह ही सबसे खास और करीब दिखे थे। कुछ मौकों पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट भी होटल मधुबन से चले जाते थे, लेकिन धन सिंह शाह के साथ वहां बने रहते थे। शाह इसी होटल में रुके थे। बाकी मंत्री शाह के करीब भी नहीं फटक पा रहे थे, लेकिन धन सिंह उनके साथ पूरे समय साए की तरह रहे। खास बात यह है कि मोदी और शाह के दौरे के समय जहां कई पूर्व दिग्गजों की नैय्या पूरी तरह डगमगा गई बल्कि यह भी दिखा कि बीजेपी की सियासत में उनके दिन पूरे हो गए, वहीं धन सिंह नए सूरज के तौर पर उगते नजर आए।

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