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न खुद रहे न रहने दिया

देहरादून। इसमें दो राय नहीं है कि उत्तराखंड में नौकरशाही कभी तो एक दम सरकार में हावी दिखती है और कभी सरकार और नेताओं के आगे एकदम नतमस्तक। यह निर्भर करता है कि सामने कौन है। मसलन मंत्री अगर मदन कौशिक जैसे हों या फिर पिछली कांग्रेस सरकार में इंदिरा हृदयेश की तरह तो, अफसर दंडवत हो जाते हैं, लेकिन अगर सरकार में जरा भी कमजोरी आई तो अफसर उनको घास नहीं डालते हैं। इसमें हैरान होने जैसा कुछ नहीं है कि मंत्रियों को जहां, उत्तर प्रदेश राज के दौरान के इंजीनियरों के पुराने जमाने के मकान आवास के तौर पर आवंटित हुए तो आईएएस और आईपीएस अफसरों के पास शानदार नए बंगले हैं। विधायकों को तो और दुर्दशा का सामना करना पड़ा। विधायक हॉस्टल और रेसकोर्स स्थित ऑफिसर्स ट्रांजिट हॉस्टल का स्तर देख कर इसको आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे में कौशिक ने मुख्य सचिव का बंगला भी यमुना कॉलोनी में एक और बंगले के साथ अपने नाम कर लिया तो किसी को हैरानी नहीं हुई। आलम यह रहा कि पिछले मुख्य सचिव एस रामास्वामी को एक दिन भी मुख्य सचिव बंगले में रहने का सुख नहीं मिल पाया। ऐसा इसलिए कि कौशिक ने बंगले का आवंटन अपने नाम कर लिया था।
जब पिछले साल रामास्वामी मुख्य सचिव बने तो राजपुर रोड पर जाखन स्थित बंगले को उनके लिए सजाया गया। इसमें अभी काम चल ही रहा था कि सरकार बदल गई। फिर त्रिवेंद्र सिंह रावत की अगुवाई में बीजेपी सरकार आई और मदन कौशिक न सिर्फ मंत्री बने बल्कि सरकार के प्रवक्ता भी बन गए यानि कि सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री। उनकी नजर इसके साथ ही मुख्य सचिव के बंगले पर भी पड़ गई। किसी ने बता दिया कि यह बंगला न सिर्फ सुंदर है बल्कि लोकेशन के कारण इसका महत्व बहुत ज्यादा है। कौशिक को बात जंच गई और उन्होंने उस बंगले को भी अपने नाम राज्य संपत्ति विभाग को निर्देश दे कर अपने नाम आवंटित कर लिया। किसी नौकरशाह और मुख्य सचिव ने इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
एक पूर्व मुख्य सचिव के अनुसार यह सरकार का एकदम नियम विरुद्ध उठाया गया अनैतिक कार्य कहा जा सकता है जो बंगला मुख्य सचिव के नाम आवंटित हो और उनके नाम चिह्नित हो, उसका आवंटन किसी और को नहीं किया जा सकता है। बंगले चिह्नित करने का मकसद यही होता है। सभी सरकारें इस नियम और परंपरा का पालन करती रही हैं। ऐसा न होता तो जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान की कोठी तो और शानदार है। उस पर मुख्य सचिव या अन्य वरिष्ठ अफसर कब्जा कर सकते थे या मंत्री ही कब्जा लेते और जिलाधिकारी तथा कप्तान को कहीं दूर भेज देते। रामास्वामी कुछ खामोश रहने और लड़ाई-झगड़े तथा विवादों से दूर रहने वाले अफसर हैं। लिहाजा, उन्होंने मुख्य सचिव के चिह्नित आवास को जाने दिया और खुद पहले तो वन अनुसंधान संस्थान के बंगले में रहते रहे, फिर गढ़ी कैंट में टपकेश्वर मंदिर के पास आईएचएम परिसर में बने बंगले में रहने चले गए, जो मुख्य सचिव स्तर के अफसरों के लिए बनाए गए हैं।
खास बात यह रही कि इधर कौशिक को तब तक किसी पंडित ने भ्रमित कर दिया कि मुख्य सचिव का बंगला वास्तु दोष से ग्रस्त है। इसके बाद मंत्री भी सोच में पड़ गए और वह जल्दी से बंगले में नहीं गए। अब उन्होंने बंगले में रहने का मन बदल दिया है। उन्होंने यमुना कॉलोनी में ही आवास ले लिया है। उनके इस रवैये के कारण रामास्वामी एक दिन के लिए भी इस बंगले में रहने का लुत्फ नहीं ले पाए। खुद कौशिक ने वीक एंड टाइम्स से पुष्टि की कि उन्होंने अब वह उस बंगले में नहीं रहेंगे। उन्होंने यमुना कॉलोनी में ही आवास ले लिया है। अब देखना है कि वास्तु दोष से ग्रस्त बताए जा रहे मुख्य सचिव बंगले में नए मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह जाते हैं या नहीं।

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