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पोस्टिंग में पीएम भी दरकिनार

फील्ड से दूर बाबू बने बैठे हैं युवा आईएएस अफसर 

आला नौकरशाह हालात के लिए जिम्मेदार

ऐसे युवा आईएएस अफसर उत्तराखंड में कई हैं, जो लम्बे समय से सचिवालय में बैठे-बैठे जंग खा चुके है और जोश भी गंवा दिया। वे बस फाइल घिसते रहते हैं और बैठके लेने और बैठकों में जाने में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसा हर सरकार में होता रहा है। चाहे वह कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर बीजेपी की सरकार। अभी भी ऐसे कई अफसर हैं जो युवा हैं और कुछ करने का हौसला रखते हैं, लेकिन कार्यकुशल होने का गुण रखने के बावजूद उनको दरकिनार किया हुआ है…

देहरादून। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि आईएएस अफसरों के लिए शुरू के 10 साल ही ऐसे होते हैं, जब वह जिंदगी भर के लिए कुछ सीखते हैं। इतना ही नहीं यही वक्त होता है सेवाकाल का जब वह देश और समाज के लिए कुछ कर पाते हैं। तब उम्र साथ में होती है। जज्बा और जुनून तथा जोश भी रहता है। इस दौर में जिस अफसर ने मेहनत की और फील्ड में अपना नाम कायम किया और प्रसिद्धि हासिल की वह ताजिंदगी कायम रहती है। इसके बाद तो वह बाबू भर रह जाते हैं। बस फाइल पलटते रहो और दस्तखत करते रहो। बैठकें करते रहो, बैठकों में जाते रहो। यह मोदी का बिल्कुल दुरुस्त पाठ और व्याख्यान है। आईएएस अफसर भी इसको समझते हैं, लेकिन उत्तराखंड में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। यहां युवा अफसरों को या तो सचिवालय मन बाबू बनाए रखते हैं या फिर बहुत देर से फील्ड पोस्टिंग दी जा रही है।
ऐसे युवा आईएएस अफसर उत्तराखंड में कई हैं, जो लम्बे समय से सचिवालय में बैठे-बैठे जंग खा चुके है और जोश भी गंवा दिया। वे बस फाइल घिसते रहते हैं और बैठके लेने और बैठकों में जाने में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसा हर सरकार में होता रहा है। चाहे वह कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर बीजेपी की सरकार। अभी भी ऐसे कई अफसर हैं जो युवा हैं और कुछ करने का हौसला रखते हैं, लेकिन कार्यकुशल होने का गुण रखने के बावजूद उनको दरकिनार किया हुआ है। अभी जो अफसर सरकार की उपेक्षा या फिर उदासीनता का शिकार हैं, उनमें बृजेश संत, रंजीत सिन्हा, पंकज पाण्डेय, आर. राजेश कुमार, चंद्रेश यादव, श्रीधर बाबू अद्दंकी ऐसे अफसर हैं, जो युवा हैं और क्षमतावान समझे जाते हैं। इसके बावजूद ये सभी बाबू बने हुए हैं। इतना ही नहीं ये सभी नियमित सेवा वाले आईएएस अफसर हैं। इसलिए यह भी नहीं कह सकते हैं कि पीसीएस से बने आईएएस सरकार की पसंद नहीं है।
इनमें से अगर पाण्डेय और राजेश का रिपोर्ट कार्ड देखा जाए तो इन अफसरों की सरकार में कोई ऐसी ठोस नाराजगी या शिकायत भी नहीं है। अद्दंकी की तो छवि बहुत शानदार अफसर की है। सिन्हा और यादव को सुलझे हुए अफसरों में शुमार किया जाता है। इसके बावजूद राजेश, संत और पंकज को भुला दिया जाना समझ में नहीं आता है। इससे पहले नितिन भदौरिया, उनकी पत्नी स्वाति भदौरिया और आशीष जोशी के साथ भी सरकार का रवैया ऐसा ही था। आशीष को लम्बे समय तक सचिवालय में ही बिठा कर रखा गया, जबकि भदौरिया दंपति, जिनकी छवि सरल और ईमानदार अफसरों की है, को एक किस्म से उस दौर में तकरीबन मुख्य धारा से अलग रखा गया, जब उनमें कुछ करने की हिम्मत और जोश बहुत ज्यादा होता है। दोनों के साथ अभी भी सरकार का रुख बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है।
नितिन को हरिद्वार विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया गया है लेकिन उनकी वरिष्ठता वाले जिलाधिकारी बन के बैठे हुए हैं और उनको अभी तक मुख्य विकास अधिकारी ही बनाया गया है। उनसे कनिष्ठ भी जिलाधिकारी बन चुके हैं। स्वाति अब जाकर मुख्य विकास अधिकारी बनी हैं। कुछ अरसे पहले तक उनको पांच साल की सेवा के बावजूद देहरादून का एसडीएम ही बनाया गया था। सरकार का नजरिया समझ में इसलिए भी नहीं आता कि जिस नितिन को मुख्य विकास अधिकारी बना कर हरिद्वार भेजा गया था, उनको पिछली कांग्रेस सरकार जिलाधिकारी की पोस्टिंग दे चुकी थी।
आशीष जोशी के साथ भी सरकार का रुख ज्यादातर मौकों पर बहुत हतोत्साहित करने वाला रहा है। उत्तराखंड में सिर्फ कुछ अफसर ही ऐसे हैं, जिनको सरकार ने पूरी इज्जत बख्शी और उनकी योग्यता का सम्मान किया। इनमें सबसे ऊपर सेंथिल पांडियन हैं, जो अब सचिव बन चुके हैं। वह तकरीबन सभी बड़े जिलों के जिलाधिकारी रहे और कुमायूं के आयुक्त भी बने। उत्तराखंड में युवा अफसरों की फील्ड पोस्टिंग को लेकर बेचैनी की वजह यह भी है कि यहां, सिर्फ 12 साल पूरे होने के बाद ही सचिव बना दिया जाता है। इसके बाद उनका दावा कलेक्टर बनने का तकरीबन खत्म हो जाता है। वे चाहते हैं कि इस अवधि तक कम से कम चार-पांच जिले और दो-तीन बड़े मैदानी जिलों में कलेक्टर तो बन जाए। ऐसी तकदीर सबकी नहीं होती।
वैसे अफसरों की इस गत के लिए उनके ही वरिष्ठ बहुत हद तक जिम्मेदार कहे जा सकते हैं। तबादलों और पोस्टिंग में कार्मिक सचिव, मुख्यमंत्री के सचिव और मुख्य सचिव की अहम भूमिका रहती है। वे उन अफसरों को ही बढिय़ा पोस्टिंग देने में जुटे रहते हैं, जो उनके कैम्प के होते हैं और उनके गुलाम किस्म के होते हैं। भले वे पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री को परोक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराते हैं। पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपलच्याल के अनुसार मुख्य सचिव चाहे तो अच्छे और बुरे अफसरों को उनकी योग्यता और छवि के मुताबिक पोस्टिंग दिला सकते हैं। मुख्यमंत्री तबादलों और पोस्टिंग के ज्यादातर मामलों में मुख्य सचिव की सुनते हैं। इसलिए अगर सरकार युवा अफसरों को बेहतर पोस्टिंग नहीं दे पाती है या फिर बुरी छवि वालों को क्रास नहीं कर सकती है तो उसके लिए मुख्यमंत्री को दोष नहीं देना चाहिए।

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